बेबीलोन

परिचय

बाइबल की पहली पुस्तक उत्पत्ति के आरम्भ और आखिरी पुस्तक प्रकाशितवाक्य के अन्त में हम बेबीलोन शहर के विषय में पढ़ते हैं। उत्पत्ति में हिब्रू नाम बाबेल उपयोग किया गया है तो प्रकाशितवाक्य में यूनानी नाम बेबीलोन उपयोग किया गया है। बाबेल और बेबीलोन का विषय एक ही है, जिसे हम सिधा धर्मशास्त्र से देख सकते हैं । इसका आरम्भ उत्पत्ति ११ अध्याय में उल्लेख किया गया है । यशायाह के दो अध्याय – १३ और १४ तथा यिर्मयाह के दो लम्बे अध्याय – ५० और ५१ में बेबीलोन के इनसाफ के विषय में विस्तृत रूप में वर्णन किया गया है । दानियल की पुस्तक बेबीलोन में लिखी गयी थी । एज्रा, नहेम्याह, हाग्गै और जकर्याह की पुस्तकों में बेबीलोन से लौटकर आने और यरुशलेम के पुनर्निर्माण को प्रमुखता दी गयी है । प्रकाशितवाक्य के अन्तिम भाग में बेबीलोन के इन्साफ और विनाश के वर्णन से भरे हुए दो पूरा अध्याय (१८ और १९) मिलते हैं । अन्त में प्रकाशितवाक्य १८: ४,५ में बाहर निकल आने की आज्ञा दी गयी है, “हे मेरे लोगों, उस में से निकल आओ; कि तुम उसके पापों में भागी न हो, और उस की विपत्तियों में से कोई तुम पर आ न पड़े। क्योंकि उसके पाप स्वर्ग तक पहुंच गए हैं, और उसके अधर्म परमेश्वर को स्मरण आए हैं”। यदि हम बाबेल या बेबीलोन क्या है, यह नहीं जान पाये तो इस आज्ञा का पालन करना तो दूर की बात है, इसे समझ भी नहीं पायेंग।

नियमित संगति में सहभागी होना, प्रभु भोज, बपतिस्मा और अन्य बहुत से विषयों की तुलना में इस विषय पर अधिक शिक्षा उपलब्ध हैं । धर्मशास्त्र में परमेश्वर ने जिन बातों पर जोर दिया है, उन्हें हम नजरअन्दाज नहीं कर सकते । आइये हम उत्पत्ति ११ अध्याय पढ़कर और सावधानीपूर्वक घटनाओं को जाँचें।

परमेश्वर का पहल

इस घटना में सर्वप्रथम यह बात सामने आती है कि इसमें परमेश्वर की स्वीकृति नहीं थी । यह सब मनुष्यों की अपनी योजना थी । उत्पत्ति के अगले अध्याय में अन्तर स्पष्ट है जो इस वचन के साथ आरम्भ होता है, ‘परम प्रभु ने अब्राम से कहा, “जा”﹒﹒﹒।’ इब्राहिम ने अपनी इच्छा से नहीं, परन्तु परमेश्वर की आज्ञा पाकर कलदियों के ऊर देश को छोड़ा । यह सम्भव है कि वह अनिच्छा से निकला हो, पर परमेश्वर ने उसे आशीष दी और आज वह इतिहास के महान् व्यक्तियों में गिना जाता है । जब मूसा ने अपनी ही पहल पर इस्राएलियों को छुड़ाने की कोशिश की तो जल्द ही वह समस्या में पड़ गया और से मिद्यान भागना पड़ा । ४० वर्षों बाद जब वह अनिच्छा होते हुए भी परमेश्वर की आज्ञा अनुसार लौटा तो एक महान् छुटकारे के काम को पुरा किया । ऐसे लोगों की बहुत सारी कथाएं हैं, जिन्होंने परमेश्वर की आज्ञा अनुसार काम किया और आशीष पाया । परमेश्वर सिर्फ अपनी योजनाओं को ही आशीष देंगे । यीशु ने कहा, “हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा” (मत्ती १५:१३)। हम इस पद से तुलना कर सकते हैं, “जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है” (युहन्ना ३:६)। परमेश्वर केवल उसी को आशीष देते हैं जो वे स्वयं आरम्भ करते हैं। यीशु के जीवन की सफलता इस बात में थी कि उनके द्वारा बोले गये एक एक शब्द और उनके द्वारा किये गये एक एक काम परमेश्वर की इच्छा अनुसार थे।

