कलीसिया की परम्परा

धर्मशास्त्र और ईतिहास में

त्रिएक परमेश्वर का सिद्धान्त

परीचय

त्रिएक परमेश्वर अंग्रेजी शब्द् Trinity का साधारण् हिन्दी अनुबाद् है. Trinity शब्द् का अर्थ वास्तव् में ‘तीन चिजों या व्यक्तियों का समुह’ है, लेकिन यह प्रायह्: परमेश्वर के लिये उपयोग किया जाता है। त्रिएक परमेश्वर का सिद्धान्त यह कहता है कि एक परमेश्वर में तीन व्यक्ति हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। यह सिद्धान्त सभी रूढीवादी मसीही सम्प्रदायों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

क्या यह सिद्धान्त बाईबल और विशेषकर नया नियम में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है?

क्या कलीसिया के ईतिहास के आरम्भ से आजतक सिद्धान्त इतना ही महत्त्वपूर्ण रहा है?

कलीसिया की परम्परा

३२५ ई में प्रतिपादित निसिया पंथ मसीही शिक्षाके सिद्धान्त का आधिकारिक दस्तावेज है। इसमें तीन भाग हैं, त्रिएक परमेश्वर के तीनों व्यक्तित्वों के लिए एक एक भाग। उस समय से लेकर आजतक प्रमुख मसीही कलीसियाओं के लिये त्रएकता एक मुख्य सिद्धान्त रहा है।

प्रत्येक परम्परागत रोमन कैथोलिक या एंग्लिकन कलीसिया की आराधनाओं में बार बार त्रिएक परमेश्वर का उल्लेख किया जाता है। प्रत्येक भजन के अन्त में स्तुतिगान के रूप में ,’पिता की, पुत्र की और पवित्र आत्मा की महिमा हो’, गाया जाता है। अधिकांश प्रचारक अपने प्रवचन का आरम्भ, ‘पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में’ करते हैं। अधिकांश परम्परागत कलीसियाओं में आराधना का अन्त इन आशिर्वाद- वचनों से किया जाता है, ‘सर्वशक्तिमान् परमेश्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का आशिर्वाद सदा सर्वदा आपके बीच और आपके साथ रहे’। अन्य कलीसियाओं में अनुग्रह के अशिर्वाद के साथ आराधना का समापन किया जाता है, ‘प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह, परमेश्वर पिता का प्रेम और पवित्र आत्मा की सङ्गति आप सभी के साथ रहे’ (२ कोरि १३: १४)।

अधिकांश कलीसियायें बप्तिस्मा देते समय मत्ती की पुस्तक (२८:१९) में उल्लिखित यीशु मसीह की आग्या के अनुसार त्रिएकता का सूत्र उपयोग करती हैं। क्योंकि लिखा है, “इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो।”

पश्चिमी देशों में अनगिनत कलीसियाओं के नाम “Trinity Church” या “Holy Trinity Church” रखते हैं।

अधिकांश पंथों के लिये त्रिएक परमेश्वर पर विश्वास करना रूढिवादिता का बहुमूल्य प्रमाण है। त्रिएक परमेश्वर में विश्वास करने वाले सभी पंथ रूढीवादि समझे जाते हैं। रोमन कैथोलिक, ग्रीक या रसियन अर्थोडक्स, एन्ग्लिकन, बाप्तिस, प्रेसबिटिरियन और बहुत सारे, लेकिन सभी नहीं, इनके साथ साथ पेन्टीकौस्टल समूह, सब इसी श्रेणी में आते हैं।

यहोवा के साक्षी, मरमन्स, ख्रिष्टाडेल्फियन्स, तथा अन्य जो त्रएक परमेश्वर अथवा यीशु मसीह के ईश्वरत्व में विश्वास नहीं करते, वे झूठे धार्मिक सम्प्रदाय की श्रेणी में आते हैं।

जैसा कि हम देखते हैं, परम्परागत कलीसियायें त्रिएक परमेश्वर के सिद्धान्त पर विशेष बल देती रही हैं। क्या यह शिक्षा धर्मशास्त्र पर आधारित है? जैसाकि होना चाहिये! अथवा यह मुख्यतया सिर्फ कलीसिया के परम्परा पर आधारित है?

