यीशु को समझना

परिचय

यीशु महान् शिक्षक थे और उनकी बातें सब लोग आसानी से समझते थे। हां या ना? आइये, कुछ बातों पर विचार करें।

कुछ प्रतिक्रियाएं

“पर यह बात उन की समझ में नहीं आई, और वे उस से पूछने से डरते थे” (मर्कुस ९:३२)।

“परन्तु जो बात उसने उन से कही, उन्होंने उसे नहीं समझा (लुका २:५०)।

“परन्तु वे इस बात को न समझते थे, और यह उन से छिपी रही; कि वे उसे जानने न पाएं, और वे इस बात के विषय में उस से पूछने से डरते थे” (लुका ९:४५)।

“वे न समझे कि हम से पिता के विषय में कहता है” (यूहन्ना ८:२७)।

“यीशु ने उन से यह दृष्टान्त कहा, परन्तु वे न समझे कि ये क्या बातें हैं जो वह हम से कहता है” (यूहन्ना १०:६)।

“उसके चेले, ये बातें पहिले न समझे थे; परन्तु जब यीशु की महिमा प्रगट हुई, तो उन को स्मरण आया, कि ये बातें उसके विषय में लिखी हुई थीं; और लोगों ने उस से इस प्रकार का व्यवहार किया था” (यूहन्ना १२:१६)।

तब उन्होंने कहा, “यह थोड़ी देर जो वह कहता है, क्या बात है? हम नहीं जानते, कि क्या कहता है” (यूहन्ना १६:१८)।

और यीशु स्वयं ने क्या कहाः

“तुम को परमेश्वर के राज्य के भेदोंकी समझ दी गई है, पर औरों को दृष्टान्तों में सुनाया जाता है, इसलिये कि वे देखते हुए भी न देखें, और सुनते हुए भी न समझें” (लुका ८:१०)।

“क्या तू मेरे पांव धोता है? यीशु ने उसको उत्तर दिया, कि जो मैं करता हूं, तू अब नहीं जानता, परन्तु इस के बाद समझेगा” (यूहन्ना १३:७)।

उन्होंने समझा क्यों नहीं?

ये सभी लोग संसार के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक की बातें समझने में क्यों असफल रहे?

यशायाह हमें इसका आधार भूत कारण बताते हैं, “मेरे विचार तुम्हारे विचार नही हैं और तेरे मार्ग मेरे मार्ग नही हैं”। यह परमेश्वर ने घोषणा की है। “क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है” (यशायाह ५५:९)।

पौलुस ने इसी सत्यता को दूसरे ढङ्ग से व्यक्त किया हैः “परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उन की जांच आत्मिक रीति से होती है” (१ कोरिन्थी २:१४)।

यीशु ऐसी बातें बोल रहे थे जो पूरी तरह सुनने वालों के अनुभव के बाहर थी। हर समय वे इतने ऊंचे स्तर की बात करते थे जो उनके समझ से बाहर होती थी। वह ऊपर से आये थे और वे सब नीचे के थे। उनकी बातें वे सब अक्षरशः लेते थे। कभी कभी उनकी बातों का स्पष्ट शाब्दिक अर्थ नहीं बनता थाः “तुम्हें मालूम नहीं, मुझे मेरे पिता के भवन में होना चाहिए?” कभी कभी शाब्दिक रूप से उनकी बातों का अर्थ गलत होता था, “इस मन्दिर को नष्ट कर दो और मैं तीन दिनों में इसे फिर खड़ा कर दूंगा”।

बाइबल यह स्पष्ट करती है कि सांसारिक मनुष्य अन्धेपन की अवस्था में है। कल्पना करें आप किसी जन्मजात अन्धे को लाल नीले रङ्ग के बीच का अन्तर समझा रहे हैं । आप उससे यह कह रहे हैं कि नीला रङ्ग आकाश के रङ्ग जैसा और लाल रङ्ग लहू के रङ्ग जैसा होता है, पर उसने कभी आकाश और लहू देखा ही नहीं है। वह समझ ही नहीं सकता। यीशु अपने श्रोताओं से उन चीजों के विषय में बात कर रहे थे, जो कभी उन्होंने देखा ही नहीं था।

उदाहरण

आइये हम कुछ ऐसी घटनाओं पर विचार करें जहां लोग यीशु की बातें समझ नहीं पाये थेः

निकोदेमुस - नया जन्म

यीशु ने उसको उत्तर दिया; “कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता”। नीकुदेमुस ने उस से कहा, “मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश कर के जन्म ले सकता है” (यूहन्ना ३:४)?

