शाऊल और दाऊद

इजराइल देश के दो राजाओं की संक्षिप्त कथा

परिचय

शाऊल और दाऊद इजराइल देश को दो प्रथम राजा थे। इनमें से दोनों ही महान् योद्धा थे। शाऊल ने अम्मोनियों को पराजित कर और अमालेकियों के शासन का जुआ तोड़कर इजराइल के शक्ति की नींव रखी। दाऊद ने फिलिस्तियों, मोआबियों, सिरिया वासियों और एदोमियों को पराजित कर एक विशाल साम्राज्य का नियन्त्रण अपने हाथ में लिया। शाऊल और दाऊद, दोनों ही परमेश्वर द्वारा चुने गये थे और दोनों ने ही परमेश्वर के आत्मा की शक्ति का अनुभव किया। दोनों में से एक भी सिद्ध नहीं था और दोनों ने गंभीर पाप किये थे। दोनों के जीवन में ये सब बातें एक समान होते हुए भी, एक को परमेश्वर ने स्वीकार किया और प्रेम किया, जिसने व्यभिचार और हत्या भी की थी, दूसरे को, जिसके पाप बहुत छोटे लगते थे, परमेश्वर ने इनकार कर दिया।

जैसे जैसे हम इन दोनों के इतिहास पता लगाकर तुलना करते हैं, हम इनके चरित्र हमारे चारों ओर रहने वाले लोगों में, और विशेषकर स्वयं हममें प्रतिबिम्बित हुआ पाते हैं।

शाऊल के समान दुःखद चरित्र बाइबल में बहुत कम मिलते हैं । उसके समान अच्छा आरम्भ और उससे दयनीय अन्त शायद ही देखने को मिले। परमेश्वर के आशीष और उनकी शक्ति के साथ उसने अपना राज्य आरम्भ किया। फिलिस्तियों के साथ युद्ध में अपने तीन पुत्रों के साथ साथ उसकी अपनी हत्या होने से एक दिन पहले एक डायन से सहायता लेते हुए उसका अन्त हुआ।

इसके विपरीत दाऊद बहुत वर्षों तक दुख और कष्ट सहता रहा क्योंकि शाऊल उसके पीछे लगा रहा और सताता रहा, और अन्त में तङ्ग आकर फिलिस्तियों के देश में उसने शरण ली। इन सभी दुःखद परिस्थितियों में परमेश्वर ने उसकी रक्षा की और अन्त में उसे इजराइल के सिंहासन पर स्थापित किया। उसके बाद परमेश्वर ने उसके सारे शत्रुओं पर उसे विजय दी।

शाऊल की मृत्यु हो गयी, पर दाऊद जीवित है। नये नियम में दाऊद के नाम का ६० बार उल्लेख है। यीशु के अतिरिक्त मत्ती की पुस्तक में उसका नाम प्रथम है और प्रकाशित वाक्य की पुस्तक में उसका नाम अन्तिम है। राजा शाऊल का नाम एक बार भी उल्लेख नहीं किया गया है। प्रेरित पौलुस ने, एक ही गोत्र बिन्जामिन का वंशज होने के बावजूद अपना नाम शाऊल से परिवर्तन कर पौलुस रख लिया। इजराइल में आज भी लोग यह गीत गाते हैं - “दाऊद, इजराइल का राजा, जीवित है, जीवित है”। दाऊद अपने लिखे हुए गीतों में भी जीवित है जो आज भी विश्व के अनगिनत भाषाओं में गाये जाते हैं । इन सब में दाऊद जीवित है, पर सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर ने उसे एक ऐसा सिंहासन देने की प्रतिज्ञा की थी जिसका कभी अन्त नहीं होगा। वह सिंहासन आज उस मसीह का सिंहासन है जो अनन्त जीवन देने के लिये आया।

