धर्मशास्त्र और परमेश्वर का वचन

परिचय

यह वाक्यांश “परमेश्वर का वचन” नया नियम में करीब ५० बार उपयोग हुआ है और मसीही पुस्तकों, सन्देश और साधारण प्रवचनों में न जाने कितनी बार। इस वाक्यांश को क्या ईसाई लोग उसी अर्थ में उपयोग करते हैं जिस अर्थ में बाइबल में किया गया है? मुझे लगता है, ऐसा नहीं है। क्या यह बात महत्त्वपूर्ण है? मुझे लगता है, हां

बाइबल में उपयोग किये गये शब्दों या वाक्यांशों को तोड़ मरोड़ कर उनका अर्थ हम अपने पुरातन पन्थी विचारों के अनुरूप नहीं बना सकते। धर्मशास्त्र के प्रेरणा और अधिकार पर विश्वास करना और फिर इसके शब्दों को मूल अर्थ से पूरी तरह भिन्न अर्थ में उपयोग करना एकदम व्यर्थ है।

साधारण अर्थों में वाक्यांश “परमेश्वर का वचन”, या सिर्फ “वचन” का अर्थ बाइबल है। यह ऐसे सभी लोग जो बाइबल के प्रेरणा और इसके अधिकार पर विश्वास करते हैं, उनके बीच उपयोग होने वाला सामान्य शब्दार्थ है।

सर्वप्रथम मैं यह दिखाना चाहता हूं कि खुद बाइबल में “परमेश्वर का वचन” वाक्यांश का अर्थ बाइबल नहीं होता, लेकिन इसका दूसरा अर्थ है, उसके बाद हम लोग परमेश्वर के वचन का अर्थ और उसका उपयोग पता लगाएंगे, फिर उसके बाद धर्मशास्त्र का सही स्थान और उसका उपयोग जानेंगे। पवित्र आत्मा इस काम में हमें समझ दें।

स्पष्टीकरण

“बाइबल परमेश्वर का वचन है” और “परमेश्वर का वचन बाइबल है”। इन दोनों वाक्यों का अर्थ एक ही है, ऐसा लगता है, लेकिन तर्कशास्त्र का कोई भी विद्यार्थी कह देगा कि ऐसा नहीं है। “सभी कुत्ते जानवर हैं” यह सत्य है, पर “सभी जानवर कुत्ते हैं” स्पष्ट रूप से गलत है। “सभी अपराधी मनुष्य हैं” सत्य है, पर “सभी मनुष्य अपराधी है” यह बड़े आनन्द की बात है कि गलत है। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि “बाइबल परमेश्वर का वचन नहीं है”। मेरा कहना सिर्फ इतना है कि कम से कम इसके बुनियादी अर्थ में “परमेश्वर का वचन” बाइबल नहीं है। बाइबल अपने आपको “परमेश्वर का वचन” सम्बोधन नहीं करती।

धर्मशास्त्र में “परमेश्वर का वचन”

शायद मत्ती १५:६ और इसी के समरूप भाग मर्कुस ७:३ मे बाइबल अपने आप को परमेश्वर का वचन सम्बोधन करने के करीब आती है। इस भाग को पूरी तरह उद्धृत करना उचित होगाः

“उसने उन को उत्तर दिया, कि तुम भी अपनी रीतों के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो? क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, कि अपने पिता और अपनी माता का आदर करना: और जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए। पर तुम कहते हो, कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, कि जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुंच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाई जा चुकी। तो वह अपने पिता का आदर न करे, सो तुम ने अपनी रीतों के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया”।

पहली दृष्टि में हम धर्मशास्त्र को परमेश्वर के वचन के अर्थ में ले सकते हैं । लेकिन आगे खोज करने पर यह पद परमेश्वर के द्वारा कहे गये शब्दों की ओर दिखाता है, जो उन्होंने पूरे इजराइल और सारे संसार के लिये मूसा से कहा था, “अपने माता पिता का आदर करना”। यीशु ने ये शब्द धर्मशास्त्र के बदले साधारण शब्द के रूप में उपयोग नहीं किये।

इस एक पद के विरोध में ऐसे बहुत से भाग हैं जहां “परमेश्वर का वचन” धर्मशास्त्र के लिये उपयोग नहीं किया गया है। उदाहरण के लिये, “और परमेश्वर का वचन हियाव से सुनाते रहे” (प्रेरित ४:३१), “परमेश्वर का वचन यहूदियों की अराधनालयों में सुनाया” (प्रेरित १३:५), “अवश्य था, कि परमेश्वर का वचन पहिले तुम्हें सुनाया जाता” (प्रेरित १३:४६), “परमेश्वर का वचन निधड़क सुनाने का और भी हियाव करते हैं” (फिलिपियो १:१४), “ परन्तु परमेश्वर का वचन कैद नहीं” (२ तिमुथियुस २:९), और सबसे बढ़कर, “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा किया” (यूहन्ना १:१४) और “और उसका नाम परमेश्वर का वचन है” (प्रकाशित वाक्यः १९: १३)।

प्रेरित १७:११ में “वचन” शब्द और धर्मशास्त्र दोनों एक साथ उल्लेख किये गये हैं, “उन्होंने बड़ी लालसा से वचन ग्रहण किया, और प्रति दिन पवित्र शास्त्रों में ढूंढ़ते रहे कि ये बातें यों ही हैं, कि नहीं”। यहां “वचन” का अर्थ सम्भवतः धर्मशास्त्र नहीं हो सकता।