हम बाईबल धर्मशास्त्र में इसका उत्तर ढूँढने का प्रयत्न करेंगे।

धर्मशास्त्र बाईबल

शब्द Trinity (त्रिएक परमेश्वर)

Trinity शब्द का उल्लेख कितनी बार बाईबल मेंहुआ है? इसका उत्तर है – एक बार भी नहीं। उत्पत्ति से लेकर प्रकाश की पुस्तक तक एक बार भी इस शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। वास्तव में हिब्रू, ग्रीक या हिन्दी, किसी भी भाषा में Trinity शब्द नहीं मिलता।

संख्या तीन (३) का भी परमेश्वर से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं मिलता। इसके विपरीत व्यवस्था की पुस्तक ६:४ में एैसा लिखा है, “हे इस्राएल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है”। यीशु के द्वारा कहे गये ये शब्द भी एैसा ही दिखाते हैं, “मैं और पिता एक हैं (यूहन्ना १०:३०)। उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि, “मै और पिता दो अलग अलग व्यक्ति है”।

नया नियम यीशु के नाम पर बहुत जोर देता है और पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर प्राय: कोई जोर नहीं देता है। यीशुने सुसमाचार की पुस्तकों में ‘मेरे नाम में’ वाक्यांश को २० बार से अधिक उपयोग किया है। इन संदर्भों में से कुछ को देखें: मत्ती १८:२०, मत्ती १८: ५, मत्ती २४: ९, मर्कुस १६:१७, यूहन्ना १४:१३, यूहन्ना १४:२६, यूहन्ना १६:२३.। वाक्यांश "यीशु के नाम में" प्रेरितों की पुस्तक में १० बार आया है। प्रेरितों २:३८, प्रेरितों ३:६, प्रेरितों ४:१८, प्रेरितों ८:१२, प्रेरितों १६:१८, प्रेरितों २६:९ देखें।

पौलुस ने कुलुस्सियों को लिखा, “और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो”। (कुल ३:१७)

उन्होंने यह नहीं लिखा, “पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से सब कुछ करो।”

कलीसियाओं के इतिहासकार युसेबियस (२६३-३३९ ई) ने इसे अलग तरह से उद्धृत किया। उनके अनुसार, यीशु ने कहा “जाओ और मेरे नाम से सभी जातियों को चेला बनाओ।” यह बहुत अधिक तर्कसंगत लगता है। “सारी शक्ति मुझे दी गई है” इन शब्दों के बाद ... “मेरे नाम से बपतिस्मा दो” कहना सही लगता है; “पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो” ठीक नहीं लगता। संभवतः मत्ती ने मूल रूप से ऐसा ही लिखा था, लेकिन त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत को फिट करने के लिए बाद में इसे बदल दिया गया हो।

प्रेरितों की पुस्तक में उल्लेख किये गये सभी बपतिस्मा “यीशु के नाम से” हैं। देखें प्रेरितों २:३८, प्रेरितों ८:१६, प्रेरितों १०:४८, प्रेरितों १९:५; see also १कोरि. १:१३. भी देखें। क्या हम इस बात पर गंभीरता से भरोसा कर सकते हैं कि यीशु ने अपने शिष्यों को “पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर” बपतिस्मा देने के लिए कहा था और उन्होंने यीशु के निर्देशों की पूरी तरह अनदेखी कर दी?

शब्द "व्यक्ति"

बाईबल धर्मशास्त्र में "व्यक्ति" शब्द का उपयोग कितनी बार किया गया है? इसका उत्तर भी ‘त्रिएक परमेश्वर’ शब्द के जैसा ही! एक बार भी नहीं! वास्तव में न तो प्राचीन हिब्रू और न ही प्राचीन ग्रीक में ‘व्यक्ति’ के लिए कोई शब्द था। (आधुनिक हिब्रू भाषा में ‘adam’ (אדם) शब्द का उपयोग किया गया है जिसका अर्थ ‘आदमी’ होता है )।

क्या पवित्र आत्मा परमेश्वर हैं?

पुराने नियम में ‘पवित्र आत्मा’ का उल्लेख बहुत ही कम है, लेकिन अक्सर ‘परमेश्वर की आत्मा’ का उल्लेख हुआ है। नए नियम में पवित्र आत्मा (πνευμα ἁγιον) का उल्लेख ८९ बार किया गया है, जिसमें सिर्फ प्रेरितों की पुस्तक में ४० बार किया गया है। मुझे लगता है कि अधिकांश लोग इस बात को मानते हैं कि पवित्र आत्मा और परमेश्वर की आत्मा एक ही हैं।

कोई भी आम तौर पर कल्पना नहीं करेगा कि परमेश्वर और उसकी आत्मा दो अलग-अलग व्यक्ति हैं। मेरी आत्मा और मैं दो अलग-अलग व्यक्ति नहीं हैं। दोनों मैं हूँ। आप और आपकी आत्मा और आपका मन और आपका शरीर सभी मिलकर एक व्यक्ति का निर्माण करते हैं। क्या परमेश्वर और उसकी आत्मा अलग-अलग प्राणी हैं? आत्मा के लिए हिब्रू शब्द רוּחַ (ruach) और ग्रीक शब्द (πνευμα - प्नेउमा), दोनों का शाब्दिक अर्थ हवा और श्वांस है। क्या परमेश्वर की आत्मा या श्वांस वास्तव में परमेश्वर से अलग व्यक्ति है? बाइबल में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता है।

क्या यीशु परमेश्वर है?