शाऊल की बुलाहट

१ शमूएल के ९ और १० अध्याय में हमें शाऊल की बुलाहट का विवरण मिलता है। उसका विवरण इस प्रकार है, “सुन्दर था, और इस्राएलियों में कोई उस से बढ़कर सुन्दर न था; वह इतना लम्बा था कि दूसरे लोग उसके कन्धे ही तक आते थे।” शाऊल और उसके नौकर उसके पिता की खोई हुई गदहियों को ढूंढ़ रहे थे। जब उन लोगों की खोज असफल हुई, तब शाऊल ढूंढ़ना छोड़ कर घर लौट जाना चाहता था, परन्तु नौकर ने सुझाव दिया कि पास के गांव में परमेश्वर के जन से मिल लिया जाय। शमूएल ने शाऊल का स्वागत यह बताते हुए किया कि गदहियां मिल गयी थी, फिर उसे भोज में प्रमुख स्थान दिया और उसके भविष्य में बुलाहट की बातें बताने लगा।

दूसरे दिन शमूएल ने उसे तेल से अभिषेक किया और कहा, “क्या इसका कारण यह नहीं कि यहोवा ने अपने निज भाग के ऊपर प्रधान होने को तेरा अभिषेक किया है?” इसके बाद उसने उसे अपने घर लौटने की यात्रा के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण भविष्यवाणी की। सब कुछ इसी विवरण के अनुरूप घटित हुआ।

जब शाऊल शमूएल को छोड़कर चला तब हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर ने उसका हृदय परिवर्तन कर दिया, और दो पहर के बाद जब उसने भविष्यवक्ताओं के एक समूह से मिला तो परमेश्वर का आत्मा उसके ऊपर उतरा और उसने भी उन लोगों के साथ भविष्यवाणी की (जैसा कि १ शमूएल १०:१० सामान्यतया अनुवाद किया जाता है)।

शमूएल ने तब अपने लिये राजा चुनने के लिये इजराइल के सभी गोत्रों को बुला भेजा। परमेश्वर ने शाऊल को चुन लिया है, यह बात उन्हें न बताकर उसने चिट्ठा डालना उचित समझा। चिट्ठा शाऊल के नाम निकला, जिससे यह और स्पष्ट हो गया कि शाऊल का चुनाव करना परमेश्वर की इच्छा थी। लेकिन शाऊल कहीं दिख नहीं रहा था। वह सामान के पीछे छुपा हुआ था। परमेश्वर की दूसरी वाणी के द्वारा शाऊल के छिपने के स्थान का पता चला और फिर लोग दौड़ कर गये और उसे छिपने के स्थान से खिंच कर यह नारा लगाते हुए ले आए, “राजा अमर रहे”।

अपने जीवन में करने वाले काम के सम्बन्ध में शाऊल की तुलना में और किसी को भी इतनी स्पष्ट और ईश्वरीय इच्छा के अनुरूप बुलाहट नहीं मिली थी। इसमें किसी प्रकार की कोई भूल या त्रुटि का स्थान नहीं था। सभी छोटी छोटी बातों में भी परमेश्वर का हाथ स्पष्ट दिखता था।

शाऊल का विजय

१ शमूएल के ११ अध्याय में हम शाऊल के पहला सैनिक अभ्यास के विषय में पढ़ते हैं । अम्मोनी राजा नाहाश याबेश गिलाद पर आक्रमण करने जा रहा था। परमेश्वर का आत्मा शाऊल पर उतरा और बड़े अधिकार के साथ उसने इजराइलियों को युद्ध के लिये बुला भेजा। बहुत बड़ी विजय ने उसके साथ उनके समर्थन को प्रमाणित किया और सिंहासन पर उसका पकड़ मजबूत हो गया। हिब्रू भाषा में “नाहाश” का अर्थ सर्प होता है और हमें इस पद के द्वारा याद दिलाया गया है, “हे जवानो, मैं ने तुम्हें इसलिये लिखा है, कि तुम बलवन्त हो, और परमेश्वर का वचन तुम में बना रहता है, और तुम ने उस दुष्ट पर जय पाई है” (१ यूहन्ना २:१४)। इजराइल अपना नया राजा पाकर खुश था, और इस अध्याय का अन्तिम पद हमें कहता है, “शाऊल और सब इजराइली लोगों ने अत्यन्त आनन्द मनाया”

