प्रभु का आगमन

परिचय

कुछ मंडलियां और मसीही संगतियां यीशु मसीह के “दूसरे आगमन” से सम्बन्धित शिक्षा को बहुत अधिक महत्त्व देती हैं। किसी भी संगति में आपको इस महान् विषय से सम्बन्धित कम से कम एक उद्धरण तो अवश्य सुनने को मिलेगा। और कई बार तो पूर्ण प्रवचन ही इस विषय पर केन्द्रित रहता है। इसके विपरीत कई संगतियां ऐसी हैं जो “दूसरे आगमन” का जिक्र तक नहीं करतीं और उनके बहुसंख्यक सदस्य इस विषय पर बाइबल में क्या लिखा है, उससे सर्वथा अनजान हैं।

कुछ लोगों के लिये यह लेख इस विषय से परिचय कराएगा, जब कि औरों के लिये, उनके विश्वास को परखने का सुअवसर होगा। हम लोग बाइबल में उल्लेखित उन भागों को परखेंगे जिन पर “दूसरे आगमन” की शिक्षा आधारित है और यह देखेंगे कि उनका अर्थ वही है जो पहली दृष्टि में लगता है। मैंने “दूसरा आगमन” वाक्यांश को उद्धरण के अन्दर रखा है, क्योंकि यह सुनकर बहुतों को आश्चर्य होगा कि नया नियम में इसका कहीं उल्लेख नहीं है।

आज की अवस्था का नये नियम के समय के जीवन शैली से तुलना करके हम बहुत कुछ सिख सकते हैं। उस समय के फरिसी लोग मसीह के आने की राह देख रहे थे। वे लोग न सिर्फ उनकी राह देख रहे थे, बल्कि उनके आगमन के विषय में उनके स्पष्ट विचार थे। यह सब होने के बावजूद भी जब उनका आगमन हुआ, तब वे लोग यीशु को मसीह के रूप में पहचान पाने में पूरी तरह असफल रहे। धर्मशास्त्र के उनके ज्ञान के आधार पर वे निश्चित कह सकते थे कि मसीह का जन्म बेतलेहेम में होगा। लेकिन क्योंकि यीशु का जन्म कहीं और - नासरत में - हुआ था, इस लिये उन्होंने उन्हें स्वीकार नहीं किया।

यीशु के चेलों ने धर्मशास्त्र का पढ़ा जाना (जिसे हम आज पुराना नियम कहते हैं) प्रत्येक हफ़्ता सभाघर में सुनते आये थे, और आजकल के लोगों की तुलना में उनका इस विषय का ज्ञान बेहतर था। लेकिन फरिसी लोगों के धर्मशास्त्र के ज्ञान के स्तर की तुलना में उनका स्तर बहुत कम था। इसके बावजूद भी पतरस ने यीशु को मसीह के रूप में पहचान लिया लेकिन फरिसी लोग असफल रहे। इसका कारण यह नहीं था कि पतरस ने फरिसियों की तुलना में सम्पूर्ण धर्मशास्त्र का सावधानी पूर्वक मन लगाकर अध्ययन किया था। इसका कारण यह था कि वह स्वयं यीशु की ओर आकर्षित हुआ था, और परमेश्वर की ओर से उसे प्रकाश मिला था। उसने कहा, “तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है। यीशु ने उसको उत्तर दिया, कि हे शमौन योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लोहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है” (मत्ती १६:१६,१७)।

पहले जैसे ही आज भी हम कोई बात अच्छी तरह नहीं जान सकते हैं, जब तक परमेश्वर हमें नहीं बताते। हमने अपने हृदय के अन्दर उनसे जो कुछ सिखा है, धर्मशास्त्र उसकी पुष्टि करता है।

भविष्यवाणियां कैसे पूरी होती हैं

परमेश्वर अपने सेवक नबियो को भविष्य की घटनाओं को प्रकट करते हैं। पुराने नियम के लिखावट से यह बात तो स्पष्ट है। लेकिन भविष्यवाणियां सदा ही लोगों के आकांक्षाओं के अनुरूप पूरी नहीं होती थीं। परमेश्वर का मार्ग हमारी तुलना में उच्च है, और भविष्यवाणी के पूर्ण होने के मामले में तो यह और भी सत्य है। आइये, देखते हैं कि कुछ प्राचीन भविष्यवाणियां किस प्रकार पूरी हुई थीं।

उत्पत्ति की पुस्तक से लगातार मसीह के आगमन की भविष्यवाणियां की गयी हैं। परमेश्वर ने हव्वा से कहा था कि उसकी सन्तान सर्प का शिर कुचलेंगे। परमेश्वर के इस कथन से हव्वा को सान्त्वना मिला था और वह उत्साहित हुई थी, लेकिन उसे पता नहीं था कि यह कैसे होगा। हो सकता है कि उसने शारीरिक झगड़े की बात सोची हो। शायद उसने कल्पना की हो कि चारों ओर जमीन पर मृत सर्प बिखरे पड़े हैं। पीछे दृष्टि कर हम उन घटनाओं को देख सकते हैं जो हव्वा की कल्पना से बहुत बड़े थे और अधिक महत्त्वपूर्ण भी। उसके दूर के वंशज ने अन्धकार की सारी शक्तियों को पराजित किया, भौतिक हथियारों की शक्ति से नहीं वरन् संसार के पापों के लिये अपने आप को बलिदान के रूप में अर्पण करके।

परमेश्वर ने इब्राहिम से कहा था कि उसके सन्तान आकाश के तारों और समुद्र के किनारे के बालू जैसे अनगिनत होंगे और उसके वंश के द्वारा पृथ्वी की सारी जातियां आशीष पायेंगी। आज करोड़ों लोग इब्राहिम को अपना शारीरिक पूर्वज मानते हैं और शायद इब्राहिम ने भी इस प्रतिज्ञा को इसी अर्थ में लिया हो। चार हजार वर्ष व्यतीत होने के बाद, आज हम जानते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि उन अनगिनत आत्मिक वंशजों पर लगी हुई थी जो इब्राहिम के विश्वास का अनुकरण करने वाले थे। वह भविष्यवाणी इब्राहिम की अपेक्षा से कहीं बेहतर और उच्च रूप में पूरी हुई थी।