यूहन्ना के सुसमाचार के आरम्भिक शब्दों से हम यही शिक्षा पाते हैं, “आदि में वचन था ﹒﹒﹒सब कुछ उसके द्वारा उत्पन्न हुआ” । उत्पत्ति का पहला अध्याय हमें दिखता है कि परमेश्वर की सृष्टि करने की शक्ति उनके शब्दों में है । जब वे बोलते हैं तो संसार बनते हैं । जब वे चुप रहते हैं तो कुछ नहीं बनता । जब उन्होंने इब्राहिम से बात की और इब्राहिम ने उनकी बात मान ली तो मनुष्य जाति के उद्धार के लिये परमेश्वर के महान् योजना का आरम्भ हुआ । बाबेल के मीनार बनाने का मानव प्रयास शीघ्र विफल हो गया।

निर्माण सामग्री

इस कथा में जो दूसरी बात हम देखते हैं, वह है निर्माण सामग्री का चयन । “आओ; हम ईंटें बना बना के भली भाँति आग में पकाएं”। इन ईंटों का विशेष अर्थ है । पहली बात यह कि वे मिट्टी की बनी हैं, जो मानव स्वभाव को दर्शाता है । मिट्टी के ऐसे बर्तन जिनमें स्वर्गीय महिमा वास करती है, धर्मशास्त्र में इनका सकारात्मक सांकेतिक अर्थ है, लेकिन मिट्टी या मानवीय स्वभाव निर्माण सामग्री के रूप में कदापि स्वीकार्य नहीं है । पुराने नियम के वेदी और मन्दिर पत्थर के बने थे – जो प्राकृतिक वस्तु है, मानव निर्मित नहीं ।

दूसरी बात यह है कि ईंट बड़े तादाद में उत्पादन होते हैं । वे सब एक ही नाप और एक ही आकार के होते हैं । मानव धर्म का सदा ऐसा ही प्रतिफल होता है । इसके सब उत्पाद एक समान ही दिखते हैं । संसार एकरूपता चाहती है । समान विचार के व्यक्तियों में अपने आपको सुरक्षित समझती है । धर्मशास्त्र में बहुत ढूंढ़ने पर भी दो व्यक्ति एक ही तरह के नहीं मिलेंगे । नूह ने जहाज का निर्माण किया । इब्राहिम ने तम्बुओं में जीवन व्यतीत किया । युसुफ प्रधान मन्त्री बना । मूसा ने अपने लोगों को छुड़ाया । दाऊद एक राजा था जिसने परमेश्वर के सामने नृत्य किया । नये नियम में हम पतरस, पौलुस और युहन्ना के चरित्र और उनकी सेवकाई की विभिन्नता देखते हैं। बड़े तादाद में इनका उत्पादन नहीं हुआ था । प्रत्येक व्यक्ति का पवित्र आत्मा के द्वारा परिवर्तन हुआ था और वे अपने उद्धार कर्ता के आत्मिक स्वरूप में ढाले गये थे । संसार के लिये वे एकरूपता विरोधी अयोग्य व्यक्ति थे जो इसके लिये अनुपयुक्त थे । परमेश्वर के लिये उनका स्वरूप उनके जेष्ठ पुत्र के समान हो गया था। परमेश्वर ऐसे जीवित पत्थरों से एक मन्दिर का निर्माण कर रहे हैं, जो विभिन्न आकार और नाप के हैं पर महान् निर्माता के द्वारा सब आपस में ठीक बैठेंगे । कोई भी दूसरे के पद से ईर्ष्या नहीं करेगा क्योंकि सब अपनी अपनी ठीक जगह पर रहेंगे ।