बाहर से अच्छी दिखने वाली सभी चीजें अच्छी और बुरी दिखने वाली चीजें बुरी नहीं होती। शमूएल आत्मिक रूप से शाऊल, नाहाश और अन्य इजराइलियों की तुलना में ऊंचे स्तर पर था और उनके आनन्द में भाग नहीं ले सका। दूसरों की तुलना में वह परमेश्वर ने जिस निश्चयता से शाऊल को बुलाया था, उसे अच्छी तरह जानता था। फिर भी उसने उनसे कहा, “तुम ने राजा मांगकर यहोवा की दृष्टि में बहुत बड़ी बुराई की है” (१२:१७)। मानवीय दृष्टिकोण से यह सब अच्छा दिखता था, लेकिन शमूएल ने परमेश्वर की दृष्टि से देखा था।

बड़े बड़े विजय आत्मिक परिपक्वता के प्रमाण नहीं हैं । ये प्रायः आत्मिक युवावस्था में भी होते हैं । हमें शाऊल की अवस्था से, जिसने युद्ध जीते थे, आगे बढ़कर शमूएल की अवस्था में पहुंचना चाहिये, जो परमेश्वर को जानता था।

शाऊल के पाप

शाऊल का अगला युद्ध फिलिस्तियों के साथ था (१३ अध्याय )। फिलिस्तियों ने बड़ी संख्या में इजराइल पर आक्रमण किया था और शाऊल की सेना त्रस्त होकर भागने लगी थी। उसने सात दिनों तक शमूएल के आने और प्रभु के आगे बलि चढ़ाने के लिये प्रतीक्षा की, लेकिन शमूएल नहीं पहुंचा। शाऊल ने स्वयं बलि चढ़ाने का निर्णय लिया। उसने अभी बलि चढ़ाने का काम पूर्ण किया ही था कि शमूएल आ पहुंचा। शाऊल ने भय के कारण बलि चढ़ाया था, विश्वास के कारण नहीं, और वह अपने राजा की जिम्मेदारी से बाहर निकलकर ऊंची अवस्था में चला गया था, जो उसके लिये निर्धारित नहीं था। शमूएल ने उसे झिड़का और घोषणा की कि उसका राज्य नहीं टिकेगा। “परन्तु अब तेरा राज्य बना न रहेगा; यहोवा ने अपने लिये एक ऐसे पुरूष को ढूंढ़ लिया है जो उसके मन के अनुसार है; और यहोवा ने उसी को अपनी प्रजा पर प्रधान होने को ठहराया है, क्योंकि तू ने यहोवा की आज्ञा को नहीं माना” (१ शमूएल १३:१४)।

शाऊल के जीवन में दूसरी बड़ी परीक्षा उस समय आयी जब शमूएल के द्वारा परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी कि अमालेकियों को पूरी तरह नष्ट कर दे। अमालेकी बहुत ही क्रूर और विनाश करने वाले प्रवृत्ति के लोग थे जो इजराइलियों को जब वे पहली बार मिश्र देश से निकल कर आ रहे थे, करीब करीब पूरी तरह नष्ट ही कर दिया था। हमान जो एक अगागी था, दूसरी बार फारस में इजराइलियों का करीब करीब नाश कर दिया था, ऐसा लगता है कि उनके राजा अगाग का वंशज था। अमालेकियों ने सारे मिश्र पर विजय पाकर सिरिया तक उत्तरी क्षेत्र के लिये त्रास बन गये थे। निर्गमन के समय से लेकर शाऊल के हाथों परास्त होने तक मिश्र पर उनका शासन चलता रहा। परमेश्वर ने मूसा को इसे एक पुस्तक में लिखने की आज्ञा दी थी, “तब यहोवा ने मूसा से कहा, स्मरणार्थ इस बात को पुस्तक में लिख ले और यहोशू को सुना दे, कि मैं आकाश के नीचे से अमालेक का स्मरण भी पूरी रीति से मिटा डालूंगा” (निर्गमन १७:१४)। परमेश्वर की दृष्टि में उनका नाश किया जाना आवश्यक था, इजराइल के भले के लिये भी और उन सब देशों के भले के लिये भी जो इनके हाथों कष्ट सह चुके थे। यदि हम परमेश्वर के द्वारा दिये गये समय और उपाय से दुष्ट को निर्मूल नहीं करते हैं तो इसके लिये हमें निश्चय ही कष्ट उठाना पड़ेगा।