परमेश्वर ने मूसा को आज्ञा दी कि वह लोगों से कहे कि परमेश्वर उसी के समान एक नबी उसके भाइयों के बीच से खड़ा करेंगे। यीशु मूसा के समान थे जैसा कि आत्मिक मन समझ सकता था। और तरह से वह बिलकुल भिन्न थे और बहुत से लोग दोनों की समानता परखने में पूर्ण रूप से असफल रहे थे। मूसा ने अपने लोगों को मिश्र की गुलामी के जुए से छुटकारा दिलाया था। पर यीशु अपने लोगों को उन घृणित रोमी हाकिमों से नहीं छुड़ा पाये थे। लेकिन उन्होंने इससे भी बड़े क्रूर शासक से छुटकारा दिलाया था। उनके कंधों से यीशु ने पाप और शैतान के जुए को तोड़ दिया था।

परमेश्वर ने दाऊद को कहा था कि वह उसके राज्य के सिंहासन को सदा के लिये स्थापित करेंगे। मैं यह कल्पना कर सकता हूं कि यह सोचकर दाऊद कितना प्रसन्न हुआ होगा कि अब उसके वंशज आने वाले सैकड़ों, हजारों वर्षों तक यरूशलेम में उसके सिंहासन पर बैठते रहेंगे। लेकिन यह बात भी दूसरे तरह से पूरी हुई, पर उसकी अपेक्षा से बेहतर तरीके से। उसके सिंहासन पर सैकड़ों वर्षों तक उसके वंशज राज्य करते रहे, पर सदा के लिये नहीं। एक दुःखद दिन आया जब लम्बे समय तक घेरा बन्दी करने के बाद बाबुल वासियों ने यरूशलेम के शहर पनाह को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने राजा सेदिकिय्याह की आंखें निकाल दीं और उसे बाबुल की बंधुआई में ले गये। उन्होंने राज महल और नगर के सभी महत्त्वपूर्ण भवनों को आग लगा दीं। परमेश्वर के द्वारा दाऊद को दी गयी भविष्यवाणी का क्या हुआ? दाऊद का भौतिक सिंहासन तो नष्ट हो गया लेकिन दाऊद का आत्मिक सिंहासन सदा के लिये रहेगा। यीशु राज्य करेंगे और उनके सन्त लोग उनके साथ राज्य करेंगे, जब तक उनके सारे शत्रु उनके पांव के नीचे नहीं डाल दिये जाते। सांसारिक यरूशलेम शताब्दियों से अन्य जाति के लोगों के पैरों तले रौंदा जाता रहा है, और इसका सिंहासन खाली रहा है, परन्तु स्वर्गीय येरूशलेम के सिंहासन पर यीशु राज्य कर रहे हैं। यह भविष्यवाणी इतनी बेहतर तरीके से पूरी हुई है जैसा कि दाऊद ने सपने में भी नहीं सोचा होगा।

विगत की ये भविष्यवाणियां जिस तरह पूरी हुई हैं उनसे हम बहुत कुछ सिख सकते हैं। घटना होने के पहले हम यह आभास पा सकते हैं कि अद्भुत चीजें होने जा रहीं हैं और हम अपने आप को परमेश्वर के उद्देश्य प्राप्ति में सहभागी होने के लिये तैयार कर सकते हैं। विगत की घटनाओं पर दृष्टि करने से ही हम परमेश्वर की योजनाओं को पूरी तरह समझ सकते हैं और प्राचीन विश्वास योग्य लोगों की तरह हम भी यह जान सकते हैं कि वे सब इतनी महान् और अद्भुत थीं जितनी हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

मैं फिर आऊंगा और तुम्हें अपने पास ले जाऊंगा

किसी भी शिक्षा को शुरू करने के लिये सर्वश्रेष्ठ आरम्भिक स्थल यीशु ही हैं। किसी खास विषय पर उनका कहना क्या था और इसका उनके जन्म, मृत्यु और पुनरुत्थान से क्या सम्बन्ध था? इसलिये हम वहां से आरम्भ करते हैं जो लोगों ने उनके आगमन के सम्बन्ध में उनके अपने मुंह से निकली बातों को सीधे सादे रूप में लिया था।

“मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं। और यदि मैं जा कर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूं, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहां ले जाऊंगा, कि जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो” (यूहन्ना १४:२३)।

मेरे किशोरावस्था में मैंने बाइबल के बहुत से पदों को कण्ठस्थ कर लिया था और इसके लिये जो समय मैंने लगाया था उसका मुझे कोई दुख नहीं है। यह बड़े दुख की बात है कि उस समय की तुलना में आजकल ऐसा बहुत कम होता है। लेकिन पदों को कण्ठस्थ करने का एक दुःखद पक्ष यह है कि पदों को उनके पृष्ठ भूमि से बाहर भी उद्धृत किया जा सकता है। यह बात अभी ऊपर उद्धृत किये गये पदों के लिये और भी सत्य है। अन्तिम भोज की रात हुए एक लम्बे वार्तालाप को जिसे यूहन्ना ने लिपि बद्ध किया है, के आरम्भ की बात है। इस वार्तालाप का १३ अध्याय के कुछ भाग से लेकर पूरे १४, १५ और १६ में उल्लेख है। इन पदों के पहले और बाद में यीशु ने क्या कहा था, हम उन पर विचार करेंगे।

व्याकुल हृदय

यूहन्ना १४:१ मे लिखा है, “तुम्हारा मन व्याकुल न हो, तुम परमेश्वर पर विश्वास रखते हो मुझ पर भी विश्वास रखो।” यीशु इस संसार को छोड़कर जाने वाले थे और अपने चेलों को आने वाले सदमे के लिये और उनकी शारीरिक अनुपस्थिति के लिये तैयार कर रहे थे। उनसे यह कहना कि वे निकट भविष्य में सशरीर आकर उन्हें स्वर्गीय घर में ले जायेंगे, और फिर २००० वर्षों तक ऐसा नहीं करना एक अच्छा और इमानदारि पूर्वक दिया गया सान्त्वना नहीं होता। यह तो एक झूठी प्रतिज्ञा होती। यदि मेरा मित्र मुझसे मिलने की प्रतिज्ञा करता है लेकिन मेरी मृत्यु के बाद मिलने आता है, तो मैं यह समझूंगा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं की (यदि मैं समझ सकता तो!) “जब आशा पूरी होने में विलम्ब होता है, तो मन शिथिल होता है, परन्तु जब लालसा पूरी होती है, तब जीवन का वृक्ष लगता है” (हितोपदेश १३:१२)।