तीसरी बात यह कि ईन ईंटों को आग में भली भाँति पकाया गया था । इसका उद्देश्य था इनमें कठोरता लाना । विभिन्न धार्मिक सम्प्रदाय के सदस्यों को कट्टरपन्थी अवस्था में देखना अति दुःखद बात है । ये सब वास्तव में ईंट से बनी दीवार जैसे हैं। इन्हें भली भाँति आग में पकाकर कठोर बनाया गया है ताकि इन पर और किसी बात का कोई प्रभाव न पड़े । परमेश्वर का सच्चा संतान बलवान तो होता है पर कठोर नहीं । उसकी शक्ति पवित्र आत्मा की आन्तरिक शक्ति है । उसकी आन्तरिक अनिश्चितता को बचाने के लिये कठोर और भेदा नहीं जाने वाला बाहरी परत की आवश्यकता नहीं है । उसका भरोसा परमेश्वर में है ।

यदि ईंटों को एक दूसरे पर रख दिया जाय तो निश्चय ही सब ढह जायेंगे । उन्हें एक दूसरे के साथ जोड़ाई करना आवश्यक है । इसलिए उन लोगों ने सीमेन्ट के बदले अलकतरा का उपयोग किया। सुलेमान के द्वारा निर्मित मन्दिर में सीमेन्ट का उपयोग नहीं हुआ था । पत्थर एक दूसरे से ठीक ठीक मील गये थे । बाबुल का धर्म ऐसी एकता को उत्पन्न करने और उसे कायम रखने का प्रयास करता है जो उसमें है ही नहीं । ऐसी मण्डलियों में उन्हें एक साथ बनाए रखने के लिये ताकतवर अगुवा की आवश्यकता पड़ती है । धार्मिक शिक्षा के अन्तर को दूर करने के लिये लम्बे सम्मेलनों का आयोजन करते हैं, उनके झुण्ड को छोड़ने वालों पर बहुत तरह के दबाव दिये जाते हैं । परमेश्वर के सच्चे संतान के बीच अलग अवस्था है । उनमें एकता है । उनके हृदय में व्याप्त परमेश्वर के प्रेम के द्वारा वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। वे एक आत्मा के द्वारा एकता में लाये गये हैं। जाति, वर्ग, उम्र और लिङ्ग उनमें विभाजन नहीं ला सकता । इन के साथ साथ और सभी मानवीय बाधाओं के बावजूद वे एकता अनुभव करते हैं। पवित्र आत्मा उन्हें एक दूसरे को प्रेम करना सिखाते हैं।

नगर

चौथे पद में हम निर्माण कर्ताओं की योजना और उद्देश्य के विषय में पढ़ते हैं । “आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बातें करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें ऐसा न हो कि हम को सारी पृथ्वी पर फैलना पड़े”।