शाऊल ने अमालेकियों को परास्त कर अपने देश का एक बहुत बड़ा क्षेत्र उनके नियन्त्रण से स्वतन्त्र कराया, परन्तु अपनी जनता के दबाव में आकर उनके राजा अगाग को जीवित रखा और उनके पशुओं में से सबसे अच्छे पशु अपने लिये बचा लिये। वह परमेश्वर की सीधी सादी आज्ञा का अवज्ञा कर रहा था। परमेश्वर ने इस बात को शमूएल के आगे प्रकट कर दिया और वह शाऊल के पाप दिखाने उसके पास गया। शाऊल ने इन शब्दो के साथ उसका स्वागत किया, “तुझे यहोवा की ओर से आशीष मिले; मैं ने यहोवा की आज्ञा पूरी की है” (१ शमूएल १५:१३)।

आगे की बातचीत में हमें शमूएल के सुपरिचित शब्द मिलते हैं:

“शमूएल ने कहा, क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्न होता है? सुन मानना तो बलि चढ़ाने और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है। देख बलवा करना और भावी कहने वालों से पूछना एक ही समान पाप है, और हठ करना मूरतों और गृहदेवताओं की पूजा के तुल्य है। तू ने जो यहोवा की बात को तुच्छ जाना, इसलिये उसने तुझे राजा होने के लिये तुच्छ जाना है” (१ शमूएल १५: २२,२३)।

शाऊल का उत्तर उसके हृदय को प्रकट करता हैः “शाऊल ने शमूएल से कहा, मैं ने पाप किया है; मैं ने तो अपनी प्रजा के लोगों का भय मानकर और उनकी बात सुनकर यहोवा की आज्ञा और तेरी बातों का उल्लंघन किया है” (२४)। उसके बाद वह कहता है, “मैं ने पाप तो किया है; तौभी मेरी प्रजा के पुरनियों और इस्राएल के साम्हने मेरा आदर कर, और मेरे साथ लौट, कि मैं तेरे परमेश्वर यहोवा को दण्डवत करूं” (३०)।

शाऊल के जीवन में बुनियादी प्रेरणा स्रोत भीड़ थी। यदि वह नबियों के समूह में रहता था तो वह नबूबत करता था। यदि भीड़ उसे त्याग कर युद्ध के मैदान से भागती थी तो वह परमेश्वर पर भरोसा नहीं कर सकता था। यदि भीड़ युद्ध में प्राप्त बहुमूल्य चीजों का लोभ करती तो वह उनके बीच बाधक नहीं बनता था। आज जब परमेश्वर ने उसे इनकार कर दिया था, यह बात भी वह भीड़ से छुपाना चाहता था।

बाबेल के निर्माण के समय भी बुनियादी प्रेरणा स्रोत ऐसा ही था। “फिर उन्होंने कहा, आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें ऐसा न हो कि हम को सारी पृथ्वी पर फैलना पड़े” (उत्पत्ति ११:४)। परमेश्वर की अवहेलना कर वे भीड़ में अपनी सुरक्षा ढूंढ़ रहे थे। अनगिनत व्यक्ति आज भी बहुमत के पीछे चलना पसन्द करते हैं ।

दाऊद की बुलाहट

इतिहास की इस घड़ी में शमूएल दाऊद का अभिषेक करने जाता है। इस समय शाऊल के जैसा कोई भव्य चिह्न नहीं है, पर एक सामान्य स्तर की घटना हो रही है। नाटक का स्तर शायद ही किसी घटना के आत्मिक महत्त्व को दर्शाता हो। शमूएल के सामने यिशै के सभी पुत्र एक एक कर आते हैं और वह उन्हें इनकार करते जाता है। एलियाब, सबसे जेष्ठ पुत्र देखने में सुन्दर और कद में ऊंचा था, शाऊल के समान, पर शमूएल ने कहा, “मनुष्य बाहरी रूप को देखता है, पर परमेश्वर हृदय के देखते हैं”। यह बात शाऊल के जीवन से बुरी तरह स्पष्ट हो चुकी थी। अन्त में दाऊद को खेतों से बुलाया जाता है। वह शाऊल की तरह गदहियों को नहीं ढूंढ़ रहा था, पर मूसा की तरह, जब परमेश्वर ने उसे बुलाया, अपनी भेड़ों की देखभाल कर रहा था। यीशु स्वयं अच्छा चरवाहा हैं और मूसा और दाऊद दोनों उसके प्रतिबिम्ब या तस्वीर हैं । परमेश्वर का आत्मा दाऊद पर उतरा और हम पढ़ते हैं कि प्रभु का एक दुष्ट आत्मा शाऊल को आतंकित करने लगा।