क्या चेलों का हृदय उनके जीवन भर व्याकुल था क्योंकि यीशु उन्हें छोड़कर चले गये और लौटकर नहीं आये थे? क्या जब तक वह सशरीर वापस आकर हमें अपने साथ भविष्य के घर में ले नहीं जाते, तब तक हमारा हृदय व्याकुल रहना चाहिए? प्रेरितों की पुस्तक पढ़कर या उस दिन से लेकर आज तक विभिन्न संतों की साक्षी सुनकर निश्चय ही ऐसा नहीं लगता।

उनके हृदय उस समय बहुत व्याकुल थे जब यीशु को गिरफ्तार किया गया था, उन पर मुकदमा चला था और उन्हें मृत्यु दण्ड दिया गया था। जब वह कब्र से बाहर आये थे, उनके बीच रहे थे और उनसे बात चीत की थी, और जब ५० दिनों के बाद पवित्र आत्मा उन पर अद्भुत शक्ति के साथ उतरे थे, तब उनका हृदय कदापि व्याकुल नहीं था। यीशु अब उनके साथ नहीं वरन् उनके अन्दर थे और अविश्वसनीय रूप से उन्होंने जितना खोया था उससे बहुत अधिक पाया था।

यीशु कहां जा रहे थे?

४ और ५ पद बताते हैं: “और जहां मैं जाता हूं तुम वहां का मार्ग जानते हो। थोमा ने उस से कहा, हे प्रभु, हम नहीं जानते कि तू कहां जाता है तो मार्ग कैसे जानें?”

थोमा, आज कल के अधिकांश लोगों की तरह, यीशु की कही बातें समझ नहीं पा रहा था। वह नासमझ या मूर्ख नहीं था। हमारी तरह ही और अन्य आदम के वंशजों की तरह वह भी मन की आंखों के अन्धकार से ग्रसित था। सम्भवतः अन्य चेले भी यीशु की बातों को थोमा से बेहतर नहीं समझ पा रहे थे लेकिन वह कम से कम अपनी अनजान अवस्था को प्रकट करने से और यीशु के कहने का अर्थ क्या था यह पूछने से डर तो नहीं रहा था। यदि यीशु के कहने का तात्पर्य, बिना समझाए थोमा नहीं समझ पा रहा था तो हम भी नहीं समझ पायेंगे!

यीशु ने इस बात को समझाया था कि वह पिता के पास जा रहे थे और वह और पिता एक थे। “जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है: तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा। क्या तू प्रतीति नहीं करता, कि मैं पिता में हूं, और पिता मुझ में हैं?”

इतना कहकर कि वह और पिता एक थे, यीशु ने आगे पवित्र आत्मा के विषय में कहना आरम्भ किया, “और मैं पिता से बिनती करूंगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे। अर्थात सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है: तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।” इसके तुरत बाद उन्होंने इन शब्दों को अपनी प्रतिज्ञा के साथ कहना आरम्भ किया, “मैं तुम्हें अनाथ न छोडूंगा, मैं तुम्हारे पास आता हूं।” फिर इसके बाद उन्होंने कहा, “मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएंगे, और उसके साथ वास करेंगे”

इस (१४) अध्याय में यीशु ने ३ बार कहा है कि वह फिर आयेंगेः

इन तीनों कथनों का एक दूसरे से भिन्न अर्थ नहीं लगाया जा सकता। तीसरे कथन में यीशु ने “हम” शब्द का उपयोग किया है, पिता को अपने साथ समावेश करने के लिये। इस लम्बे वार्तालाप में उन्होंने पवित्र आत्मा के आगमन की बात भी की है। कितने प्रकार के भिन्न भिन्न आगमन हैं? मेरा मानना है कि ये सभी एक ही आगमन की बातें हैं। पेन्तिकोस के दिन पवित्र आत्मा का आगमन पिता और पुत्र का आगमन भी था।

आइये, २ और ३ पद पर हम दुबारा विचार करें: “मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं। और यदि मैं जा कर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूं, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहां ले जाऊंगा, कि जहां मैं हूं वहां तुम भी रहो।”

शारीरिक रूप से यीशु चेलों को छोड़कर जा रहे थे, लेकिन वह और उनके पिता फिर लौट कर उनमें अपना वास स्थान बनाना चाहते थे। ये वास स्थान आकाश में स्थित महल नहीं हैं। ये उनके लोग हैं। हम हैं उनके वास स्थान!

यीशु ने कहा था, “जहां मैं हूं वहां तुम भी रहोगे”। उन्होंने यह नहीं कहा, “जहां मैं रहूंगा”। तीन वर्षों तक यीशु और उनके चेले शारीरिक रूप से एक साथ थे। लेकिन आत्मिक रूप से वे एक ही धरातल पर नहीं थे। वे ऊपर थे और चेले नीचे। उनसे मिलने के बाद चेलों को पता चल गया था कि यीशु उनकी तुलना में बहुत ऊपर थे। यह कितनी अद्भुत प्रतिज्ञा है, यदि हम इसके सही अर्थ समझते हैं। “जहां मैं हूं वहां तुम भी रहोगे”। यह भविष्य में उपलब्ध होने वाले आकाश के भौतिक महल की तुलना में वर्तमान की बहुत ही बेहतर महिमित आत्मिक सत्यता है।

बादल

अब हम “बादल” के सम्बन्ध में विचार करेंगे। बाइबल के पांच अलग अलग लेखक या वक्ता, यीशु सहित, उनके आगमन के सम्बन्ध में बात करते समय बादल का उल्लेख करते हैं। इनमें से तीन ने पहले लेखक दानिय्येल नबी की पुस्तक से स्पष्ट रूप से उद्धृत किया है।

१. दानिय्येल ने कहा, “ मैं ने रात में स्वप्न में देखा, और देखो, मनुष्य के सन्तान सा कोई आकाश के बादलों समेत आ रहा था, और वह उस अति प्राचीन के पास पहुंचा, और उसको वे उसके समीप लाए” (दानिय्येल ७:१३)।