हिब्रू भाषा का पुराना नियम तीन भागो में विभाजित किया गया है, व्यवस्था (תּוֹרָה - तोराह), भविष्यवक्ता (נבִיאִים- नवीइम) और लिखी बातें (כתובִים- क्तुवीम)। जब नये नियम के लेखक पुराने नियम की बातें करते हैं तो वे सम्पूर्ण पुराने नियम के लिये साधारणतया “लिखी बातें” शब्द उपयोग करते हैं (यूनानी शब्द γραφαι (ग्राफाइ) - जिसका अनुवाद प्रायः शास्त्र किया जाता है)। वे व्यवस्था और भविष्यवक्ता शब्द भी विशेष उद्धरण के लिये उपयोग करते हैं । वे कभी भी “परमेश्वर का वचन” वाक्यांश का उपयोग नहीं करते।

पुराने नियम में भजन संग्रह ११९ धर्मशास्त्र को “परमेश्वर के वचन” के रूप में उपयोग करने के विचार के पक्ष में दिखता है। करीब करीब इसके सारे १७६ पदों में ये शब्द समावेश हैं: व्यवस्था, साक्षी, मार्ग, विधि, नियम, आज्ञा, न्याय, वचन, कानून। इससे वचन “शब्द” को व्यवस्था, साक्षी, आज्ञा आदि शब्दों के समकक्ष रखकर देखने में बल मिलता है, इससे सम्पूर्ण बाइबल को परमेश्वर के वचन के रूप में रखने का पर्याप्त औचित्य नहीं दिखता।

सारांशः बाइबल अपने आप को धर्मशास्त्र, पवित्र धर्मशास्त्र, या व्यवस्था और भविष्यवक्ताओं का एक भाग के रूप में स्वीकार करती है, लेकिन अपने आप को “परमेश्वर के वचन” के रूप में सम्बोधन नहीं करती। इसके पन्नों में इस वाक्यांश का अर्थ कुछ दूसरा है। बाइबल अपने आप को पवित्र आत्मा के प्रेरणा से अक्षरशः लिखी गयी और ईश्वरीय अधिकार वाली मानती है, और मैं इस बात को बलपूर्वक कहना चाहता हूं कि इन सच्चाइयों पर मैं किसी प्रकार का प्रश्न चिह्न खड़ा नहीं करता।

वचन का असली अर्थ

यदि परमेश्वर के वचन का अर्थ बाइबल नहीं है तो फिर इसका अर्थ क्या है?

परमेश्वर ने जो सबसे बड़ा वचन बोला है वह उनके पुत्र हैं । परमेश्वर के वचन का सबसे महान् अभिव्यक्ति यीशु हैं । प्रेरित यूहन्ना ने अपने सुसमाचार की पुस्तक इस प्रकार आरम्भ की: “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था”। कुछ पदों के बाद उसी अध्याय में हम पढ़ते हैं: “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा”। प्रकाशित वाक्य १९:१३ यीशु को वही उपमा देती है, “और उसका नाम परमेश्वर का वचन है”। इब्रनियो १:२ और ११:३ ऐसा ही प्रभाव डालते हैं, “इन दिनों के अन्त में हम से पुत्र के द्वारा बातें की, जिसे उसने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया और उसी के द्वारा उसने सारी सृष्टि रची है”, “विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है”

यीशु परमेश्वर के वचन के सर्वोच्च और केंद्रीय अभिव्यक्ति हैं । उस वचन के सारे अभिव्यक्ति उन्हीं से सम्बन्धित हैं । परमेश्वर ने किसी व्यक्ति के द्वारा या किसी व्यक्ति से जो कुछ बोला है उसे वर्णन करने के लिये धर्मशास्त्र में “परमेश्वर का वचन” वाक्यांश का उपयोग किया गया है। उदाहरण के लिये, “परमेश्वर का वचन मूसा के पास आया”, “जङ्गल में परमेश्वर का वचन यूहन्ना के पास आया”, “मलाकी के द्वारा परमेश्वर का वचन इजराइल के पास पहुंचा”, या, “आमोस के वचन जो उसने इजराइल के सम्बन्ध में देखा”

जब परमेश्वर बात करते हैं, इसे “परमेश्वर का वचन” कहते हैं । पुराने नियम में परमेश्वर ने भविष्यवक्ताओं से सीधे बात की। उनके द्वारा परमेश्वर ने दूसरों से बात की। विभिन्न घटनाओं के द्वारा भी उन्होंने विभिन्न व्यक्तियों के जीवन में और विभिन्न देशों से बात की। यह अवस्था आवश्यक रूप से पेन्तिकोस के दिन तक रहा, जब पवित्र आत्मा सब के ऊपर उंड़ेले गये। जिनसे वे सीधा बात करना चाहते हैं उनका दायरा सभी विश्वासियो तक बढ़ा दिया गया है। अब यह सिर्फ गिने चुने भविष्यवक्ताओं या अगुओ तक सीमित नहीं है पर जन साधारण भी समावेश किये गये हैं ।