गोलियथ

शाऊल की कथा अब दुःखद अवस्था में अधोगति की ओर क्रमिक रूप से बढ़ रही है। एक बार फिर फिलिस्तियों ने देश पर आक्रमण किया है और इस बार इजराइल को चुनौती देने गोलियथ उनके बीच से निकलता है। यदि उससे कोई युद्ध कर सकता था तो सिर्फ शाऊल ही वह व्यक्ति था, सारे इजराइली उसके कन्धे तक ही आते थे। इसके विपरीत वह स्वयं और उसकी सेना भय से थर थर कांप रहे थे।

शाऊल को भीड़ पसन्द थी, जबकि दाऊद परमेश्वर का जन था। उसने गोलियथ की चुनौती सुनी और इसके प्रति उत्तर में उसने कहा, “वह खतनारहित पलिश्ती तो क्या है कि जीवित परमेश्वर की सेना को ललकारे?” एलिआब ने दाऊद का विरोध किया और शाऊल ने उसे हतोत्साहित किया, लेकिन परमेश्वर ने उसे प्रेरित किया - न राजाओं ने और न बड़े भाइयों ने, और न ही डर से घबराई हुई सेना ने। वह पहले ही अकेले परमेश्वर को परख चुका था, जब सिंह और भालू ने उसकी भेड़ों पर आक्रमण किया था और परमेश्वर ने उसे विजय दी थी।

दाऊद परमेश्वर की शक्ति में आगे बढ़ा और उसके गोफन से निकला एक पत्थर उस फिलिस्ती दैत्य को जमीन पर ला दिया।

दानिय्येल की पुस्तक में गोलियथ से मिलती जुलती दो घटनाएं हैं । नबुकदनेस्सर, बाबेल का राजा, ने सपने में एक बड़ी मूर्ति देखी जिसका शिर सोने का, छाती पित्तल का, जांघ चांदी के और पैर लोहा मिला और मिट्ठी के बने थे। गोलियथ के समान ही यह बड़ी मूर्ति भी एक पत्थर से नष्ट हो गयी। उसके बाद वह पत्थर एक बड़ा पर्वत बन गया (जो परमेश्वर के राज्य को दर्शाता है), ओर पूरी पृथ्वी को ढक लिया। राजा आश्चर्यचकित हो गया जब दानिय्येल ने उसे उसका स्वप्न और उसका अर्थ, दोनों बता दिया। लेकिन अभी तक बुद्धि सिर्फ उसके शिर तक ही पहुंच पायी थी, हृदय तक नहीं, क्योंकि थोड़े ही दिनों बाद उसने साठ हाथ ऊंची और छः हाथ चौड़ी सोने की मूर्ति स्थापित की। जब भी छः तरह के बाजा बजते, सब इस मूर्ति के सामने दण्डवत करते और इसकी पूजा करते। गोलियथ की ऊंचाई भी छः हाथ थी, उसके भाले का वजन छः सौ शेकेल था, और उसके हथियारों की संख्या भी छः थी। पूरी बाइबल में छः की संख्या मनुष्य को दर्शाती है, और इसीलिये गोलियथ बाबेल की मानव निर्मित व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है, जिसका शिर मसीह विरोधी है।

शाऊल गोलियथ के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता था। कुछ अर्थों में वह उसी का छोटा रूप था। व्यवस्थित मण्डली के एक बड़े भाग का संसार के साथ ऐसी ही समस्या है। वे इसी प्रकार के मानव केन्द्रित तरीके से सोचते हैं, काम करते हैं और जीवन व्यतीत करते हैं । इसलिये इसके विरुद्ध उनके पास कोई सामर्थ्य नहीं है। दाऊद परमेश्वर की आत्मा से प्रेरित और शक्तिवान बना था ओर उसके विरोधी उसके लिये महत्त्वहीन थे।