२. यीशु ने कहा, “और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ और ऐश्वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे” (मत्ती २४:३०)।

३. यीशु के स्वर्गारोहण के बाद दो स्वर्गदूतो ने कहा, “हे गलीली पुरूषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा” (प्रेरित १:११)।

४. पौलुस ने लिखा है, “तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उन के साथ बादलों पर उठा लिये जाएंगे, कि हवा में प्रभु से मिलें” १ थिस्स ४:१७)।

५. यूहन्ना ने लिखा है, “देखो, वह बादलों के साथ आने वाला है; और हर एक आंख उसे देखेगी” (प्रकाश १:७)।

अन्य भाषाओं की तरह हिब्रू और यूनानी दोनों भाषा में एक ही शब्द है, जबकि अंग्रेजी भाषा में दो शब्द हैं, आकाश और स्वर्ग।

उपरोक्त पांचों उद्धरण एक ही प्रश्न खड़ा करते हैं, मनुष्य के पुत्र के आगमन में बादल का इतना महत्त्वपूर्ण भूमिका क्यों? क्या बादल (H2O ) के गैस से बने अणु मात्र नहीं हैं? आजकल तो लोग उनके बीच से होकर उनके ऊपर भी हवाई जहाज से यात्रा करते हैं। क्या भाप यीशु के आगमन के लिये वास्तव में इतना महत्त्वपूर्ण है?

आइये हम बादलों के विषय में थोड़ा और विचार करें। सूर्य की गरमी से जब भूमि या समुद्र का पानी भाप बनता है तब इस भाप से बादल बनते हैं। समुद्र का पानी जो खारा और अनुपजाऊ होता है, या भूमि का पानी जो कीचड़ भरा होता है, इन्हें पृथ्वी से ऊपर खिंच कर शुद्ध किया जाता है, फिर इसे ऐसी अवस्था में रूपान्तरण किया जाता है जिसमें यह स्वर्गीय स्थान में रह सके। वहां से यह शुद्ध पानी पृथ्वी पर (बारिश के रूप में) लौट कर यहां स्थित सब चीजों को जीवन देता है।

हमारे अन्दर परमेश्वर के काम का क्या ही सही तस्वीर है यह! स्वभाव से हम सब समुद्र के पानी समान हैं, खारा, दूषित और अनुपजाऊ। परमेश्वर अपने प्रेम की गरमी से हमें ऊपर उठाकर शुद्ध करते हैं और यीशु के साथ स्वर्गीय स्थानों में बिठाते हैं। हमें वह जीवन देने वाले शुद्ध पानी के रूप में रूपान्तरण करते हैं। तब हम नीचे पृथ्वी पर रहने वालों को वह जीवन प्रदान करते हैं।

यीशु सांसारिक पानी के भाप में या उसके ऊपर बैठकर आने वाले नहीं हैं, लेकिन अपने लोगों में और उनके साथ। यहूदा (हनोक से उद्धृत करके) कहता है, “देखो, प्रभु अपने लाखों पवित्रों के साथ आया”। और हिब्रू १२:१ में हम पढ़ते हैं “इस कारण जब कि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हम को घेरे हुए है”। इसलिये बादलों के साथ आना और संतों के साथ आना, दोनों बातें समान हैं।

यह स्वाभाविक है कि प्राचीन काल में लोग बादलों को परमेश्वर का वास स्थान समझते थे। परमेश्वर ने लोगों को इतनी आज्ञा दी कि विभिन्न उपायों के द्वारा लोग परमेश्वर के स्वभाव का अधूरा और खण्डित ज्ञान प्राप्त करें। अभी हम प्रकाश और समझ की पूर्णता के युग में हैं, इस लिये हममें आगे बढ़ने की इच्छा होना आवश्यक है। परमेश्वर सांसारिक बादलों में नहीं रहते, लेकिन उनमें वास करते हैं जिनको ये बादल दर्शाते हैं - उनके लोग।

बादल इंग्लैंड जैसे देशों में सदा लोकप्रिय नहीं होते। इनसे ठंड बढ़ती है, मौसम अन्धेरा हो जाता है और लोगों की छुट्टियां बर्बाद हो जातीं हैं! अन्य देशों में या किसानों के बीच ये स्वयं जीवन हैं। ये उस महत्त्वपूर्ण बारिश के स्रोत हैं जिनके बिना कुछ भी उग नहीं सकता। इनके कारण ही मरुभूमि गुलाब के फूल की तरह हरा भरा हो खिल उठता है। जहां सिर्फ बांझपन और मृत्यु था वहां ये जीवन और वृद्धि लेकर आते हैं।

परमेश्वर के संतों की कैसी अद्भुत तस्वीर! जो यीशु के समान हैं, वही करते हैं जो यीशु ने किया। वे स्वयं तो स्वर्गीय स्थानों में रहते हैं लेकिन जो पृथ्वी पर रहते हैं उनके लिये जीवन, स्वास्थ्य और आशीष लाते हैं।

हरेक आंख उसे देखेगी

“देखो, वह बादलों के साथ आने वाला है; और हर एक आंख उसे देखेगी” (प्रकाशित वाक्य १:७)।

मान लीजिये इस पद को हम लोग अक्षरशः लेते हैं, तो इसका अर्थ हम किस प्रकार समझेंगे? क्या यीशु संसार के सभी भागों में एक साथ दिखाई देंगे? और क्या हरेक देश में उस दिन बदली रहेगा? या कि जैसा किसी ने सुझाव दिया है, यीशु टेलीविजन पर दिखेंगे और इस प्रकार एक ही समय पर पूरे विश्व में दिखाई पड़ेंगे?