वे एक शहर निर्माण करना चाहते थे। धर्मशास्त्र के अनुसार कैन पहला नगर निर्माता था (उत्पत्ति ४:१७) । वह झूठे धर्म का संस्थापक भी था । उसने अपने ही काम का फल अर्पण किया, एक ऐसा भेंट जिसे परमेश्वर ने स्वीकार नहीं किया । धर्मशास्त्र का अगला नगर निर्माता हेम का पोता निम्रोद था, जिसके नाम का अर्थ ‘बागी’ होता है । वास्तव में उत्पत्ति १०:१० के बाद बाबुल के निर्माण में इसकी भुमिका अग्रणी थी । उसने कोई सबक नहीं सिखा और अपने बागीपन में आगे बढते हुए अन्य नगरों का निर्माण करता गया । परमेश्वर ने पहले आदम और फिर नूह को पृथ्वी में भर जाने की आज्ञा दी थी । इसलिए एक ही जगह पर जमा होना उनकी योजना के विपरीत था । उन्हों ने ऐसा क्यों किया ? हिब्रु शब्द ‘इर’ जिसका अर्थ नगर होता है, ऐसे मूल शब्द से बना है जिसका अर्थ है जगे रहना या निगरानी करना । यह चारदीवारी वाला सुरक्षित नगर के अर्थ में आता है । जिस दिन कैन ने हाबिल की हत्या की, उसी दिन से वह अपने प्राण के लिये भयभीत था (उत्पत्ति ४:१४) । उसे सुरक्षा की आवश्यकता थी पर वह इसके लिये परमेश्वर पर भरोसा नहीं कर सकता था। कैन के समान निम्रोद भी हत्यारा था (उत्पत्ति १०:८,९)। वह ऐसा निर्माण करना चाहता था जो उसके गलत काम के फल से बचा सके । परन्तु हमारे लिये, परमेश्वर हमारे बल और शरणस्थल हैं

कैन और निम्रोद की तुलना में इब्राहिम एक आश्चर्यजनक अन्तर पेश करते हैं । प्राचीन काल के एक अति विकसित नगर ऊर में इब्राहिम सुरक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे । परमेश्वर ने उन्हें अपना देश, अपने कुटुम्ब और अपने पिता का घर छोड़ने को कहा और उन्होंने छोड़ दिया । नूह के पुत्र शेम सहित उनके पाँच पुरखे उस समय तक जीवित थे और शायद उनके साथ ही रहते थे । वे सब अच्छे और विश्वास योग्य व्यक्ति थे, पर परमेश्वर की आज्ञा पाकर उसने उन्हें छोड़ दिया । इसका कारण हम हिब्रू ११: १०, १३ – १६ में पाते हैं । उसने एक स्वर्गीय नगर का दर्शन देखा था और उसके सांसारिक नकल से वह सन्तुष्ट नहीं हो सकते थे । ऊर के दृश्य सुरक्षा की तुलना में परमेश्वर की सुरक्षा उत्तम थी । अपने कुटुम्ब की संगति के लिये वह परमेश्वर की संगति को बलिदान नहीं कर सकते थे। विश्वास की दृष्टि से उसने स्वर्गीय यरुशलेम को देखा और सांसारिक नगरों को तुच्छ समझा । बाद में जब लुत सदोम नगर में रहने चला गया तो भी इब्राहिम अपने तंबू में ही रहा । उसने कुछ अच्छी चीजें देखी थीं । इस प्रकार वह विश्वासियों का पिता बन गया । वह पवित्र नगर, नया यरुशलेम, जिसकी वह प्रतीक्षा कर रहा था, वह मिट्टी की ईंटों से निर्माण नहीं होगा । वह तो अपने पति के लिये शृंगार की हुई दुल्हन की तरह परमेश्वर के पास से स्वर्ग से नीचे उतरेगा (प्रकाश २१:२)।

महानता

अब हम उस मीनार के बारे में विचार करें जिसका निर्माण करने का उन्होंने प्रयास किया था। मीनार के लिये उपयोग किया गया हिब्रू शब्द ‘मिगडोल’ है जो ‘ग्ड्ल’ मूल शब्द से बना है और इसका अर्थ ‘महान होना’ है। हम इसे ‘महानता’ कह सकते हैं । वे कुछ ‘बड़ा’ निर्माण कर रहे थे।