इस बात पर विश्वास करना कि परमेश्वर एक पुस्तक को अपने सन्देश आदान प्रदान करने के लिये बुनियादी माध्यम के रूप में उपयोग करना चाहते हैं, न सिर्फ धर्मशास्त्र के विपरीत है बल्कि प्रकृति और तर्क शक्ति के भी उलट है। साधारणतया लिखकर सन्देश आदान प्रदान करना अच्छा उपाय नहीं माना जाता, यह स्थूल और लचक विहीन होता है। अधिकांश अवसर पर बातचीत करना बेहतर होता है और जहां तक मुझे लगता है, ९० प्रतिशत मानवीय संवाद इसी उपाय से होता है। लिखित उपाय उस समय के लिये अच्छा है जब आप स्थायी प्रमाण चाहते हों। यह मानवीय याददाश्त खोने पर काम लगता है और झगड़े को सुलझाने में भी।

और बहुत सी बातें इस बात को निश्चित करती हैं कि बाइबल संवाद करने के लिये परमेश्वर का बुनियादी उपाय नहीं है। मानव जाति का एक छोटा हिस्सा, और उसमें भी बहुत कम मसीहियों के पास बाइबल है। पिछले शताब्दी से पहले जब बहुत कम साक्षर थे, बाइबल रखने वालों की संख्या और भी कम थी। छापाखाना के आविष्कार होने और धार्मिक सुधार होने से पहले व्यक्तिगत बाइबल रखने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, और जो बाइबल उपलब्ध थे वे भी लैटिन भाषा में। आज भी जिन थोड़े सुविधा प्राप्त लोगों के पास अपनी बाइबल है, उनके साथ भी समस्या है। हमारे बाइबल प्रेरित किये गये मूल भाषा में उपलब्ध नहीं हैं पर अनुवाद हैं जिनमें त्रुटि हो सकती है। सर्वश्रेष्ठ विद्वान् भी प्राचीन मूल भाषा उतनी अच्छी तरह नहीं जान सकते जितनी अच्छी तरह एक बच्चा अपनी मातृभाषा में बोलता है, क्योंकि उसके पास बहुत कम अध्ययन सामग्री उपलब्ध है। उस विद्वान् के पास सीमित संख्या में प्राचीन हस्तलिपि उपलब्ध होते हैं, जबकि एक बच्चा असीमित शब्दों से घिरा रहता है। जितना अच्छा हमें अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है, यदि कोई विद्वान् उतनी ही अच्छी तरह यूनानी और हिब्रू भाषा जानता हो, फिर भी एक भाषा से दूसरे भाषा में ठीक ठीक अर्थों में अनुवाद करना प्रायः असम्भव है। जो आश्चर्यजनक पुस्तक परमेश्वर ने हमारे हाथों में दी है, उसके ऊपर उन्होंने एक सीमा लगा दी है, क्योंकि उनके पास इससे भी कुछ अच्छा और महान् है।

मैं इस बात पर फिर जोड़ देना चाहता हूं कि बुनियादी रूप से परमेश्वर उनसे जिनके पास सुनने के लिये कान हैं, अपनी आत्मा के द्वारा सीधा बात करना चाहते हैं, और फिर उनके द्वारा और लोगों से।

जब धर्मशास्त्र में प्रेरित और भविष्यवक्ता पवित्र आत्मा के प्रेरणा के अन्तर्गत बात करते थे तो उनके द्वारा परमेश्वर बात किया करते थे। वे जो कुछ कहते थे, उनके श्रोताओं के लिये वे परमेश्वर के वचन थे। जब आज कोई स्त्री या पुरुष पवित्र आत्मा के प्रेरणा से बोलता है, यह भी जिसके लिये बोला गया है उसके लिये परमेश्वर का वचन है। जब परमेश्वर हमारे हृदय मे पवित्र आत्मा के द्वारा सीधा कोई सन्देश देते हैं तो वह भी उनका वचन है।

जब जङ्गल में शैतान ने यीशु के आगे धर्मशास्त्र से वचन उद्धृत किये, तब यह परमेश्वर का वचन नहीं था, यह शैतान का वचन था। जब आज धर्मशास्त्र से वचन उद्धृत किये जाते हैं, तो कभी कभी यह सुनने वालों के लिये परमेश्वर का वचन होता है। कभी कभी यह सिर्फ मनुष्य का वचन होता है और कभी कभी यह शैतान का वचन भी हो जाता है।

जाने पहचाने पद नये प्रकाश में

इस प्रकार परमेश्वर के वचन स्वयं यीशु हैं और जो कुछ परमेश्वर बोलते हैं । इस समझ के साथ हम धर्मशास्त्र के कुछ भाग नयी ज्योति में देखेंगे। इनमें से कुछ पदों पर मैं विचार करूंगा, कुछ दूसरे पद आप स्वयं कन्कर्डेन्स की सहायता से देख सकते हैं ।

“मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा” (मत्ती ४:४)।

बुनियादी रूप से यह पद यीशु पर लागू होता है। कितनी अच्छी तरह यह उनके शब्दों से मेल खाता है, “मैं जीवन की रोटी हूं मैं जीवित रोटी हूं जो स्वर्ग से उतरा है, यदि कोई यह रोटी खाए तो वह जीवित रहेगा” और “आज हमारे लिये दिन भर की रोटी दे”। यीशु वह आत्मिक भोजन हैं जिसे खाकर हम जीवित रहते हैं । जब परमेश्वर हमसे बोलते हैं, हम जीवन पाते हैं । “जिस के पास पुत्र है, उसके पास जीवन है; और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है” (१ यूहन्ना ५:१२)।