हां, यह सत्य है कि परमेश्वर के लिये सब कुछ सम्भव है। लेकिन कुछ चीजें उनके चरित्र, धर्मशास्त्र और सोच से मेल खाती हैं और दूसरी चीजें नहीं खाती। परमेश्वर एक ही समय में पर्वत, तराई, मरुभूमि और समुद्र को बादलों से ढक सकते हैं। यीशु भी उन बादलों के साथ विश्व के सभी भागो में एक ही समय पर दिखाई पड़ सकते हैं। अथवा वह बादलों के साथ एक देश, सम्भव है इजराइल, में दिखाई पड़ें और विश्व के सारे पत्रकार इस घटना का चित्र लें। परमेश्वर इनमें से कोई भी उपाय अपना सकते हैं लेकिन इस प्रकार का अर्थ लगाना उनके प्रदर्शित स्वभाव और उद्देश्य से मेल नहीं खाता।

मेरा मानना है कि सच्चाई इससे बेहतर और महान् है। मेरा विश्वास है कि वह बादलों पर आयेंगे और हरेक आंख उन्हें देखेगी, लेकिन मैं यह विश्वास करता हूं कि जो लोग उनके साथ स्वर्गीय स्थानों पर रहते हैं, वे ही वह बादल होंगे। जब परमेश्वर के पुत्रों का यीशु के स्वरूप में रूपान्तरण हो जायेगा, तब यीशु को देखने की इच्छा रखने वालों के लिये पुत्रों को देखना पर्याप्त होगा।

जब कुछ यूनानी लोगों ने अन्द्रियास के पास आकर कहा, “हम यीशु से मिलना चाहते हैं”, और अन्द्रियास ने इस अनुरोध के विषय में यीशु को जानकारी दी तो यीशु ने कहा, “मैं तुम से सच सच कहता हूं, कि जब तक गेहूं का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है” (यूहन्ना १२:२४)। परमेश्वर सिर्फ एक पुत्र से सन्तुष्ट नहीं हैं, लेकिन प्रथम पुत्र के समान ही बहुत सारे पुत्र चाहते हैं।

सबों के देखने लिये सिर्फ एक पुत्र पर्याप्त नहीं थे। पहिलौठा पुत्र वह बीज था जिसे मिट्टी में गिरकर मरना जरूरी था, ताकि अपने ही समान बहुत सारे पुत्रों का फसल तैयार कर सकें। गलील के यीशु नासरी में परमेश्वर ने अपने आप को प्रकट किया, लेकिन वह अन्य स्त्री और पुरुष, युवा और वृद्ध, यूरोप वासी, एशिया वासी, अफ्रीका वासी और यहूदियों में भी प्रकट होना चाहते हैं। उन्हें चालाक और भोले भाले, ताकतवर और निर्बल, विद्वान् और अनपढ़, और अन्य असंख्य लोगों में भी प्रकट होना आवश्यक है। यह परमेश्वर के पुत्रों का प्रकटीकरण होगा जिसके विषय में पौलुस ने रोमियों को लिखा था। सारी सृष्टि कराहती और पिड़ाओ में तड़प रही है, आकाश से स्वर्गीय अतिथि के लिये नहीं पर परमेश्वर के इन पुत्रों के प्रकटीकरण के लिये।

पौलुस ने इफिसियो को कहा, “ताकि अब कलीसिया के द्वारा, परमेश्वर का नाना प्रकार (बहु रङ्गी - यूनानी शब्द का असली अर्थ) का ज्ञान, उन प्रधानों और अधिकारियों पर, जो स्वर्गीय स्थानों में हैं प्रगट किया जाए।” बादल में एक इन्द्र धनुष भी होगा।

स्वर्ग दूतों के शब्द

उनके आगमन के विषय में यीशु के शब्दों पर विचार करके हमने सही शुरूवात की है। उनके कथन को और अच्छी तरह समझने के लिये अब हम दूसरों द्वारा कहे गये शब्दों पर विचार करेंगे। कितनी बार हमने पौलुस के शब्दों से आरम्भ किया है, और तब हम अपने समझ के अनुसार उसमें यीशु के शब्दों को फीट बैठाने का प्रयास किया है। पौलुस जैसा कि उसने स्वयं स्वीकार किया है कि वह दर्पण में धुंधला देख रहा था। यीशु आमने सामने (स्पष्ट) देख रहे थे।

प्रेरित १:११ में चेलों को कहे गये स्वर्ग दूतों के शब्द कलम बन्द किये गये हैं: “हे गलीली पुरुषों, तुम क्यों खड़े स्वर्ग की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा।”

क्या स्वर्ग दूत यीशु के शारीरिक रूप से लौट आने की बात कर रहे थे, जिस प्रकार उन्होंने प्रस्थान किया था, लेकिन करीब २००० वर्षों के बाद?

यीशु का चेलों के साथ किया गया अन्तिम कलम बन्द वार्तालाप उनके स्वर्गारोहण के कुछ ही देर पहले का है। चेले इजराइल के राज्य लौटाने की बात सोच रहे थे। यीशु उन्हें पवित्र आत्मा के विषय में और अधिक बातें बताना चाहते थे। उन्होंने चेलों से यरूशलेम में प्रतीक्षा करने को कहा जब तक वे पवित्र आत्मा से भर नहीं जाते और उनकी साक्षी होने की शक्ति नहीं पा लेते। उन्होंने कहा कि यह थोड़े ही दिनों में पूरा होगा।

यीशु अपने चेलों को निकट भविष्य में होने वाली घटना के विषय में बता कर उन्हें सान्त्वना और उत्साह दे रहे थे। इस लिए हम यह आशा नहीं कर सकते कि स्वर्ग दूत चेलों को कोई ऐसी घटना के विषय में कहेंगे जो २००० वर्षों के बाद पूरी होने वाली हो। वरन् हमें यह आशा करनी चाहिए कि वे कोई ऐसी बात कहेंगे जिससे यीशु की बातों को और बल मिलता हो। स्वर्ग दूतों की बातों से तो ऐसा लगता है कि वे चेलों के मन को यीशु की बातों से दूर किसी दूसरी घटना की ओर ले जाना चाहते हों। यह सही नहीं हो सकता है, इसीलिए हम स्वर्ग दूतों की कही बातों पर नये सिरे से विचार करेंगे।

फिर, यदि यीशु का आगमन आकाश से जल्द ही उसी प्रकार होने वाला था, जिस प्रकार उनका प्रस्थान हुआ था, तो लोगों के लिये यह उचित था कि वे आकाश की ओर टक टकी लगाये उनकी झलक पाने के लिये प्रतीक्षा करते।