निकुदेमुस को नया जन्म का कोई अनुभव नहीं था। इस विषय में इसके पहले उसने कभी नहीं सुना था और नहीं किसी ऐसे व्यक्ति से उसकी भेंट हुई थी जिसने इसका अनुभव किया हो। इजराइल देश और रोमी साम्राज्य के विषय में तो वह बहुत कुछ जानता था, लेकिन परमेश्वर के राज्य के विषय में आज तक कुछ भी नहीं सुना था। इस लिए उसने यीशु के शब्दों को स्वाभाविक जन्म के अर्थ में अक्षरशः लिया। इन्हें जानने का उसके पास और कोई दूसरा उपाय भी नहीं था। कुछ समय पश्चात् ये शब्द उसके जीवन में आश्चर्यजनक वास्तविकता बन गये, पर तत्काल ये उसके लिये अर्थहीन थे।

हमें यीशु द्वारा निकुदेमुस को कहे गये वास्तविक शब्दों पर विचार करना चाहिए। मुझे बच्चों का एक अंग्रेजी कोरस याद आ रहा है:

“Listen to the words of Jesus spoken clear and plain:
If you want to go heaven you must be born again!”

“यीशु की बातों को सुनो, जो स्पष्ट और आसान हैं,
यदि तुम स्वर्ग जाना चाहते हो तो तुम्हें नया जन्म लेना पड़ेगा।”

लेकिन यह वह बात नही थी जो यीशु ने कहा था। उन्होंने यह नहीं कहा, “जब तुम नया जन्म नहीं लेते, तुम स्वर्ग नहीं जा पाओगे”। उन्होंने वास्तव में यह कहा था कि यदि कोई नया जन्म नहीं लेता, तो स्वर्ग का राज्य नहीं देख सकता। दूसरे शब्दों में वह आत्मिक सत्यता के आगे अन्धा है और इन्हें समझ नहीं सकता है। निकुदेमुस को हम ऐसा ही पाते हैं और आगे भी हम जिन उदाहरणों को देखेंगे, उन्हें भी।

सामरी स्त्री - जीवित जल

यीशु ने उत्तर दिया, “यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता।” स्त्री ने उस से कहा, “हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कूआं गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहां से आया” (यूहन्ना ४:१०, ११)?

निकुदेमुस समाज के ऊंचे वर्ग का था और यह स्त्री नीचले वर्ग से थी, लेकिन दोनों में एक समानता थीः दोनों का नया जन्म नहीं हुआ था और दोनों ही परमेश्वर का राज्य नहीं देख सकते थे। इस स्त्री ने भी यीशु के शब्दों को अक्षरशः लिया। वह पीने के पानी के विषय में सब कुछ जानती थी, लेकिन जीवित पानी के विषय में कभी नहीं सुना था। यह पानी आत्मिक अवस्था से सम्बन्धित था जिसके विषय में वह पूर्ण रूप से अनजान थी। वह पीने वाले पानी को अपनी आंखों से देख सकती थी, पर आत्मिक रूप से अन्धी होने के कारण वह जीवित पानी को नहीं देख सकती थी।

यहूदी लोग - आत्मिक भोजन

“जीवन की रोटी जो स्वर्ग से उतरी मैं हूं। यदि कोई इस रोटी में से खाए, तो सर्वदा जीवित रहेगा और जो रोटी मैं जगत के जीवन के लिये दूंगा, वह मेरा मांस है”। इस पर यहूदी यह कहकर आपस में झगड़ने लगे, “कि यह मनुष्य क्योंकर हमें अपना मांस खाने को दे सकता है? यीशु ने उन से कहा; मैं तुम से सच सच कहता हूं जब तक मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ, और उसका लोहू न पीओ, तुम में जीवन नहीं” (यूहन्ना ६ : ५१, ५२, ५३)।