बाइबल पाठ का एक लोकप्रिय शृंखला है “आज की रोटी”। इस नाम का अर्थ यह है कि बाइबल हमारे लिये आत्मिक भोजन है। यह उस सोच का तर्कसंगत परिणाम है जहां बाइबल को परमेश्वर का वचन माना जाता है। बहुत से लोग, बड़े दुख के साथ कहने पड़ता है, विश्वास जनक रूप से प्रत्येक दिन बाइबल पढ़ते हैं, लेकिन भोजन के रूप में खा नहीं पाते, क्योंकि उन्होंने कभी भी यीशु को खाना नहीं सिखा। उन्होंने स्वयं कहा है, “तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है। फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते (यूहन्ना ५:३९,४०)। फरिसी लोग बाइबल के बहुत बड़े पढ़ने वाले और शिक्षक थे, लेकिन जब यीशु ने कहा, “जब तक तुम मेरा मांस नहीं खाते और लहू नहीं पीते, तुम जीवन नहीं पा सकते”, वे बुरी तरह क्रोधित हुए। बाइबल पढ़ना और अध्ययन करना अच्छी बात है। बाइबल को यीशु का स्थान देना मूर्तिपूजा है।

दूसरी बात, यह पद पवित्र आत्मा के प्रेरणा में बोले गये किसी भी शब्द पर लागू होता है। जो सुनते हैं वे भोजन खाते हैं, और उनका भोजन परमेश्वर का वचन होता है।

वृद्धि के लिये भोजन आवश्यक है। परमेश्वर ने मसीह के शरीर के निर्माण के लिये एफिसियों ४ में वर्णन की गयी पांच सेवकाई दी हैं । किसी भी आत्मिक बच्चे के लिये प्रेरितों, भविष्यवक्ताओं, चरवाहों, शिक्षकों और प्रचारकों की आवश्यकता पड़ती है जो उसे परमेश्वर का वचन खिलायें और परिपक्वता तक पहुंचायें। लेकिन जैसे शारीरिक बच्चे के जीवन में होता है, यहां भी दूध खाने की अवस्था से आगे प्रगति कर समय अनुसार ठोस भोजन करने की अवस्था तक पहुंचें ताकि परिपक्व होकर वह स्वयं अपना भोजन कर सकें।

“परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है” (इब्रानियो ४:१२)।

आइये इस पद पर हम फिर विचार करें। पहली बात, यीशु जीवित हैं और सारा सामर्थ्य उन्हें दिया गया है। प्रकाशित वाक्य में हम पढ़ते हैं कि, “उनके मुख से दोधारी तलवार निकलती है”। उनके सामने कोई भी नहीं ठहर सकता। दूसरी बात, जब हम पवित्र आत्मा के प्रेरणा से बोलते हैं तो हमारे शब्द जीवित और शक्तिशाली होंगे और सुनने वालों के हृदय में प्रवेश करेंगे। लोगों के सामने धर्मशास्त्र उद्धृत करना, परमेश्वर के वचन बोलने की जगह नहीं ले सकता।

“उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सफल करेगा” (यशायाह ५५:११)।

यह पद अद्भुत रीति से यीशु में पूरा हुआ। उन्होंने मनुष्य का रूप लेकर कष्ट सहने, और मरने और फिर जी उठने के लिये पिता की उपस्थिति छोड़ी। वह पिता के पास खाली हाथ नहीं लौटे, लेकिन अपने साथ असंख्य भाइयों को लेकर गये। परमेश्वर ने उन्हें जिस उद्देश्य से भेजा था, वे सारे काम पूर्ण किये।

आज जब कोई स्त्री या पुरुष परमेश्वर का वचन बोलते हैं तो हम निश्चित हो सकते हैं ये शब्द व्यर्थ नहीं जायेंगे, लेकिन परमेश्वर के उद्देश्य पुरा करेंगे। थोड़े से विश्वास योग्य दास जिन्होंने परमेश्वर का वचन बोलना सिखा है, वे उस बड़ी सेना की तुलना में बहुत अधिक काम पूरा करेंगे जो सिर्फ बाइबल या और पर्चा बांटना जानते हैं । ऐसा काम अपनी जगह ठीक है, पर परमेश्वर का वचन बोलना ऊंचे स्तर का काम है।

“क्योंकि तुम ने नाशमान नहीं पर अविनाशी बीज से परमेश्वर के जीवते और सदा ठहरने वाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है” (१ पत्रुस १:२३)।

जब मरियम से गब्रिएल ने परमेश्वर का वचन बोला, उसके अन्दर यीशु का जन्म हुआ। नया जन्म उस समय होता है, जब यीशु, परमेश्वर का वचन, हमारे अन्दर जन्म लेते हैं । साधारणतया परमेश्वर किसी मानव दूत को अपने वचन बोलने के लिये उपयोग करते हैं जो नया जन्म लाता है। यह किसी प्रचारक का विशेष सेवकाई है। इथियोपिया का खोजा यशायाह की पुस्तक में अपना दिमाग लगा रहा था, जब पवित्र आत्मा ने फिलिप को उसके पास भेजा। फिलिप ने उसके सामने “यीशु की प्रचार की”, और उसने विश्वास किया। कुछ थोड़े लोगों के लिये, किसी मानव बिचौलिए के बिना परमेश्वर का वचन जो नया जीवन देता है सीधा आता है, लेकिन हम इन अपवादों को नियम का रूप नहीं दे सकते।