गोलियथ को मारकर लौटने के बाद दाऊद के जीवन में शाऊल के अधीन बढ़ोत्तरी और सफलता का एक छोटा खुशनुमा समय आया था। कुछ ही समय बाद औरतें गाने लगी थी, “शाऊल ने अपने एक हजार शत्रुओं को मार गिराया, और दाऊद ने अपने दस हजार को”। आम जनता की प्रशंसा का हकदार सिर्फ शाऊल था, इसी कारण दाऊद का कष्ट आरम्भ हो गया।

कौन सी आत्मा

इसके कुछ ही समय बाद हम यह महत्त्वपूर्ण बात पढ़ते हैं, “दूसरे दिन परमेश्वर की ओर से एक दृष्ट आत्मा शाऊल पर बल से उतरा, और वह अपने घर के भीतर नबूवत करने लगा” (१ शमूएल १८:१०)। १० अध्याय का १० पद (शाऊल की आरम्भिक बुलाहट, पहले उद्धृत किया जा चुका है) में अक्षरशः लिखा है, “परमेश्वर का आत्मा उस पर बल से उतरा, और वह उसके बीच में नबूवत करने लगा”। हिब्रू भाषा में दोनों पदों में सिर्फ इतना अन्तर है कि एक में दुष्ट शब्द समावेश किया गया है। दोनों पदों में उल्लेखित आत्मा परमेश्वर का है। दोनों पदों में प्रतिफल नबूबत है।

हम देखते हैं कि एक ही व्यक्ति विभिन्न आत्माओं के द्वारा प्रेरित होकर नबूबत या अन्य काम कर सकता है - खासकर जब वह भीड़ की प्रशंसा पाने का इच्छुक हो। कोई व्यक्ति पवित्र आत्मा के असली वरदान उपयोग करता है तो यह इस बात की निश्चयता नहीं है कि वह कभी भी नकली वरदान उपयोग नहीं करेगा। पत्रुस ने भी परमेश्वर का प्रकाश पाकर यीशु को मसीह के रूप में पहचाना था, लेकिन कुछ ही क्षणों के बाद वह शैतान की प्रेरणा से यीशु को कष्ट सहने से रोकने का प्रयास करने लगा। यीशु ने इन शब्दों का उपयोग कर उसे झिड़का था, “शैतान, मुझ से दूर जा” (मत्ती १६:१७-२३)।

क्या आज की अवस्था इससे अलग है? क्या हम आज के चंगाई देने वाले और प्रचारकों के विषय में निश्चित हो सकते हैं कि वे सिर्फ परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में काम करते हैं? क्या इन्हें मनुष्यों की प्रशंसा अच्छी नहीं लगती? क्या उनके बीच कोई शाऊल तो नहीं?

इसके बाद के अध्यायों मे शाऊल का दाऊद की लम्बी खोज और उसके सताये जाने का वर्णन है। परमेश्वर दाऊद के साथ हैं और शाऊल के विरोध में।

शाऊल की मृत्यु के पूर्व सन्ध्या उसने अपने मन की बात बाहर निकाल दी। वह एन्दोर नाम की डायन के पास गया। इसके पहले जब उसने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया था, शमूएल ने उससे कहा था कि बागी होना तन्त्र मन्त्र के पाप जैसा ही है। अगाग को जीवन दान देना छोटा पाप जैसा लगा था। पर अभी तो शाऊल वास्तव में इस परिस्थिति में सहायता के लिये तन्त्र मन्त्र की ओर मुड़ रहा था। यह उसके पहले किये गये पापों का तर्कसंगत समापन था।

अदन के बगीचे मे अनाज्ञाकारिता मूल पाप था। परमेश्वर के लिये, परिवार में जैसा ही आज्ञाकारिता पहली आवश्यकता है, क्योंकि बाकी सब चीजें यहीं से आरम्भ होती हैं । इसके बिना अन्तिम फल पूरी तरह दण्डहीनता होता है। संसार की अवस्था अभी ऐसी ही है। पर हमें पूरी तरह दूसरा मार्ग अपनाकर परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता में चलना आवश्यक है।