यीशु आत्मिक भोजन की बात कर रहे थे। फरिसी लोग उजाड़ स्थान में मन्ना के आश्चर्य कर्म को जानते थे, लेकिन यह आश्चर्य कर्म होने के बावजूद भी सिर्फ शरीर के लिये भोजन था। आत्मिक भोजन क्या होता है, वे नहीं जानते थे। यह उनके भोजन में समावेश नहीं था। उन्होंने भी उनकी बातों को अक्षरशः लिया और उन्हें लगा की यीशु मानव मांस खाने की बात कर रहे हैं ।

यीशु के माता पिता - मेरे पिता का भवन

उसने उन से कहा; “तुम मुझे क्यों ढूंढ़ते थे? क्या नहीं जानते थे, कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है?” परन्तु जो बात उसने उन से कही, उन्होंने उसे नहीं समझा (लुका २:४९, ५०)।

मरियम यीशु की मां थी और युसुफ उनका लेपालक पिता। स्वाभाविक रूप से उन्होंने सांसारिक पिता समझा, पर यीशु अपने उस पिता की बात कर रहे थे जो स्वर्ग में हैं । इस समय तक मरियम और युसुफ परमेश्वर को अपने पिता के रूप में नहीं जानते थे, यदि जानते भी थे तो उन्हें इसकी समझ नहीं थी। यह तो पवित्र आत्मा के काम से ही सम्भव था। पौलुस यह समझता था और उसने लिखा, “क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिस से हम हे अब्बा, हे पिता कह कर पुकारते हैं” (रोमी ८:१५)।

चेले - फरिसियों का खमीर

यीशु ने उन से कहा, देखो; “फरीसियों और सदूकियों के खमीर से चौकस रहना। वे आपस में विचार करने लगे, कि हम तो रोटी नहीं लाए” (मत्ती १६:६,७)।

यीशु फरिसियों की शिक्षा के विषय में बात कर रहे थे, लेकिन जब यीशु ने खमीर शब्द कहा तो चेलों ने समझा यीशु वास्तविक खमीर की बात कर रहे थे। फरिसी जो शिक्षा देते थे, वह एकदम ठीक लगता था। यीशु ने भी कहा था, “शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं। इसलिये वे तुम से जो कुछ कहें वह करना, और मानना; परन्तु उन के से काम मत करना; क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं” (मत्ती २३:२,३)। धर्म शास्त्र के ऐसे दक्ष व्याख्याता किसी बात में गलत कैसे हो सकते थे? गालील के साधारण मछुआरे शायद यह सोचते थे कि फरिसी सब कुछ जानते थे। बाद में जाकर उन्होंने अपना विचार परिवर्तन कर लिया।

उत्तर

निकुदेमुस, सामरी स्त्री, यहूदी लोग, उनके माता पिता, यहां तक कि उनके चेले भी, यीशु किस विषय पर बात कर रहे थे कोई भी समझ पाने में असमर्थ था। वास्तव में यीशु इस बात को जानते थे, और उन्हे यह भी ज्ञात था कि इस समस्या का कोई मानवीय समाधान नहीं था, लेकिन ईश्वरीय समाधान थाः नया जन्म और पवित्र आत्मा! उन्होंने इस संसार में अपने अन्तिम शाम का अधिकांश समय पवित्र आत्मा के आगमन के विषय में बात करते हुए बिताया। “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा। वह मेरी महिमा करेगा, क्योंकि वह मेरी बातों में से ले कर तुम्हें बताएगा। जो कुछ पिता का है, वह सब मेरा है; इसलिये मैं ने कहा, कि वह मेरी बातों में से ले कर तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना १६:१२-१५)।