“आत्मा की तलवार जो परमेश्वर का वचन है” (इफिसियो ६:१७)।

यहां आत्मा की तलवार का वर्णन आत्मिक हथियार के एक भाग के रूप में किया गया है। इस पद के आधार पर, कुछ लोगों का मानना है कि आपको हमेशा अपने आत्मिक हथियार के रूप में बाइबल लेकर चलना चाहिये। दूसरे लोगों को ऐसा लगता है उनके घरों में चारों ओर विभिन्न पद लिखे होने से दुष्ट आत्माओं से उन्हें सुरक्षा मिलेगी। ऐसा विचार भय और रूढ़िवादी सोच का परिणाम है न कि किसी सत्यता पर आधारित। आत्मा की सच्ची तलवार हमारे ओठों पर परमेश्वर का प्रेरित वचन है। यह आक्रमणकारी हथियार है जिसके आगे दुष्ट की शक्तियां ठहर नहीं पायेंगी। जब यीशु बोलते थे तब अन्धकार की सारी शक्तियां किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर भागने के लिये बाध्य हो जाती थीं। जब हम यीशु के जैसा ही बोलना सिख जायेंगे, हम भी ऐसा ही प्रभाव देखेंगे।

मूर्ति पूजा

मरियम के प्रति कैथोलिक लोगों की धारणा से बाइबल के प्रति प्रोटेस्टेन्ट लोगों की धारणा का तुलना करना कुछ नयी चीजें सिखाता है। परमेश्वर के उद्धार की योजना में मरियम का एक विशेष और अद्भुत स्थान था। उसके द्वारा यीशु इस संसार में आये और एक अर्थ में मरियम के बिना वे कभी शरीर धारण नहीं कर सकते थे। लेकिन उसे यीशु के समकक्ष रखना और उसकी आराधना करना एवं उसकी मध्यस्थता की आशा करना मूर्ति पूजा है। सिर्फ यीशु ही इनके अधिकारी हैं । सभी किताबों में निश्चय ही बाइबल विशेष है और उनसे इसका स्थान उच्च है, जैसे मरियम और स्त्रियो में विशेष है। फिर भी सत्यता यही है कि यदि हम भी यीशु का पद और स्थान लेकर बाइबल को वहीं रखते हैं तो हम भी मूर्ति पूजा के उतने ही दोषी हैं । मूर्ति पूजा के अन्य स्वरूप के जैसे ही यह भी हमारे आत्मिक वृद्धि और प्रगति को रोक देगा। यदि हम सत्यता मे चलना और परमेश्वर मे बढ़ना चाहते हैं तो हमें परमेश्वर की योजना में धर्मशास्त्र के स्थान और उद्देश्य का पता लगाकर सही तरीके से उपयोग करना आवश्यक है।

धर्मशास्त्र

हमारे जीवन में परमेश्वर के वचन का स्थान और काम के विषय में विचार करने के बाद, अब हमें धर्मशास्त्र के स्थान के विषय में विचार करना आवश्यक है। पौलुस तिमुथियुस को लिखे गये अपने दूसरे पत्र में इस विषय पर प्रकाश डालता हैः “हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए” (३:१६,१७)। इन पदों पर जितना ध्यान दिया जाता रहा है उससे अधिक सावधानी पूर्वक इन पर विचार किया जाना आवश्यक है।

पौलुस यहां धर्मशास्त्र को परमेश्वर के सेवकों के औजार रखने के बक्से के रूप में देखता है। दूसरों की सेवकाई में उपयोग होने वाले औजारों में से यह एक है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि पौलुस ने यह पत्र किसी समूह को न लिखकर एक अगुवा को लिखा। उसने विश्वासियों को साधारणतया कभी भी धर्मशास्त्र अध्ययन करने के लिये उत्साहित नहीं किया है, लेकिन प्रार्थना करने के लिये बारम्बार प्रोत्साहित किया है। तिमुथियुस का उत्तरदायित्व था दूसरों की सेवा करना और धर्मशास्त्र का ज्ञान उसके काम में उसके लिये बहुत लाभदायक प्रमाणित होता।

ऊपर उल्लेखित पदों में धर्मशास्त्र के चार तरह के उपयोग दिखाये गये हैं, जिन्हें हम एक एक कर देखेंगे।

१․ धर्मशास्त्र उपदेश देने के लिये लाभदायक है। तिमुथियुस की जिम्मेदारी बाइबल सिखाने की नहीं थी। इसके लिये फरिसी लोग पर्याप्त थे। लेकिन उसका काम था अपने लोगों को परमेश्वर का प्रकाश और समझ प्रदान करना। वह धर्मशास्त्र को एक साधन के रूप में उपयोग करके उन्हें आत्मिक सत्यता प्रदान कर सकता था। हमने परमेश्वर से जो पाया है उसे दूसरों के साथ बांटने के लिये यदि हम या आप बुलाये जाते हैं तो बाइबल ही वह भाषा है जिसे हम उपयोग कर सकते हैं ।