उनके स्वर्गारोहण के समय यीशु बादलों में गायब हो गये थे। यह पानी के भाप का बादल भी हो सकता था, या महिमा का बादल भी। पेन्तिकोस के दिन यीशु दुबारा बादलों में दिखाई पड़े। लेकिन चेलों की आशा के विपरीत वे सांसारिक बादलों में दिखाई नहीं पड़े थे। यह बादल स्वयं चेलों से और दूसरे अनुयायियों से मिलकर बना था। वे इस समय साक्षी के ऐसे बादल बन गये थे जिन्हें स्वर्गीय स्थानों में बिठाया गया था। वही यीशु जो तीन वर्ष छः महीने तक उनके बीच रहे थे और उनसे बात चीत की थी, अब उनके अन्दर थे और उनके द्वारा अपने आप को प्रकट कर रहे थे। वे स्वर्गीय बादल की साक्षी में बड़ी महिमा के साथ दिखाई दे रहे थे।

२००० वर्ष पहले जब यीशु का इस पृथ्वी पर सशरीर आगमन हुआ था तो यह एक अद्भुत घटना थी और इसकी घोषणा करने के लिए लाखों स्वर्ग दूत भेजे गये थे। पेन्तिकोस के दिन अपने लोगों के बीच उनका आत्मिक आगमन इससे भी अद्भुत था और अधिक शक्तिशाली भी। उनका वह आगमन जो अभी होना बाकी है, इस बात को प्रमाणित करेगा कि यह प्रेरितों के सोच और कल्पना से परे होगा जिसकी तुलना में पेन्तिकोस के दिन का आगमन तो सिर्फ कटनी का पहला फल था।

अन्त में जिस ढंग से स्वर्ग दूतों ने चेलों को सम्बोधित किया था उसमें हम एक छुपी हुई झिड़की देख सकते हैं। उन्होंने उन्हें परमेश्वर के लोग या यीशु के अनुयायी नहीं कहा, पर सिर्फ “हे गलीली पुरुषों” कहा था। उनका व्यवहार और सोच (और उनके बाद आज भी बहुतों का है) शारीरिक और मानवीय थे, इसीलिए स्वर्ग दूतों ने उन्हें ऐसी उपाधि से सम्बोधित किया जो उनके मानवीय और सांसारिक उत्पत्ति की ओर इंगित करता था।

तो, क्या हम यह कह रहे हैं कि पेन्तिकोस के दिन यीशु का आगमन हो चुका है या यह कि उनका आगमन होना अभी बाकी है? हम दोनों ही बातें कह रहे हैं। निश्चय ही पेन्तिकोस के दिन उनका आगमन हो चुका है, और चेलों के साथ उनकी उपस्थिति, जब वे गलील की धूल भरी सड़कों पर मानव रूप में उनके साथ चलते थे, उससे बेहतर और अद्भुत थी।

लेकिन वह आगमन उनकी प्रतिज्ञा का पूर्ण और अन्तिम परिपूर्णता नहीं था। बल्कि यह तो प्रथम किस्त था। यह आने वाली महान् चीजों का पूर्व स्वाद था। अभी, युग के अन्त में उस महान् प्रतिज्ञा के पूरे होने का समय आ चुका है।

पौलुस के शब्द

थिस्सलुनीकियों को पौलुस ने लिखा, “क्योंकि हम प्रभु के वचन के अनुसार तुम से यह कहते हैं, कि हम जो जीवित हैं, और प्रभु के आने तक बचे रहेंगे तो सोए हुओं से कभी आगे न बढ़ेंगे। क्योंकि प्रभु आप ही स्वर्ग से उतरेगा; उस समय ललकार, और प्रधान दूत का शब्द सुनाई देगा, और परमेश्वर की तुरही फूंकी जाएगी, और जो मसीह में मरे हैं, वे पहिले जी उठेंगे। तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उन के साथ बादलों पर उठा लिये जाएंगे, कि हवा में प्रभु से मिलें, और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे” (१थिस्स ४:१५-१७)।

बाइबल के अधिकांश पाठक इन शब्दों को पूर्ण रूप से अक्षरशः लेते हैं और निर्विवाद रूप से यह विश्वास करते हैं कि यीशु बादलों में सशरीर आयेंगे और सभी सन्त आकाश में उनसे मिलने के लिये सशरीर उठा लिये जायेंगे। इन पदों से पहले के पदों में पौलुस उन संतों की बात कर रहे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है, इस लिये पहली दृष्टि में इन पदों को अक्षरशः लेना तर्कसंगत लगता है। लेकिन ऐसा क्या है कि इसी समय पौलुस को “प्रभु का वचन” मिलता है? मेरा मानना है कि यह इस बात को दर्शाता है कि पौलुस शाब्दिक को छोड़ आत्मिक की ओर बढ़ रहे हैं।

कोरिन्थियो को लिखे पत्र में उनकी भाषा समान है। मृतकों के पुनरुत्थान की बात करने के बाद वे लिखते हैं, “देखो, मैं तुम से भेद की बात कहता हूं: कि हम सब तो नहीं सोयेंगे, परन्तु सब बदल जाएंगे। और यह क्षण भर में, पलक मारते ही पिछली तुरही फूंकते ही होगा: क्योंकि तुरही फूंकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएंगे, और हम बदल जाएंगे” (१ कोरि १५:५१, ५२)।

रहस्य और आश्चर्य कर्म में अन्तर होता है। रहस्य समझने में कठिन होता है जबकि आश्चर्य कर्म विश्वास करने में। बहुत सारे शरीर का अपने कब्रों से बाहर आना और जीवित होना एक आश्चर्य कर्म हो सकता है, रहस्य नहीं। इस पर विश्वास करना कठिन है, इसे समझना इतना कठिन नहीं है। दूसरी ओर आत्मिक रूप से ऊपर उठा लिया जाना और रूपान्तरण का विचार समझने में कठिन है। इन वाक्य खंडों का अक्षरशः अर्थ विश्वास करने में कठिन हो सकते हैं, लेकिन समझने में नहीं। इस लिये इन्हें “रहस्य” नहीं कहा जा सकता। आत्मिक अर्थ को रहस्य कहा जा सकता है क्योंकि वे समझने में कठिन होते हैं, विश्वास करने में नहीं। स्वाभाविक समझ से वे छुपे रहते हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भौतिक रूप से ऊपर उठा लिये जाने के विचार के बदले हमें पौलुस के इन शब्दों को आत्मिक रूप से समझने का प्रयत्न करना आवश्यक है।