अन्त में क्या चेलों ने यीशु की बातों को समझा? ना, अभी तक तो नहीं। पवित्र आत्मा के विषय में वे स्पष्ट रूप से समझ नहीं पाये थे, क्योंकि पवित्र आत्मा का अभी तक आगमन नहीं हुआ था।

चेलों में वास्तविक परिवर्तन पेन्तिकोस के दिन आरम्भ हुआ। उस दिन के बाद वे परमेश्वर का राज्य देख सकते थे और उसमें प्रवेश कर सकते थे। वे अब जीवित जल पी सकते थे। वे जीवन की रोटी खा सकते थे। उन्होने पुत्रत्व का आत्मा पिया था जिसके कारण अब वे परमेश्वर को पिता के रूप में पहचान सकते थे, और उन्हें यीशु ही की तरह अब्बा कहकर पुकार सकते थे। अब उनकी आंखें खुल गयी थीं जिससे वे सम्पूर्ण आत्मिक राज्य को देख सकते थे, जो अब तक उनकी नजरों से छुपा हुआ था। अन्त में, यीशु ने उनसे जो कुछ कहा था अब वे सभी बातें समझने लगे थे। अब वे आपस में यह कह रहे थे, “ओह, उनके कहने का तात्पर्य यह था” और “ ओह, मैं देख सकता हूं उस बात से वे क्या कहना चाहते थे”।

पौलुस इसी तरह के अनुभव के विषय में कह रहा था, “परन्तु जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं। परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया; क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जांचता है” (१ कोरिन्थी २:९,१०)।

वर्तमान का क्या?

अभी, २००० वर्षों बाद की अवस्था कैसी है? क्या यीशु की कही हुई बातें आज हम सभी समझते हैं? शताब्दियों से चले आ रहे थियोलोजिकल सेमिनरी, बाइबल कॉलेज और अत्यधिक अध्ययन एवं खोज क्या सभी चीजें स्पष्ट कर पाये हैं? बड़ी संख्या में स्थापित विभिन्न सम्प्रदाय और भिन्न भिन्न मंडलियों की विभिन्न शिक्षायें इस बात के मजबूत प्रमाण हैं कि आज भी कोई परिवर्तन नहीं है। “उनकी कही बातें वे नहीं समझ पाये” अपने आपको ईसाई कहने वाले बहुतायत लोगों के लिये आज भी वही अवस्था है।

बुनियादी समस्या आज भी वही है जब यीशु अपने चेलों के साथ इस दुनिया में थे, उस समय था। पौलुस की कही हुई बातः “शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता” आज भी उतना ही सत्य है, जितना उसके लिखते समय था। स्वाभाविक रूप से मनुष्य आत्मिक सत्यता के लिये अन्धा है, और जब तक उसकी आंखें खुल नहीं जातीं, वह इन्हें देख नहीं सकता। या, फिर यीशु के शब्दों में, “मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता”

आज सिर्फ यही भिन्नता है कि यीशु के शब्दों से हम सब परिचित हो गये हैं। हरेक पास्टर, धर्म सेवक, याजक, बाइबल शिक्षक और धर्मशास्त्र के ज्ञाता, सब जानते हैं कि यीशु ने कहा कि निकुदेमुस को नया जन्म लेने की आवश्यकता है, परन्तु बहुत से पास्टर, धर्म सेवक, याजक इत्यादि स्वयं नया जन्म नहीं पाये हैं । ये सभी धार्मिक विशेषज्ञ यह जानते हैं कि पेन्तिकोस के दिन यीशु के चेलों के ऊपर पवित्र आत्मा उतरे थे, लेकिन इनमें से किसी का भी पवित्र आत्मा के आगमन और उनकी शक्ति के साथ दूर दूर तक कोई अनुभव नहीं है, कि वे यीशु की बातों के अर्थ पर प्रकाश डाल सकें।