धर्मशास्त्र में दो प्रकार की महानता हैं । प्रथम तो परमेश्वर की महानता है जो वह चुने हुए लोगों को भी प्रदान करते हैं और जो उनके आगे नम्रता पूर्वक जीवन यापन करते हैं । उत्पत्ति १२:२ में परमेश्वर ने इब्राहिम से कहा, “मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा”। इब्राहिम ने इस महानता को प्राप्त करने के लिये कोई संघर्ष नहीं किया । दृष्टिगत रूप में उसकी मृत्यु के वर्षों बाद यह प्राप्त हुआ । मिश्र देश में युसुफ को महान बनाया गया, लेकिन यह उसके अपने प्रयास से नहीं हुआ । परमेश्वर ने उसे उपर उठाया । इस्राएल तब महान बना जब परमेश्वर ने दाऊद के समय उसे विजय दी । और परमेश्वर ने यीशु को अति उच्च स्थान दिया क्योंकि उन्होंने अपने आप को नम्र किया और मृत्यु तक आग्याकारी रहे । परमेश्वर ने उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है, कि वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें, ( फिली﹒ २: ८ – १०)।

दूसरी महानता अपने आप को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा करती है । गोलियथ खड़ा होकर जीवित परमेश्वर की सेना को अपमानित किया। राजा शाऊल सभी लोगों से ऊंचा था, वह घमण्ड से भर गया और परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया । बाबुल प्रदेश में नबुकदनेस्सर ने साठ हाथ ऊँची मूर्ति स्थापित कराई, तत्पश्चात उसने अहंकार भरे शब्द कहे, “क्या यह बड़ा बाबुल नहीं है, जिसे मैं ही ने अपने बल और समर्थ से राज निवास होने को और अपने प्रताप की बड़ाई के लिये बसाया है”? (दान ४:३०)। ये शब्द उसके मुख में ही थे जब उसका साम्राज्य ले लिया गया अगले सात वर्षों तक एक पशु के तरह घास खाने के लिये उसे निकाल दिया गया । अन्त में उसे समझ आई कि परमेश्वर राज्य करता है और वह जिसे चाहता है उसके हाथ में शासन की बागडोर देता है । और हम प्रकाशितवाक्य में फिर “महान् बेबीलोन, वेश्याओं और पृथ्वी की घृणित वस्तुओं की जननी” के विषय में पढ़ते हैं (प्रकाश १७:५)

नाम

उन्होंने कहा, ‘आओ हम अपने लिये नाम कमायें’। गजब की दृढ़ता ! मुझे लगता है कि सम्पूर्ण बाइबल में यही एक घटना है जहाँ किसी का नाम नहीं है । इन सभी व्यक्तियों में किसी एक का नाम भी उल्लेख नहीं किया गया है । हम केवल ‘वे’ सर्वनाम ही पाते हैं । उन सब का नाम भुला दिया गया है, जबकि ४००० वर्षों बाद आज भी इब्राहिम का नाम विश्व प्रसिद्ध है । क्या आपको कभी आश्चर्य हुआ है कि एज्रा और नहेम्याह की पुस्तकों में क्यों नामों की लम्बी सूचि दी गयी है? ये सब बेबीलोन से निकल कर आने वाले वे लोग हैं जिनका हृदय यरुशलेम से लगा था, और परमेश्वर ने उनके नाम अपनी पुस्तक में लिखवाई जिससे सब उनके नाम पढ़ सकें । धर्मशास्त्र कितने ठीक हैं और इसे लिखने वालों का मन कितना असीमित !

लोग नाम कितना पसन्द करते हैं, किसी समूह या किसी नेता या कोई शिक्षा या कोई आन्दोलन जिससे वे ऐक्य वद्धता दिखा सकें, एक परिचय जो उन्हें स्वीकार्य बना सकता है । क्या यीशु में इसी चीज की कमी नहीं थी? “हम जानते हैं कि परमेश्वर ने मूसा से बातें कीं; परन्तु इस मनुष्य को नहीं जानते की कहां का है” (यूहन्ना ९:२९)। यदि आप वास्तव में परमेश्वर को जानते हैं तो यह जानने के लिये लोगों की मण्डली का नाम, सम्प्रदाय या अगुवा का नाम नहीं पूछेंगे कि वे आपके दल में हैं या नहीं और आप उनके साथ सुरक्षित रूप से संगति कर सकते हैं या नहीं । पतरस ने यीशु को इस प्रकार नहीं पहचाना था । उसने कहा, ‘आप जीवित परमेश्वर के पुत्र मसीह हैं’‘योना के पुत्र सिमोन (जिसका अर्थ होता है सुनने वाला) तुम धन्य हो’ यीशु ने जबाब दिया, ‘मांस और लहू ने इस बात को तुझ पर प्रकट नहीं किया पर स्वर्ग में रहने वाले मेरे पिता ने’।