नए नियम में लगभग 1000 बार यीशु के नाम का उल्लेख है, लेकिन इनमें कितनी बार यह कहता है कि वह परमेश्वर है? इसके लेखक यीशु के बारे में कई अद्भुत विवरण देते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी यह नहीं कहता कि वह परमेश्वर हैं।

उपरोक्त सभी पद स्पष्ट रूप से कह सकते थे कि यीशु परमेश्वर थे। परन्तु उनमें से कोई भी ऐसा नहीं करता । नए नियम के अन्य भाग हमें यीशु के बारे में कई अद्भुत बातें बताते हैं; लेकिन उनमें से कोई भी यह नहीं कहता कि वह परमेश्वर हैं। यह कलीसियाओं की शिक्षा है, लेकिन बाइबल की शिक्षा नहीं।

यीशु ने स्वयम् अपनी पहचान के विषय में क्या कहा? उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, “तुम क्या कहते हो, मैं कौन हूँ?” पतरुस ने उत्तर दिया, “आप मसीह हैं, जीवित परमेश्वर के पुत्र” (मत्ती १६:१६)। यीशु ने पतरस के उत्तर के लिए अपनी पूरी स्वीकृति दी: “कि हे शमौन योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लोहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है। (मत्ती १६:१७)।पतरस ने ऐसा क्यों नहीं कहा, “आप मसीह, जीवित परमेश्वर हैं”? बस, यह ऐसा इसलिए है क्योंकि कलीसिया हमें बताती है कि यीशु परमेश्वर हैं, लेकिन बाइबल और यीशु स्वयं ऐसा नहीं बताते हैं।

पूरे नए नियम में केवल एक पद हमें स्पष्ट रूप से बताती है कि यीशु परमेश्वर हैं। जब अपने पुनरुत्थान के बाद यीशु ने बंद दरवाजों के बावजूद अन्दर प्रवेश कर थोमा को अपने छेदों वाले हाथ और पैर दिखाए, तब थोमा ने विस्मय के साथ स्वीकार किया था, “मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर” (यूहन्ना २०:२८)। यह यीशु के स्वभाव के बारे में एक सैद्धांतिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि आश्चर्यपूर्ण स्वीकारोक्ति थी, जब उसने मसीह में परमेश्वर को आमने सामने पाया था। उसने यीशु में परमेश्वर को देखा। हम सिर्फ इस एक कथन का अर्थ यह नहीं लगा सकते हैं कि यीशु ही परमेश्वर हैं, जैसा कि हमने देखा, यीशु के बारे में कोई भी सैद्धान्तिक शिक्षा ऐसा नहीं बताती है।

बाईबल के कुछ भाग त्रिएक परमेश्वर के विषय में अस्पष्ट हैं और विभिन्न अनुवादकों ने उन्हें अलग तरीके से अनुवादित किया है। अधिकांश बाईबल अनुवादक त्रिएक परमेश्वर में विश्वास करने वाले रहे हैं और उन्होंने अपनी परंपरा के अनुसार इन खण्डों का अनुवाद किया है।

मैं इस विषय में एक और महत्वपूर्ण बात बताना चाहता हूं: यदि यीशु परमेश्वर हैं और हम केवल नश्वर मनुष्य, तो हमें बहुत कम आशा है कि हम कभी भी उनके समान हो सकते हैं; लेकिन अगर वह परमेश्वर के पुत्र हैं, और हम नए जन्म के द्वारा ईश्वर के पुत्र और पुत्री और यीशु के भाई-बहन बनते हैं, तो हमें यह अद्भुत आशा है कि हम परिवर्तन हो सकते हैं और यूशु के समान हो सकते हैं और उसके जैसा जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

इतिहास

‘त्रिएक परमेश्वर’ का सिद्धांत नए नियम के समय में आरम्भ नहीं हुआ था। आश्चर्य की बात है यह यीशु के समय से बहुत पहले शुरू हुआ था। सुमेरियन, बेबीलोनियन, भारतीय, यूनानी और मिस्रवासी के सभी देवताओं की त्रिदेव के सिद्धांत थे! (इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट Ancient Trinitarian Gods को देखें।) इनमें से अधिकांश धर्मों का दावा था कि उनके तीन देवता त्रिएक थे।