जिन लोगों ने नया जन्म लिया है और पवित्र आत्मा द्वारा अंतर्दृष्टि पायी है, वे सब यीशु के वचन का अर्थ समझने की अवस्था में रहेंगे। दूसरों के लिये ऐसा नहीं है। वे अनजान ही बने रहेंगे। लेकिन क्योंकि अपना मुंह बन्द नहीं रख सकते, यीशु की बातों का वैकल्पिक अर्थ निकालेंगे। स्वर्गीय सत्यता से अनभिज्ञ होने के कारण, इसके स्थान पर वे सांसारिक बातें रखेंगे।

हम कुछ उन्हीं विषयों पर विचार करेंगे जो पहले हमने देखा था और जानेंगे कि इनका अर्थ क्या है।

नया जन्म

शताब्दियों से बहुतों ने नया जन्म का अनुभव पाया है और कम से कम स्वर्ग का राज्य तो देखना आरम्भ किया है। दूसरे लोग, बहुत से धर्मशास्त्र के ज्ञाता और धर्म गुरु सहित, वास्तव में यीशु के द्वारा बोले वचन से परिचित हैं, लेकिन किसी तरह का अनुभव नहीं है। शब्दों के अर्थ अक्षरशः लेकर वे निकुदेमुस की भूल कदापि नहीं दोहरायेंगे। इसके बदले वे कोई वैकल्पिक सांसारिक अर्थ ढूढ़ेंगे।

बहुत से लोगों का विश्वास है कि बपतिस्मा लेते समय अपने आप नया जन्म हो जाता है, और अपने बच्चों के बपतिस्मा के लिये शीघ्रता दिखाते हैं । मेरी इच्छा के बिना एक महीने की उम्र में मेरा बपतिस्मा हो गया था, परन्तु अठारह वर्ष बाद मैंने नया जन्म पाया था। लाखों, या शायद करोड़ों लोगों को जन्म के समय ही बपतिस्मा दे दिया जाता है, जिनमें हिटलर और मुगाबे भी हैं । लेकिन ऐसा नहीं लगता कि उनका नया जन्म हुआ था।

कुछ लोग विश्वास करते हैं कि धर्म कर्म के काम करने से या अपना मण्डली बदल लेने से नया जन्म होता है। पौलुस के जीवन में आया बाहरी परिवर्तन ये जानते हैं जब वह विश्वासियो को सताना छोड़कर यीशु के पीछे चलने लगा, लेकिन उसके अन्दर जो पूर्ण परिवर्तन आया था, ये नहीं समझ सकते।

शारीरिक जन्म के समय एक बच्चा संसार में आता है और आते ही अपने आस पास की चीजों को देखने लगता है। आरम्भ में उसकी कोई भाषा नहीं होती और जो देखता है उसे बहुत कम ही समझता है। उसे सीखने के लिये असीमित चीजें हैं और इसमें वर्षों लग जाते हैं, लेकिन समय पूरा होने पर अपने बचपन में देखी गयी चीजों और कल्पनाओं से कही अतुलनीय चीजें वह सिख जायेगा।

किसी के नया जन्म पाने पर वास्तव में ऐसा ही होता है। उसका जन्म आत्मिक क्षेत्र में होता है और वह आत्मा की चीजों को देखना आरम्भ करता है। यदि उसे ठीक भोजन मिला तो वह आत्मिक समझ में बढ़ता जायेगा, और यीशु की कही बातों को समझने की क्षमता पायेगा, और इससे भी बहुत आगे धर्मशास्त्र की और पूरे संसार की बातें भी समझेगा।

आत्मिक भोजन

प्रत्येक धार्मिक अगुआ और वास्तव में हरेक व्यक्ति जो नियमित चर्च जाते हैं, निश्चय ही यीशु के ये शब्द सुने होंगे, “उनका मांस खाना” और “उनका लहू पीना”, लेकिन सिर्फ ऐसे लोग जिनका नया जन्म हुआ है और जो आत्मिक भोजन लेते हैं, इन शब्दों के ठीक अर्थ समझ पाने में सक्षम होंगे। जो ऐसे नहीं हैं, वे इन शब्दों के अर्थ “प्रभु भोज” के रूप में लेंगे। बहुतों का विश्वास है कि रोटी और दाख मद्य आश्चर्य कर्म के द्वारा यीशु के शरीर और उनके लहू के रूप में परिवर्तन हो जाते हैं ।