आइये हम इस भाग के विभिन्न कथनों को समझने के लिये अन्य उपायों पर विचार करें।

धर्मशास्त्र में उल्लेखित तीन घटनाएं हमारी सहायता करेंगी।

प्रभु स्वयं स्वर्ग से उतरेंगे

यह किसी भी ईश्वरीय घटना की नींव है। इजराइल के सामने परमेश्वर के प्रथम प्रकटीकरण के समय वह सिनाई पर्वत पर उतरे थे। यीशु ने स्वयं इन शब्दों को उस समय पूरा किया जब वे मनुष्य का रूप धारण कर स्वर्ग से उतरे और बैतलहम के चरनी में जन्म लिया। पेन्तिकोस के दिन एक और ईश्वरीय अवतरण हुआ जिसके अनुग्रह और महिमा की कल्पना भी कभी नहीं की गयी थी। इन सभी घटनाओं में, जैसे कि हम विचार कर रहे हैं, वह मनुष्यों को ऊपर उठाने के लिये स्वयं नीचे आ गए। मानव जाति के लिये इन घटनाओं में हरेक का प्रभाव अति शक्तिशाली और कल्पना से परे था। भविष्य में होने वाले अवतरण का प्रभाव, यदि हममें विश्वास करने का साहस है तो, इससे भी व्यापक और इससे भी महान् होगा।

ललकार के साथ

जब प्रभु का पृथ्वी पर आगमन हुआ तब उन्होंने बातें कीं। सिनाई पर्वत पर उन्होंने दस आज्ञा दीं और उसके साथ ही अति महत्त्वपूर्ण शाब्दिक प्रकाश भी जो इससे पहले संसार ने कभी नहीं पाया था। मूसा के द्वारा व्यवस्था आया। परमेश्वर ने जिब्राईल स्वर्ग दूत के द्वारा मरियम को एक वचन कहा, और उस वचन ने उसके गर्भ में शरीर धारण किया। पेन्तिकोस के दिन एकत्रित हुए समूह की जीभें स्वतन्त्र कर दी गयी और उन्होंने परमेश्वर का वचन आशातीत सामर्थ्य से प्रचार किया।

सभी घटनाओं में आज्ञा किये गये शब्दों का विश्व व्यापी प्रभाव पड़ा था। दस आज्ञा, यीशु का सुसमाचार, और पेन्तिकोस का प्रभाव पूरे विश्व में फैल चुके हैं। प्रभु का आगमन और उनकी उपस्थिति इससे भी बड़ा प्रभाव डालेंगे।

प्रधान दूत का शब्द

धर्मशास्त्र में हमें प्रधान दूतों के विषय में बहुत कम जानकारी मिलती है। सिर्फ मिखाएल के विषय में स्पष्ट रूप से कुछ वर्णन मिलता है। किम्वदन्ती के अनुसार सिनाई पर्वत पर मिखाएल के द्वारा मूसा को व्यवस्था दी गयी थी (जिसको स्तिफनुस ने प्रेरित ७:३८ मे उद्धृत किया था)। यीशु के जन्म की घोषणा करने का सौभाग्य जिब्राईल को मिला था और किम्वदन्ती के अनुसार १थिस्स ४:१६ में भी उसी को इंगित किया गया है।

परमेश्वर की तुरही

परमेश्वर के महान् पर्वों की घोषणा करने के लिए तुरही का उपयोग किया जाता था। सिनाई पर्वत की घटनाएं मिश्र देश से निर्गमन के ५० वें दिन हुई थीं और पेन्तिकोस के दिन का पूर्वाभास कराती थी जो यीशु के पुनरुत्थान के ५० दिन बाद पड़ता था। सिनाई पर तुरही जोर से और लम्बे समय तक बजती रही थी, पर पेन्तिकोस के दिन इसका बजना आत्मिक तुरही के समान था। यीशु भी अपने आगमन के साथ तुरही की आवाज को सम्मिलित करते हैं (मत्ती २४:३०) मेरा मानना है कि जिस भाग पर हम विचार कर रहे हैं, वह झोपड़ियों के पर्व के पूर्ण होने का वर्णन करता है (The Festivals of Israel देखें)।

जो मसीह में मरे हैं, वे पहिले जी उठेंगे

रोमियों को अपने पत्र में पौलुस ने लिखा, “सो उस मृत्यु का बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें। क्योंकि यदि हम उस की मृत्यु की समानता में उसके साथ जुट गए हैं, तो निश्चय उसके जी उठने की समानता में भी जुट जाएंगे।” यहां वह शारीरिक मृत्यु की नहीं वरन् आत्मिक मृत्यु की बात कर रहे थे।

हममें से बहुत से व्यक्ति, मेरा मानना है, अभी मृत्यु के अनुभव से गुजर रहे हैं। छुटकारे का दिन, जो मृत्यु को दर्शाता है, तंबू के पर्व से पहले आता है, जिस प्रकार पुनरुत्थान से पहले मृत्यु होती है। आने वाले पर्व की महिमा में यीशु के साथ राज्य करने से पहले हमें उनके कष्ट और उनकी मृत्यु का अनुभव करना आवश्यक है। हमें अपने लिये और संसार के लिये मरना आवश्यक है। जब तक इस संसार का दावा हमारे ऊपर है, हम इस पर राज्य नहीं कर सकते। जिनकी शारीरिक मृत्यु हो चुकी है, संसार का उन पर कोई दावा नहीं है। वे इसके किसी भी नियम या प्रचलन के अधीन नहीं हैं। वे तो जा चुके हैं। इस आत्मिक मृत्यु का प्रभाव भी ऐसा ही पड़ेगा।

इसलिये मसीह में जिनकी आत्मिक मृत्यु हो चुकी है वे आत्मिक पुनरुत्थान का अनुभव करेंगे।

“तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उन के साथ बादलों पर उठा लिये जाएंगे, कि हवा में प्रभु से मिलें, और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे”

क्या हम यीशु से भौतिक हवा में मिलेंगे? आत्मा के लिये उपयोग किया गया यूनानी शब्द “निउमा” का मूल अर्थ सांस या हवा होता है। ये दोनों ही गतिमान हवा हैं। हमने बादलों का अर्थ देखा है कि ये वे लोग हैं जो शुद्ध किए गये हैं और परमेश्वर के पास ऊपर उठा लिये गये हैं। इस लिये हवा वह आत्मिक अवस्था है जहां बादल विचरण करते हैं। वही वह स्थान है जहां हम हैं और प्रभु के साथ रहेंगे।