बेबीलोन की त्रिमूर्ति में निम्रोद, सेमिरमिस और तमुज़ शामिल थे, जो पिता, माता और पुत्र थे। हिंदू त्रिमूर्ति में ब्रह्मा, विष्णु और शिव शामिल थे। अन्य प्राचीन धर्मों में समान त्रिदेव थे।

न तो यीशु और न ही उनके प्रेरितों ने ‘त्रिएक परमेश्वर’ के सिद्धांत को सिखाया। जैसा कि हमने देखा है कि यह पुराने नियम या नए नियम में कहीं नहीं दिखाई देता है।

त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत ने सम्राट कॉन्सटेंटाइन के समय तक धीरे-धीरे जड पकडा। उन्होंने घोषणा की कि ईसाई धर्म रोमन साम्राज्य का राष्ट्रीय धर्म होगा, और इसी अवधी में कलीसिया ने बुतपरस्त त्योहारों, बुतपरस्त इमारतों और कई अन्य बुतपरस्त प्रथाओं को अपनाना शुरू कर दिया। क्या यह संयोग था कि इसी समय कलीसिया ने आधिकारिक तौर पर त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत को अपनाया था? कुछ समय बाद में यही कलीसिया का केंद्रीय सिद्धांत बन गया।

अन्य धर्मों में पिता और पुत्र और माता देवता थे, लेकिन त्रिएक परमेश्वर के तीसरे व्यक्ति के लिए कलीसिया के पास कोई स्पष्ट विकल्प नहीं था; इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि कलीसिया ने पवित्र आत्मा को यह भूमिका दी।

यहां हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहिए। क्या पेंतीकोस के दिन से लेकर कॉन्स्टेंटाइन के समय तक या वर्तमान समय तक या बीच में किसी अन्य बिंदु तक सत्यता के ज्ञान में कलीसिया लगातार बढ़ता गया? या कुछ बिंदु पर कलीसिया ने अंधेरे और त्रुटि में एक नीचे ओर जाने लगी? क्या त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत परमेश्वर प्रदत्त शुद्ध सत्य था? या यह बुतपरस्ती के रास्ते पर नीचे की ओर एक और कदम था?

यदि बाईबलीय भाषा का उपयोग करें तो, क्या त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत यीशु के वादे की परिपूर्ति था (यूहन्ना १६:१३) कि पवित्र आत्मा विश्वासियों को सभी सत्यता में मार्गदर्शन करेगा? या यह पॉलुस की भविष्यवाणी ‘ब्रिहत् स्वधर्मत्याग’ की परिपूर्ति का हिस्सा था (२थिस। २:३)?

कॉन्स्टेंटाइन शासनकाल में त्रिएक परमेश्वर के सिद्धान्त में विश्वास व्यक्तिगत विश्वास का मुख्य आधार बन गया। कौन वास्तविक ईसाई है और कौन नहीं है, इसी विश्वास पर निर्भर करता था। कोई भी जो त्रिएक परमेश्वर में विश्वास व्यक्त नहीं करता था उसे विधर्मी का ठप्पा लगा देते थे।

यह स्थिति तब से लेकर आज तक जारी है। त्रिएक परमेश्वर में अविश्वास के लिए दिए जाने वाले दंड सदियों से निधारित हैं जो विविध हैं। कई बार दोषी को प्रमुख राष्ट्रीय कलीसिया से निस्कासन कर दिया जाता है। कुछ केसों में दोषियों को जीवित जला दिया जाता है। वर्तमान अवस्था में त्रिएक परमेश्वर पर विश्वास करने वाली कलीसिया से ऐसा विश्वास नहीं करने वाले दोषी को किसी भी आधिकारीक पद से निस्काशित कर दिया जाता है।

त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत का बहुत बुरा इतिहास रहा है!