इब्रानियों को लिखे गये पत्र हमें शिक्षा के लिये धर्मशास्त्र के उपयोग का एक स्पष्ट उदाहरण देता है। इसके लेखक ने पुराने नियम से एक के बाद एक भाग और एक के बाद एक व्यक्ति को उद्धृत करके पुराने नियम की तुलना में नये नियम की श्रेष्ठता और यीशु का स्थान और सभी दूसरों से बहुत ऊपर है, यह दर्शाया है। पौलुस ने भी धर्मशास्त्र के रोमियों और गलातियों के पत्रों का व्यापक उपयोग करके जो प्रकाश उसने परमेश्वर से पाये थे, उनको दर्शाया और प्रमाणित किया है। हम जितना जानते है, यीशु ने धर्मशास्त्र का ऐसा उपयोग सिर्फ उस समय किया था, जब वे इम्माउस के मार्ग पर अपने पुनरुत्थान के बाद दो चेलों के सामने जब धर्मशास्त्र के अर्थ खोले थे।

२․ धर्मशास्त्र समझाने के लिये लाभदायक है। यह बात हम उस समय स्पष्ट देखते हैं जब यीशु जङ्गल में शैतान से मिले थे। उनकी भेंट हुई और उन्होंने प्रत्येक परीक्षा का उत्तर पुराने नियम के पदों को उद्धृत करके दिया था। धर्मशास्त्र लिखित रूप में है और अपने चरित्र के अनुसार अपरिवर्तनीय है, और इसलिये कानूनी रूप से भी उपयोगी है। शैतान यह प्रश्न खड़ा कर सकता था कि क्या यीशु परमेश्वर के पुत्र थे, और क्या वे पवित्र आत्मा की अगुवाई में चल रहे थे। पर जो लिखा हुआ था उसके विरुद्ध उसके पास कोई तर्क नहीं था।

३․ धर्मशास्त्र सुधार करने के लिये भी लाभदायक है। जब यीशु ने अपने विरोधियों के गलत विचारों का सुधार करते थे, वह सदा धर्मशास्त्र का उपयोग करते थे। सबथ के विषय में फरिसियो के कठोर विचारधारा को सुधारने के लिये उन्होंने दाऊद का उदाहरण दिया। सदूकियों को उन्होंने पुराने नियम से दिखाया कि पुनरुत्थान होता है। गलातियों को लिखा गया पौलुस का पत्र इसी प्रकार के सुधार के लिये लिखी गयी चिट्ठी है। इब्राहिम का उदाहरण देकर उसने विश्वास के द्वारा पायी जाने वाली धार्मिकता को स्थापित किया है। समझाने जैसा ही, धर्मशास्त्र सुधार के लिये एक ठोस कानूनी धरातल उपलब्ध कराता है। विशेष अगुवाई और प्रकाश हमेशा जांच करने के लिये खुला रहना चाहिये और आवश्यक है। धर्मशास्त्र एक निश्चित लक्षित स्तर उपलब्ध कराता है जिससे उनकी जांच हो सके।

४․ धर्मशास्त्र किसी बच्चे को धार्मिकता के मार्ग में तालीम देने के लिये भी लाभदायक है। इसके लिये यूनानी शब्द παιδεια (पाइडैअ) का उपयोग किया गया है, जो παις (पाइस) शब्द से बना है (जिसका अर्थ बच्चा होता है) और इसका बुनियादी अर्थ होता है “बच्चे को तालीम देना”। इसके पहले उल्लेखित जिस पद पर हम लोग विचार कर रहे हैं वहां लिखा है, “और बालकपन से पवित्र शास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है”। तिमुथियुस, जिसके लिये ये शब्द लिखे गये थे, वह इस ईश्वर भक्त परिवार का तीसरा पुस्ता था। पौलुस उसकी दादी लुईस और उसकी मां ईयुनिस के आज्ञाकारी विश्वास की बात करता है। शायद इन्हीं दोनों ने विश्वास योग्य रहकर उसे धर्मशास्त्र से सिखाया हो और उसके मन को पहले उद्धार के लिये और फिर व्यापक सेवकाई जो उसे मिलने वाला था, उसके लिये तैयार किया हो। तिमुथियुस अन्ततोगत्वा पौलुस का सहयात्री बन गया। पौलुस के छः पत्रों में सह लेखक के रूप में तिमुथियुस का नाम उल्लेख है। कितने लोग यह मानते हैं कि इब्रानियो का पत्र तिमुथियुस ने लिखा है। आरम्भिक मण्डली में वह एक महत्त्वपूर्ण अगुवा बना और ईफिसुस में पौलुस का बाकी काम पूर्ण किया।

इसी लिये मेरा मानना है कि ईसाई माता पिता को अपने बच्चों को धर्मशास्त्र से शिक्षा देनी चाहिये। उन्हें परमेश्वर की व्यवस्था सिखानी चाहिये। धर्मशास्त्र से उनका उद्धार तो नहीं होगा, लेकिन इससे उन्हें बुद्धि मिलेगी जो उन्हें उद्धार पाने तक पहुंचा देगी। पौलुस ने कहीं कहा है, “व्यवस्था हमें मसीह तक पहुंचाने के लिये शिक्षक के रूप में काम करती है”।

मेरे कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि धार्मिकता के मार्ग का तालीम सिर्फ बच्चों के लिये है। जो लोग आत्मिक रूप से बच्चे हैं उन्हें भी तालीम की आवश्यकता है, जब तक वे आत्मिक रूप से परिपक्व नहीं हो जाते।

शिर या हृदय?