दूसरे लोग ऐसे हैं जिन्हें शिक्षा दी गयी है कि बाइबल उनका आत्मिक भोजन है। यह बात ठीक लगती है और कुछ हद तक ठीक है भी, लेकिन यीशु के कहने का तात्पर्य यह नहीं था। उन्होंने यह नहीं कहा, “बाइबल जीवन की रोटी है”। उन्होंने कहा, “जीवन की रोटी मैं हूं”। उन्होंने ऐसा नहीं कहा, “जब तक तुम बाइबल नहीं पढ़ोगे, तुममें जीवन नहीं होगा”। उन्होंने कहा, “जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस नहीं खाओगे और उसका लहू नहीं पीओगे, तुममें जीवन नहीं होगा”।

बाइबल परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिया गया एक बहूमूल्य उपहार है जो महान् आशीष का स्रोत है, लेकिन हमें इसे यीशु की जगह रखकर आत्मिक भोजन कभी नहीं समझना चाहिए। (The Scriptures and the Word of God देखें।)

तो उनका मांस खाने और उनका लहू पीने का अर्थ क्या है? सिर्फ पवित्र आत्मा ही हमें सिखा सकते हैं ।

मेरे पिता का भवन

बहुत से व्यक्ति परमेश्वर के पितृत्व के विषय में सिर्फ मानसिक ज्ञान रखते हैं । परमेश्वर के सांसारिक पिता होने का विचार जो अपने सन्तान को प्रेम करते हैं और उनकी सारी आवश्यकताएं पूरी करते हैं, समझने में आसान है। परमेश्वर के पितृत्व का अनुभव सिर्फ इसकी शिक्षा की तुलना में बेहतर है। सिर्फ अनुभव ही हमारी अन्दरूनी आवश्कताओं को पूरा कर सकता है। हम इसका अनुभव कैसे कर सकते हैं? सिर्फ नया जन्म लेकर।

लेकिन परमेश्वर का भवन कहाँ है? जब रोम के सैनिकों ने ७० ईस्वी में यहूदी मन्दिर नष्ट कर दिया था, तब क्या वे बेघर हो गये थे? कोई बात नहीं। अनेकों कैथडरल, गिरजा घर, और प्रार्थना स्थल हैं, इसके साथ साथ मन्दिर और मस्जिद भी हैं, यदि वह इन भवनों में रहना चाहें। और करोड़ों लोगों का विश्वास है कि वह इन्हीं में वास करते हैं । जिन्हें पवित्र आत्मा का भरपूरी मिला है, वे जानते हैं कि वह इनमें वास नहीं करते। आश्चर्यों का आश्चर्य, वह हमारे अन्दर वास करना पसन्द करते हैं ।

फरिसियों का खमीर

बाइबल में उल्लेखित फरिसी अपनी शिक्षाओं के साथ बहुत पहले इस संसार से चले गये हैं, लेकिन उनके आधुनिक वंशज आज भी मौजूद हैं ।

मत्ती २३: १-३६ में सिर्फ फरिसियों के विषय में चर्चा की गयी है। आठ बार हम यह वाक्यांश पाते हैं, “हे कपटी शास्त्री और फरिसियों, तुम पर हाय!” यीशु को इस तरह अपने समय के प्रतिष्ठित बाइबल शिक्षकों को प्रताड़ित करते देख चेले आश्चर्यचकित रह गये होंगे। बाइबल के ये विद्वान् गलत कैसे हो सकते थे? ये ऐसे लोग थे जो मूसा की कुर्सी पर बैठते थे, लम्बी लम्बी प्रार्थनाएं करते थे, अपने सभी सम्पत्ति का दशमांश देते थे, व्यवस्था की छोटी छोटी बातें भी जानते थे, एक व्यक्ति के धर्मान्तरण के लिये समुद्र पार तक की यात्रा करते थे। फिर भी इन्हीं लोगों ने यीशु को क्रूस पर चढ़ाने की मांग की थी।