हम इस बात को समझ सकते हैं कि शारीरिक रूप से ऊपर उठा लिये जाने की घटना पौलुस के जीवन काल में नहीं हुई, इससे भी यह प्रमाणित होता है कि इस भाग को अक्षरशः नहीं लिया जा सकता।

परुसिया

इस लेख का शीर्षक “प्रभु का आगमन” है। नये नियम में बार बार यूनानी शब्द παρουσια (परुसिया) का अनुवाद आगमन किया गया है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है “बगल में होना” और इसीलिये “उपस्थिति” भी। क्योंकि बिना आये आप उपस्थित नहीं रह सकते इसलिये इसका अर्थ “आगमन” लगाया गया।

मुझे ऐसा लगता है कि कई बार परमेश्वर धर्मशास्त्र में द्विअर्थी शब्दों को रहने देते हैं जब तक कि किसी विशेष प्रकाश के प्रकट होने का समय नहीं आ जाय। जब तक परमेश्वर उन्हें प्रकट करने की इच्छा न करें, पूर्ण सत्यता छुपा रहता है। यद्यपि आगमन और उपस्थिति, दोनों ही परुसिया के सही अनुवाद हैं, मुझे लगता है कि हम लोग परमेश्वर का उद्देश्य स्पष्ट रूप से तब समझ पायेंगे जब हम इसका अनुवाद “उपस्थिति” करेंगे।

मानवीय विचार में किसी का आगमन नाटकीय और भावनात्मक क्षण हो सकता है, लेकिन आगमन के बाद जो कुछ होता है, वह आगमन की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण है। यीशु की उपस्थिति उनके आगमन से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

मत्ती रचित सुसमाचार में यीशु ने चेलों से जो अन्तिम प्रतिज्ञा की थी वह उनकी उपस्थिति की थी। उनके शब्द थे, “मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं।” निःसंदेह भौतिक रूप से उन्हें छोड़ने के बाद भी यीशु अपने आरम्भिक अनुयायियों के साथ थे। वह अपने लोगों के साथ उनके कष्ट में और उनकी सफलता में शताब्दियों से लेकर आज तक उपस्थित रहे हैं और निःसंदेह वह आज भी हमारे साथ और हमारे अन्दर उपस्थित हैं। लेकिन मैं समझता हूं कि हम लोग निकट भविष्य में ही उस उपस्थिति को पहले की तुलना में और अधिक अंश में अनुभव करेंगे।

पौलुस ने इफिसियो को लिखा था कि उन्होंने अपने उत्तराधिकार का सिर्फ बयाना पाया था (इफिसियों १:१४)। इसका अर्थ यह है कि बहुत कुछ पाना बाकी है। अभी तो मुख्य चीज आना बाकी ही है। पेन्तिकोस अद्भुत था। यह तब तक का परमेश्वर के अनुग्रह का सब से बड़ा आमद था। फिर भी भविष्य में जो होगा, उसकी तुलना में यह बहुत छोटा था।

सारांश

करोड़ों ईसाइयों को यह शिक्षा दी गयी है कि पृथ्वी पर यीशु के सशरीर, भौतिक, व्यक्तिगत दूसरे आगमन की प्रतीक्षा करें। यह शिक्षा धर्मशास्त्र के विशेष पदों पर आधारित है। जैसेः

इन पदों का अक्षरशः पूरा होने के बदले हमने विचार किया है कि ये आत्मिक रूप से पूरे होंगे।

यह अविश्वास का मार्ग नहीं है, वरन् यीशु ने भी ठीक वैसा ही किया था। जब उन्होंने चेलों को फरिसियों के खमीर से सावधान रहने के लिये कहा था, तब उन्होंने उनकी बातों को अक्षरशः लिया और यह समझ बैठे कि वे शारीरिक भोजन की बात कर रहे थे। वास्तव में वह तो फरिसियों की शिक्षा की बात कर रहे थे। जब उन्होंने मन्दिर को नष्ट करने और उसे तीन दिन में बनाने की बात की तब भी वह ईंट और गारा से बनी मन्दिर की बात नहीं कर रहे थे। वह तो अपने शरीर की बात कर रहे थे, जो परमेश्वर का असली मन्दिर है।

आरम्भिक मण्डली के अधिकांश सदस्य यीशु को उनके शरीर में देखा था और उनसे बात की थी। निस्संदेह उनके साथ यीशु की शारीरिक उपस्थिति को भूल जाना उनके लिये बहुत कठिन था।

पहली नजर में यीशु के भौतिक शरीर में इस पृथ्वी पर लौटने और संतों का सशरीर ऊपर उठा लिये जाने के लिये बड़े विश्वास की आवश्यकता है। पर क्या यह वास्तविक विश्वास है? या फिर यह किसी खास शिक्षा को पकड़े रखना है?

वास्तविक विश्वास भविष्य से सम्बन्धित खास शिक्षाओं को मानना नहीं है। न ही यह बाइबल के किसी अंश के अक्षरशः अनुवाद से चिपकना है। वरन् यह तो परमेश्वर का वचन सुनकर ग्रहण करना और उसका पालन करना है।

भविष्य से जुड़े किसी विशेष शिक्षा को पकड़े रहना वास्तविक विश्वास नहीं है। यह सिर्फ इतना कर सकता है कि जिस शैक्षिक समूह से वे जुड़े हैं उसमें इनकी सदस्यता पक्का कर दे और अन्य लोग जिनके विचार भिन्न हैं उनसे अलग कर दे।

धर्मशास्त्र के असली आत्मिक अर्थ समझना, हमारे विश्वास और परमेश्वर के प्रति समर्पण को मजबूत करता है।

परमेश्वर अनुग्रह करें, “और तुम्हारे मन की आंखें ज्योतिर्मय हों कि तुम जान लो कि उसके बुलाने से कैसी आशा होती है, और पवित्र लोगों में उस की मीरास की महिमा का धन कैसा है। और उस की सामर्थ हमारी ओर जो विश्वास करते हैं, कितनी महान है” (इफिसियो १:१८, १९)।

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