कुछ लोग प्रार्थना करते हैं, “प्रभु, मैं अपने शिर में तो समझता हूं, कृपा कर इन्हें नीचे मेरे हृदय में पहुंचा दे।” यह परमेश्वर के उपाय के विपरीत है। पौलुस ने कुलुस्सियों को लिखा था, “मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो” (३:१६) और इफिसियों को, “विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे” (३:१७)। यदि हम उनका वचन उन विश्वास योग्य सेवकों से ग्रहण करें जो उनके द्वारा सिखाये गये हों, और उसके बाद हमारे स्वर्गीय पिता से संवाद करना सिखे हों तो ऐसा ही होगा। जैसे जैसे उनका वचन अधिक से अधिक हमारे हृदय में वास करेगा, धर्मशास्त्र स्पष्ट होता जायेगा, और हमारा मन समझता जायेगा। यीशु अपने बाल्य काल से ही अपने पिता से संवाद करते आये थे। जब वे बारह वर्ष के थे, मन्दिर के शिक्षक उनकी समझ देखकर आश्चर्यचकित रह गये थे। यदि बाइबल को समझना चाहते हैं तो हमें परमेश्वर की सहायता आवश्यक है, यदि हम परमेश्वर को समझना चाहते हैं तो बाइबल की सहायता आवश्यक नहीं है। आप इस पुस्तक को तब तक नहीं समझ सकते जब तक आप के पास इसके लेखक का मन नहीं है।

आज्ञाएं और प्रतिज्ञायें

जो मैंने कहा है उसका सारांशः लोगों से बोलने का परमेश्वर का बुनियादी उपाय बाइबल पढ़ने के द्वारा नहीं है। वे आरम्भ में अपने सेवकों द्वारा बोलते हैं (प्रेरित, भविष्यवक्ता, चरवाहा, शिक्षक, और प्रचारक) और उसके बाद पवित्र आत्मा के द्वारा सीधा।

मैं यहां दो विशेष उपायों पर चर्चा करना चाहता हूं जिनके द्वारा परमेश्वर बोलते हैं । पूरे धर्मशास्त्र में परमेश्वर ने विभिन्न व्यक्तियों और समूहों को आज्ञाएं और निर्देशन दिये हैं । उन्होंने वाचायें भी बांधीं और प्रतिज्ञायें भी दीं, जिनमें अधिकतर विभिन्न आज्ञाओं के पालन करने का शर्त जुड़ा होता था। कुछ आज्ञाएं जैसे, “अपने पड़ोसी को प्रेम करो” सामान्य हैं । दूसरी आज्ञाएं, जैसे, “अपने पाँव से जुते निकालो” विशेष हैं । बाइबल में की गयी प्रतिज्ञाएं भी इसी तरह की हैं । “तुम प्रार्थना में विश्वास के साथ जो भी मांगोगे, तुम पाओगे”, यह सामान्य है। “मैं तुम्हें इस देश में वापस लाऊंगा” यह विशेष है।

बहुत लोग यह विश्वास करते हैं और शिक्षा देते हैं कि ये सभी आज्ञाएं और प्रतिज्ञायें- या कम से कम जो सामान्य हैं - आज भी हमारे लिये हैं । सम्पूर्ण मण्डली या सम्प्रदाय धर्मशास्त्र को इसी दृष्टिकोण से स्वीकार करते हुए बने हैं । लेकिन फिर हम यही देखते हैं कि धर्मशास्त्र में ही इस बात का कोई आधार नहीं मिलता। निश्चय ही किसी ने भी कभी भी किसी दूसरे को दी गयी आज्ञा पालन करने की या किसी खास प्रतिज्ञा को दावा करने की कोशिश नहीं की है। पुराने नियम में उल्लेखित दस आज्ञा और कुछ दूसरी सामान्य आज्ञाएं और प्रतिज्ञायें नये नियम में उद्धृत की गयी हैं । लेकिन जो सामान्य सिद्धान्त है, जैसा हमने देखा है, परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा बोलते हैं । यदि उन्होंने हमसे पवित्र आत्मा के द्वारा बात नहीं की है, तो हमारे पास न उनकी आज्ञा पालन करने के लिये शक्ति या न कोई प्रतिज्ञा ग्रहण करने के लिये विश्वास रहेगा।

समय समय पर दूसरों को दी गयी आज्ञाओं को, जो व्यक्तिगत रूप से आपको नहीं दी गयी हैं, पालन करने का प्रयास करना आपको बन्धन, अशांति और असफलता तक पहुंचा देगा। इसी प्रकार दूसरों को दी गयी प्रतिज्ञाओं को दावा करना आपके मन में परमेश्वर के प्रति शंका उत्पन्न करेगा और आप अशान्ति में जीने लगेंगे कि लक्ष तक नहीं पहुंच पा रहे हैं और कुछ भी आपके जीवन में अच्छा नहीं हो रहा है। दूसरों के जीवन में काम किया था, मेरे जीवन में क्यों नहीं?