शाऊल के कथा का अन्त दूसरे दिन फिलिस्तियो के साथ युद्ध में उसके मूल्यहीन मृत्यु के साथ हो जाता है। उसके तीनों राजकुमार भी उसी के साथ मारे गये थे।

शाऊल के सन्तान

एक व्यक्ति शाऊल और दाऊद के बीच फंस गया था। वह था शाऊल का पुत्र और दाऊद का अति प्रिय मित्र योनातन। कोई आश्चर्य नहीं कि वे एक दूसरे को प्रेम करते थे। दोनों का स्वभाव एक जैसा था। जब पूरा इजराइल फिलिस्तियों के आगे थर थर कांप रहा था, तब योनातन अकेले सिर्फ अपने हथियार ढोने वाले के साथ उनके विरुद्ध खड़ा हुआ और उन्हें परास्त कर दिया। दाऊद के समान वह भी साहस से भरपूर और परमेश्वर पर विश्वास करने वाला व्यक्ति था। जब दाऊद गोलियथ को मारकर लौटा “तब योनातन का मन दाऊद पर ऐसा लग गया, कि योनातन उसे अपने प्राण के बराबर प्यार करने लगा”

योनातन ने दाऊद को अपने सारे स्वार्थों को छोड़कर प्रेम किया। जिस सिंहासन पर योनातन का अधिकार था, सभी स्वाभाविक सोच के आधार पर उस पर दाऊद बैठने जा रहा था। और यदि वह अपने समय का सामान्य राजा होता तो शाऊल और योनातन के सभी संतानों की आम हत्या कर देता।

योनातन दाऊद के साथ जीवित नहीं रहा क्योंकि शाऊल के साथ उसकी भी मृत्यु हो गयी। यह दाऊद का विश्वास योग्य, आत्म-त्यागी मित्र दाऊद के बगल में अपने सिंहासन पर क्यों नहीं बैठ सका?

योनातन के जीवन में एक निर्णायक समय आया था। खेतों में दाऊद के साथ उसकी गोपनीय बैठक हुई ताकि योनातन दाऊद को यह बता सके कि शाऊल के पास राजमहल में आना उसके लिये सुरक्षित था या नहीं। दाऊद के लिये शाऊल की घृणा स्पष्ट देखकर योनातन ने दाऊद को भाग जाने का सुझाव दिया। “तब वह उठ कर चला गया” हम पढ़ते है, “और योनातन नगर में गया” (२०:४२)। योनातन दाऊद से प्रेम करता था, पर उसने अपना भविष्य शाऊल की झोली में डाल दी। उसने दाऊद के साथ अभाव और भटकने वाला जीवन नहीं चुनकर आराम और सुरक्षा से भरा अपने पिता के महल को चला गया। हम लोग भी, “उस की निन्दा अपने ऊपर लिये हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें” ऐसा चुनाव कर सकते हैं या भीड़ की सुरक्षा और प्रतिष्ठा में जीवन बिता सकते हैं ।

योनातन की बहन मिकल अपने पति दाऊद को प्रेम करती थी और एक बार तो उसका प्राण भी बचायी थी। लेकिन वह भी अपने पिता शाऊल की तरह ही भिड़ को पसन्द करती थी। जब दाऊद वाचा की सन्दूक को यरूशलेम ला रहा था, तब वह अपने राजकीय वस्त्र को उतारकर, सिर्फ सूती वस्त्र पहनकर वाचा की सन्दूक के सामने नाच रहा था। दाऊद सिर्फ परमेश्वर की चिन्ता करता था, लेकिन मिकल की आंखें भीड़ की ओर लगी थी। उसने अपने मन में दाऊद से घृणा की और उसके इस काम के लिये झिड़का भी। इसके लिये उसे शाऊल की मृत्यु में सहभागी होने जैसा ही श्राप मिला, वह अपने जीवन भर बांझ रही।