आप यीशु के नाम को जितना अधिक प्रेम करना सीखेंगे, किसी समूह या सम्प्रदाय का नाम उतना ही तुच्छ लगेगा । आप उन्हें जितना अधिक प्रेम करेंगे, दूसरों के साथ आपकी संगति उतना ही अधिक इस प्रेम पर आधारित होगा । “और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरित ४:१२)। उनका नाम हमारे लिये जितना अधिक बहुमूल्य होगा, उतना ही और सब नाम महत्त्वहीन लगेंगे । ‘मैं पौलुस का हूँ’ और ‘मैं अपोलस का हूँ’, इन बातों का यीशु को प्रेम करने वालों के सामने कोई स्थान नहीं है ।

इनसाफ

बेबीलोन वासियों के साथ परमेश्वर का व्यवहार कैसा था? परमेश्वर उस नगर और उस मीनार को देखने नीचे उतर आए जिसे लोगों ने निर्माण किया था । यह कोई रहस्यात्मक भाषा नहीं है । इब्राहिम, मूसा, यहोशू और बहुत से चुने हुए सन्तों के सामने परमेश्वर ने अपने आप को प्रकट किया था । बेबीलोन, सदोम और मिश्र में अपने लोगों के पास परमेश्वर उतर आया, ऐसा हम पढ़ते हैं। वह उतर आया क्योंकि वे नीचे थे । परमेश्वर नीचे आकर एकता देखा और उन्होंने इसे तोड़ दिया । यह एकता उनकी इच्छा के अनुसार नहीं थी । यीशु ने प्रार्थना की, “जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूं, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत प्रतीति करे, कि तू ही ने मुझे भेजा” (यूहन्ना १७: २१)। उन्होंने मानव रचित संस्थागत एकता के लिए प्रार्थना नहीं की थी । एक साथ एकत्रित होने से हम एक नहीं होते पर यीशु के पास आने से एक होते हैं । जब हमारा मन उन पर केन्द्रित होता है, हम आत्मिक एकता में एक दूसरे के पास खिंचे चले आते हैं, वही एकता जो यीशु और पिता के बीच थी ।

एकता में शक्ति है । संसार इस बात को कितनी अच्छी तरह जानती है! संसार के लिये यह कितना महत्त्वपूर्ण है! छठे पद में परमेश्वर ने देखा कि बाबेल का निर्माण तो केवल आरम्भ था, और यदि उन्होंने इसे नहीं रोका तो आगे क्या हो सकता था, इसकी कोई सीमा नहीं थी । बाबेल एक महान् बागी साम्राज्य का आरम्भ था । परमेश्वर की आरम्भिक योजना थी कि पृथ्वी पर मनुष्य का शासन हो, लेकिन यह शासन मनुष्य और परमेश्वर की एकता और परमेश्वर पर निर्भरता के साथ हो । सारे सृष्टि की आशा मनुष्य का राज्य नहीं परन्तु परमेश्वर का राज्य है। बाबेल परमेश्वर के शासन का बहुत बड़े विकल्प का केवल आरम्भ था, उनके उद्देश्य का बहुत बड़ा नकल । “मैं तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूं”, हम दूसरी आज्ञा में पढ़ते हैं। और वे किसी भी विरोधी को स्थान नहीं देंगे । बाबेल का इनसाफ जल्द ही हो गया, जैसा बेल्शज्जर के शासन काल में बेबीलोन राज्य का और प्रकाशितवाक्य के पुस्तक में आत्मिक बेबीलोन का हुआ था । परमेश्वर ने उनकी भाषा गड़बड़ कर दी जिसके कारण वे एक दूसरे की बात समझ नहीं सके और फिर उन्हें सारी पृथ्वी पर तितर बितर कर दिया ।