आज के फरिसी भी आत्मा में ऐसे ही हैं । वे अपनी शिक्षा में बाहरी रूप से पूर्ण रूप से ठीक हैं, लेकिन उनके अपने ही जीवन में कोई अन्दरूनी सत्यता नहीं है। जो पवित्र आत्मा के द्वारा सिखाए जाते हैं और परमेश्वर के साथ अन्दरूनी सत्यता अनुभव करते हैं, वे ही इस अन्तर को परख सकते हैं । वे पहचान पायेंगे कि ऐसी शिक्षा में उनके मानसिक लाभ के लिये बहुत कुछ है पर उनके आत्मिक विकास के लिये कुछ भी नहीं है और यीशु के द्वारा दी गयी चेतावनी समझ जायेंगे। दूसरे लोग सिर्फ अंधों के पीछे चलने वाले अन्धे ही बने रहेंगे और विश्वास करेंगे कि उन्हीं के पास सत्यता है।

कुछ और गलतफहमियाँ

क्या यीशु ने कुछ और भी बातें कही हैं जो हम नहीं समझ पाये हैं?

पृथ्वी पर अपने अन्तिम रात यीशु ने इन शब्दों से अपने चेलों को सान्त्वना दी थी। “तुम्हारे मन विचलित न हों” और “मैं तुम्हें लेने फिर आऊंगा” (यूहन्ना १४:१,३)। क्या उनका अर्थ सशरीर, भौतिक रूप में आने से था? आरम्भिक मण्डली उनके भौतिक आगमन की आशा करता था, और बहुत सारे विश्वासी आज भी वैसी ही आश लगाये बैठे हैं । लेकिन एक मिनट ठहरिये! उन्होंने चेलों को यह कहकर सान्त्वना दी थी कि वे उनसे दूर जायेंगे और फिर आकर उन्हें अपने साथ ले जायेंगे, लेकिन करीब २००० वर्ष बीत गये हैं और वह अभी तक नहीं लौटे हैं - कम से कम शरीर में तो नहीं। मैं तो इसे प्रतिज्ञा पूरी करना नहीं मानता। लेकिन यूहन्ना १४ में थोड़ा और आगे पढ़िए। “मैं तुम्हें अनाथ नहीं छोड़ूंगाः मैं तुम्हारे पास आऊंगा ”(१८)। “मेरे पिता उससे प्रेम करेंगे और हम उसके पास आयेंगे और उसके साथ वास करेंगे”(२३)। इसके बाद की बिदाई की बातें पवित्र आत्मा के आगमन से सम्बन्धित थी - शांति दाता। यीशु ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और अपने आत्मा में पेन्तिकोस के दिन दूसरी बार आये और उनके चेलों ने आश्चर्यजनक रूप से सान्त्वना पाया। उनके हृदय में अब किसी तरह की अशांति नहीं थी। (इस विषय पर मैंने The Coming of the Lord में लिखा है।)

यीशु ने कहा, “जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा” (मर्कुस १६:१६)। लेकिन किस प्रकार का बपतिस्मा? पानी का या फिर पवित्र आत्मा का? अधिकांश लोग हमेशा पानी के बपतिस्मा की कल्पना करते हैं, लेकिन इसका कारण यह हो सकता है मंडलियां प्रायः पानी का बपतिस्मा जानती हैं, और पवित्र आत्मा के बपतिस्मा के विषय में बहुत कम। यीशु ने क्रूस पर अपने बगल के चोर से कहा था, “तुम आज मेरे साथ स्वर्ग लोक में रहोगे”, लेकिन निश्चय ही उसने पानी का बपतिस्मा नहीं लिया था। पानी के बपतिस्मा का अपना विशेष स्थान है, लेकिन यह पवित्र आत्मा के बपतिस्मा का विकल्प नही है। रोमी ६:१-४ बपतिस्मा के विषय में बताता है, और अधिकांश व्यक्ति इसे पानी का बपतिस्मा मान लेते हैं, लेकिन सिर्फ पवित्र आत्मा ही इस अध्याय में वर्णन किए गये आशीष ला सकते हैं । (मैंने इस विषय पर भी Baptism- Shadows and Substance में लिखा है।)