दाऊद के पाप

शाऊल के समान ही दाऊद ने भी पाप किया। उसने शरीर की अभिलाषा के आगे घुटने टेक दिये और बेतशेबा के साथ व्यभिचार किया। उसके बाद उसने उसके पति उरिया की युद्ध भूमि में हत्या करा दी ताकि दाऊद का पाप प्रकट न हो। जब नाथान नबी उसे झिड़की देने आया तो उसकी प्रतिक्रिया शाऊल के प्रतिक्रिया से भिन्न थी। उसका पश्चाताप पूर्ण था और हृदय की गहराई से था। शाऊल ने परमेश्वर के स्पष्ट आज्ञा का उल्लंघन किया था। उसके बाद वह उसे छुपाना चाहता था ताकि लोगों को पता न चले। लेकिन दाऊद का मन परमेश्वर में था। भजन संग्रह के ५१ अध्याय में वह अपने पश्चाताप भरे शब्द उड़ेलता है और हम उसके हृदय का विचार स्पष्ट देखते हैं, “मैं ने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया, और जो तेरी दृष्टि में बुरा है, वही किया है”। वह पुराने नियम का सिर्फ बाहरी रीतियों वाला व्यक्ति नही है, (“तू मेलबलि से प्रसन्न नहीं होता, नहीं तो मैं देता; होमबलि से भी तू प्रसन्न नहीं होता”) पर ऐसा व्यक्ति जिसके हृदय मे नया नियम लिखा गया हो (“हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर”)।

शाऊल का पाप परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी होने का गहरा और गम्भीर पाप था, जिसके लिये उसने कभी सही अर्थों में पश्चाताप ही नहीं किया। दाऊद ने शरीर की कमजोरी के कारण पाप किया, लेकिन उसके पश्चाताप ने न सिर्फ परमेश्वर की ओर से क्षमा दिलाया, बल्कि उन लाखों लोगों के लिये भी आशीष का कारण बना जो आज भी भजन संग्रह ५१ पढ़ते हैं ।

उपसंहार

कम से कम तीन बार, विभिन्न शब्दों में, धर्मशास्त्र हमें मृत्यु के मार्ग के विषय में (और जीवन के मार्ग के विषय में भी) चेतावनी देता है। हितोपदेश में, “ऐसा मार्ग है, जो मनुष्य को ठीक देख पड़ता है, परन्तु उसके अन्त में मृत्यु ही मिलती है।” यह पद महत्त्वपूर्ण होने कारण दो बार उल्लेख हुआ है, (हितोपदेश १४:१२ और १६:२५ में)। मत्ती रचित सुसमाचार में, “सकेत फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और चाकल है वह मार्ग जो विनाश को पहुंचाता है; और बहुतेरे हैं जो उस से प्रवेश करते हैं। क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं” (७:१३, १४)। २ कुरिन्थियों में, “जिसने हमें नई वाचा के सेवक होने के योग्य भी किया, शब्द के सेवक नहीं वरन आत्मा के; क्योंकि शब्द मारता है, पर आत्मा जिलाता है (३:६)।

शाऊल का मार्ग उसे ठीक लगा था, लेकिन इसका अन्त मृत्यु और विनाश में हुआ। यह भीड़ के लिये उपयुक्त चौड़ा मार्ग था और पुराना नियम था।

दाऊद का मार्ग प्रायः गलत लगता है। गोलियथ के साथ युद्ध करना पागलपन लगता था। उसके लोगों ने उसे पागल समझा होगा जब उसने दो बार शाऊल को छोड़ दिया। प्रायः उसे अकेले आगे बढ़ना होता था। परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत संगति करने वाला वह नये नियम का व्यक्ति था और वह संकरे मार्ग पर चला जो जीवन तक पहुंचाती है।

यदि हम दाऊद जैसा जीवन चाहते हैं तो यीशु इसके स्रोत हैं । वह इसीलिये आये कि हम जीवन पायें, बहुतायत का जीवन। आइये हम उनके पास चलें और पिएं ताकि हमारे अन्तस्करण में पानी का सोता बन जाये और अनन्त जीवन तक उमड़ता रहे और हमारे हृदय में से जीवन के जल की नदियां बह निकलें।

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