हमें एक और प्रश्न पूछना चाहिए: विश्वास की सच्ची पारख क्या है? क्या यह त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत का मौखिक समर्थन है? यीशु ने कैसी परीक्षा दी? “सच में, मैं तुमसे कहता हूं, जब तक कोई पानी और आत्मा से पैदा नहीं होता, वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता” (यूहन्ना ३:५))। पौलुस ने क्या कहा? “जिस किसी के पास मसीह की आत्मा नहीं है वह उसका नहीं है” (रोम ८:९)। और यूहन्ना के शब्दों में: “जिसके पास पुत्र है उसके पास जीवन है; जिसके पास परमेश्वर का पुत्र नहीं है उसके पास जीवन नहीं है” (१यूहन्ना ५:१२)। ये विश्वास की असली पहचान हैं।

सदस्यता के लिए मानव संगठन मानवीय परीक्षणों का उपयोग करते हैं। एक उम्मीदवार क्या कहकर अपना विश्वास व्यक्त करता है? लेकिन परमेश्वर की सच्ची कलीसिया एक मानव संगठन नहीं है । “मनुष्य ( और अधिकांश कलीसिया) तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि मन पर रहती है।” (१शमूएल १६:७)।

बाहरीलोग

त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत बाहरी लोगों के लिए एक बड़ी बाधा है। यदि यीशु परमेश्वर हैं और वह परमेश्वर पिता से अलग व्यक्ति हैं, और यदि पवित्र आत्मा एक अलग व्यक्ति हैं, तो बाहरी लोग तुरंत सोचते हैं कि ईसाई धर्म तीन अलग-अलग देवताओं के अस्तित्व को सिखाता है।

यहूदियों के लिए, त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत अपने और ईसाइयों के बीच निर्णयकारी (बड़ा) अंतर है। यहूदी कर्मकाण्डों में केंद्रीय प्रार्थना के रूप में जाना जाता है शमा - “हे इसराइल सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर, यहोवा एक ही है” । ये व्यवस्था ६:४) में उल्लिखीत शब्द हैं । रूढ़िवादी यहूदी रोज शमा का पाठ करते हैं। कई यहूदियों को अतीत में कलीसिया के हाथों मौत के घाट उतार दिया गया था और मरते समय उनके होठों पर शमा के शब्द थे ।

मुसलमान भी इस तथ्य पर जोर देते हैं कि अल्लाह (ईश्वर के लिए अरबी शब्द) एक है। उनमें से कई सोचते हैं कि ईसाई तीन देवताओं की पूजा करते हैं।

यहोवा के साक्षियों के लिए, त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत अक्सर आरम्भिक बिंदु है जो वे कलीसिया के सदस्यों को दिखाने के लिए उपयोग करते हैं कि कलीसिया की शिक्षाएं झूठी हैं।

सारांश

कलीसिया: त्रिएक परमेश्वर का सिद्धान्त 1700 साल या उससे अधिक समय से मुख्यधारा के ईसाई कलीसियाओं और संप्रदायों का केंद्रीय सिद्धांत रहा है। यह सिद्धांत सिखाता है कि परमेश्वर तीन व्यक्ति हैं, परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा। इनमें से प्रत्येक परमेश्वर है और वे सभी एक हैं।

बाईबिल: न तो त्रिएक परमेश्वर शब्द और न ही व्यक्ति शब्द बाइबिल में कहीं मिलता है। और न ही परमेश्वर का संख्या ३ से कहीं संबंध दिखता है। बाईबल यीशु को कई अद्भुत उपाधियाँ प्रदान करती है, जिसमें परमेश्वर का पुत्र भी शामिल है, लेकिन कहीं भी उसे परमेश्वर कहकर सम्बोधन नहीं किया गया है।

इतिहास: ईसा के समय से बहुत पहले बेबीलोन और हिंदू धर्म सहित अन्य प्राचीन धर्मों में त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत मौजूद थे। लेकिन यह सिद्धांत नए नियम में कहीं नहीं है। सम्राट कन्स्टान्टिन ने ईसाई धर्म को रोमन साम्राज्य का आधिकारिक धर्म बना दिया और चर्च में कई मूर्तिपूजक प्रथाओं को लाने के बाद यह आधिकारिक कलीसिया का सिद्धांत बन गया। उस समय से इसमें विश्वास नहीं करने वाले लोगों को हल्के से लेकर जीवित जलने तक हर प्रकार के उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।

कई लोग जो नाममात्र के ईसाई देशों में बड़े हुए हैं, उन्हें बचपन से त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत पढ़ाया जाता है। उनमें से अधिकांश ने इसे बिना किसी प्रश्न के स्वीकार कर लिया है।

यदि त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत सही और सत्य है, तो हमें इसे मजबूतीसे पालन करना चाहिए। यदि यह ईसाई कपड़ों में एक झूठी बेबीलोन शिक्षा है, तो हमें इसे अस्वीकार करना चाहिए और कई अन्य झूठी शिक्षाओं को अस्वीकार करना चाहिए जो कलीसिया की परंपराओं ने हमें सिखाया है।

अनुवादक - डा. पीटर कमलेश्वर सिंह