इसका बुनियादी कारण यह है कि आप कोई भी आज्ञा या प्रतिज्ञा अपने सोच के द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते। उन्हें आप अपनी आत्मा की गहराई में ही प्राप्त कर सकते हैं । तब आप उनके पूरा होने की प्रतिध्वनि सुनेंगे, जब आप बाइबल के पन्नों में उन्हीं के समान आज्ञाएं और प्रतिज्ञायें पढ़ेंगे।

सारांश

इस सन्देश का सारांश हम किस प्रकार निकालें? धर्मशास्त्र और परमेश्वर के वचन दो अलग अलग चीजें हैं और इन्हें अलग अलग ही समझना चाहिये। दोनों का काम अलग अलग है। परमेश्वर का वचन महान् है और आरम्भ मे परमेश्वर के साथ था। धर्मशास्त्र कभी भी उनका स्थान नहीं ले सकता। बुरे स्थान पर अच्छी चीजें दुष्ट चीजों में परिवर्तन हो जाती हैं, और आशीष श्राप में बदल जाते हैं । बाइबल के अच्छे ज्ञाता होने वाले लोगों ने बहुत से दुष्ट काम किये हैं, जिन्हें परमेश्वर के वचन का ज्ञान नहीं था। आइये हम फिर एक बार यीशु के हृदय की पुकार को सुनें, “तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है। फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते”। आइये हम परमेश्वर के वचन का सही अर्थ पता लगायें और इसे अपने जीवन में यथोचित स्थान दें। धर्मशास्त्र को भी हम इसका उचित स्थान दें - जो स्थान यह अपने आप को देता है, जो स्थान यीशु ने और प्रथम प्रेरितों ने दिया था, और इनके लिये जो स्थान परमेश्वर के वचन ने हमारे हृदय में दिया है।

अन्त में

यहां मैं यीशु के और प्रथम मण्डली के द्वारा उद्धृत किये गये पुराने नियम के पदों का संक्षिप्त सर्वेक्षण समावेश करना चाहता हूं। इस अध्ययन को और आगे बढ़ाने में इससे प्रेरणा मिल सकती है।

कुछ लोगों को ऐसा लग सकता है कि बाइबल अध्ययन में इससे हमें सहायता नहीं मिल सकती क्योंकि उस समय तक नया नियम नहीं लिखा गया था। व्यक्तिगत रूप से मैं ऐसा मानता हूं कि बाइबल एक ही पुस्तक है और इसके दोनों भाग को हमें एक ही तरह से देखना चाहिये। हमारा दृष्टिकोण ठीक वैसा ही होना चाहिये जैसा हम नये नियम के पन्नों में देखते हैं ।

यीशु ने, जैसा हम देख चुके हैं, फरिसियों के साथ वाद विवाद के समय धर्मशास्त्र के बहुत सारे पद उद्धृत किये हैं, लेकिन भीड़ को या अपने चेलों को शिक्षा देते समय कोई पद उद्धृत नहीं किया। पर्वत के उपदेश में सभी पुराने नियम के उद्धरण का उपयोग उन्होंने अपनी शिक्षा के गहरे काम को दिखाने के लिये किया है। यूहन्ना के सुसमाचार में उनकी अन्तिम बातचीत में एक भी उद्धरण समावेश नहीं है। सिर्फ इम्माउस के मार्ग पर अपने पुनरुत्थान के बाद हम उन्हें दो चेलों के आगे धर्मशास्त्र के अर्थ को स्पष्ट करते हुए देखते हैं ।

सुसमाचार के लेखकों में सिर्फ मत्ती बहुत सारे उद्धरण समावेश करके यह दर्शाते हैं कि धर्मशास्त्र की बातें पूरी हुईं। मर्कुस और लुका भी ऐसा करते हैं लेकिन बहुत कम। यूहन्ना ने एक भी उद्धरण नहीं लिया है।

प्रेरितो के पुस्तक में, पत्रुस, स्तिफानुस और पौलुस सबों ने अपने प्रचार में बहुत सारे पद उद्धृत किये हैं । प्रायः उनका उद्देश्य यही रहा है कि धर्मशास्त्र से यह दिखा सकें कि यीशु ही मसीह हैं जिनकी प्रतिज्ञा की गयी थी। पौलुस के पत्रों में धर्मशास्त्र का उपयोग अलग अलग है। रोमियो और गलातियो के पत्र उद्धरणों से भरे हैं तो कुलुस्सियो और थिस्सलुनिकियो के पत्र में एक भी नहीं है।

इब्रानियो की पत्री में, जो यहूदियों के लिये लिखी गयी थी, स्वाभाविक रूप से नये नियम की पुस्तकों में सबसे अधिक उद्धरण हैं । पत्रुस बहुत अधिक उद्धरण का उपयोग करते हैं, याकुब ने बहुत कम उपयोग किया है और यूहन्ना ने अपने पत्रों में एक भी पद उद्धृत नहीं किया है। यूहन्ना ने ही शायद सबसे बाद में लिखा है। यहूदा ने, अद्भुत बात है, दो उद्धरण लिये हैं जो जिसे हम बाइबल मानते हैं, उससे नहीं ली गयी है (मूसा का मानना और हनोक की भविष्यवाणी)। उन्होंने उन पुस्तकों से, जिन्हें हम पुराना नियम कहते हैं, कोई भी पद उद्धृत नहीं किया है।

प्रकाशित वाक्य की पुस्तक में कुछ उद्धरण हैं और बहुत से दर्शन भी जो दानियेल, इजेकिएल, जकरियाह और दूसरी पुस्तकों में पाये जाते हैं ।

सामान्य तस्वीर बड़े उतार चढ़ाव वाली बनती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह लेखकों और पाठकों दोनों के भिन्न भिन्न चरित्र और पृष्ठभूमि को और जो सन्देश लिखे गये और प्रेषित किये गये हैं उन्हें प्रतिबिम्बित करते हैं। ये सारी बातें वास्तव में पवित्र आत्मा की प्रेरणा और उनकी अगुवाई के ही अधीन थीं।

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