और कितनी बातें हैं जो यीशु ने कही और हम नहीं समझ पाये हैं? मेरा विश्वास है ऐसी बहुत सी बातें हैं ।

सारांश

जब यीशु इस संसार में थे, उन्होंने स्वर्ग के राज्य के विषय में बातें कीं और शिक्षा दी। बारम्बार उनके श्रोता उनकी बातें नहीं समझ पाते थे। इसके दो कारण हैं: पहला कारण - उनका नया जन्म नहीं हुआ था और वे स्वर्ग का राज्य नहीं देख सकते थे, दूसरा कारण - उन्हें पूर्ण सत्यता में अगुआई करने के लिये पवित्र आत्मा का आगमन अभी नहीं हुआ था। पेन्तिकोस के दिन ये सारी बातें परिवर्तन होना आरम्भ हो गयीं। चेलों ने न सिर्फ उनकी सिखायी बातों को समझना आरम्भ कर दिया, वरन् वे पुराने नियम को भी नयी रीति से अच्छी तरह समझने लगे थे।

उन दिनों से लेकर अब तक करोड़ों लोगों ने यीशु के वचन और धर्मशास्त्र की बहुत सी बातें पढ़ी हैं । बहुत से लोगों ने निर्विवाद रूप से नया जन्म पाया है और स्वर्ग का राज्य देखा है और जो उन्होंने जो पढ़ा और सुना है उसे समझा है। दूसरे लोग अन्धकार में ही रह रहे हैं ।

बहुतों ने, शायद लाखों ने अपनी पढ़ी हुई बातें दूसरों को सिखायी हैं । कुछ व्यक्तियों ने इन बातों को समझा है और अपने श्रोताओं के लिये आशीष और समझ लाया है। दूसरे लोग अन्धे लोगों के लिये अन्धे अगुए बनकर रह गये हैं । स्वर्गीय वास्तविकताओं को नहीं देख सकने के कारण इन्होंने उनकी जगह सांसारिक चीजें रख दी हैं । आत्मिक सत्यता के स्थान पर इन्होंने शारीरिक विकल्प पाया है। नया जन्म का स्थान बपतिस्मा ले लेता है, आत्मिक भोजन की जगह भौतिक रोटी और दाख मद्य, परमेश्वर के भवन के बदले मण्डली भवन और ऐसी कितनी चीजें हैं जिन्हें ईश्वरीय स्तर से मानवीय स्तर पर नीचे गिरा दिया गया है।

हम यीशु के वचन और धर्मशास्त्र की और बाकी बातें तभी समझ सकते हैं, जब पवित्र आत्मा के द्वारा हमारा नया जन्म हो और पवित्र आत्मा ही के द्वारा हम क्रमिक रूप से सत्यता में आगे बढ़ें। पौलुस ने कोरिन्थियों को लिखा, “परन्तु जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं। परन्तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया; क्योंकि आत्मा सब बातें, वरन परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जांचता है” (१कोरिन्थी २:९,१०)। और उसने एफिसियों के लिये प्रार्थना की, “कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर जो महिमा का पिता है, तुम्हें अपनी पहचान में, ज्ञान और प्रकाश का आत्मा दे। और तुम्हारे मन की आंखें ज्योतिर्मय हों कि तुम जान लो कि उसके बुलाने से कैसी आशा होती है, और पवित्र लोगों में उस की मीरास की महिमा का धन कैसा है” (एफिसी १:१७,१८)। वह जानता था कि उसकी लिखी बातों को या और किसी आत्मिक सत्यता को समझने के लिये और कोई उपाय नहीं था। आइये हम अपने लिये भी यही प्रार्थना दोहराएं।

इस पुस्तक मुद्रण के लिए रंगिन [Colour] फ़ाइल

इस पुस्तक मुद्रण के लिए श्‍याम-स्‍वेत [Black & White] फ़ाइल