आज हम ऐसे संसार में हैं जहाँ कोई भी एक दूसरे की बात नहीं समझता है । धर्म, राजनीति और व्यापार में आज तक बाबेल का इनसाफ व्याप्त है । इतिहास साक्षी है कि धर्म विभिन्न युद्धों और रक्तपात का कारण रहा है । इसलिये बाबेल या बाबुल किस बात का प्रतिनिधित्व करता है? इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हमें अपने ही हृदय में झांक कर यह पूछना होगा: क्या बाबेल आपके या मेरे अन्दर विद्यमान है? उत्पत्ति ११ या १२ में आपकी ही की कथा तो नहीं लिखी है? इब्राहिम की तरह क्या आप परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में चलते हैं? या क्या आप अपनी योजना स्वयं बनाते हैं और आशा करते हैं कि परमेश्वर इससे सहमत हों? क्या आप मानव-स्वभाव रूपी ईंटों से अपना भवन स्वयं निर्माण करने का प्रयास करते हैं? या जीवित पत्थर के रूप में आप परमेश्वर के मन्दिर में चिने गये हैं? क्या आप सांसारिक संस्थाओं में सुरक्षा ढूंढ़ते हैं या स्वर्गीय पिता में भरोसा करना सिख रहे हैं?

बेबीलोन की पहचान

बेबीलोन की नहरों के किनारे हम लोग बैठ गए, और सिय्योन को स्मरण कर के रो पड़े! ... उसके बीच के मजनू वृक्षों पर हम ने अपनी वीणाओं को टांग दिया... क्योंकि जो हम को बन्धुए कर के ले गए थे, उन्होंने वहां हम से गीत गवाना चाहा, और हमारे रूलाने वालों ने हम से आनन्द चाह कर कहा, सिय्योन के गीतों में से हमारे लिये कोई गीत गाओ! हम यहोवा के गीत को, पराए देश में क्योंकर गाएं? ... हे यरूशलेम, यदि मैं तुझे भूल जाऊं, तो मेरा दाहिना हाथ झूठा हो जाए! ... यदि मैं तुझे स्मरण न रखूं, यदि मैं यरूशलेम को अपने सब आनन्द से श्रेष्ठ न जानूं, तो मेरी जीभ तालू से चिपट जाए!

भजन १३७

बहुत कम भजन, वास्तव में मानव रचित सभी साहित्य में बहुत कम पद्य भजन १३७ की तुलना में अच्छी हैं । सभी परदेशी विदेश में बिना कोई बाजा बैठ कर रो रहे हैं, गीत गाने में असमर्थ हैं । बाबुल अपनी सारी सम्पत्ति और समृद्धि के बावजूद इनके हृदय को सन्तुष्ट नहीं कर सकता था । इनका सपना, आने वाले सैकड़ों वर्षों तक औरों के सपने की तरह ही, परमेश्वर का नगर सियोन था । वे पवित्र शहर यरुशलेम के लिये विलाप कर रहे थे जो उजाड़ और खण्डहर हो गया था, जबकि घमण्डी राजा नबुकदनस्सेर अपने द्वारा बसाया गया महान् बाबुल पर गर्व कर रहा था । कैसे वे लोग और कैसे हम सब परमेश्वर का गीत पराये देश में गा सकते हैं ।

वर्षों पहले इस भजन के मिठास से मैं अभिभूत हो गया था, और इसे कंठस्थ कर लिया था, लेकिन इसका आत्मिक अर्थ मुझे कुछ भी पता नहीं था। मैं इतना समझ रहा था कि सभी यहूदी अपनी दासता में अपने पुरखों के देश की तृष्णा कर रहे थे और घमण्डी शासकों से घृणा करते थे, लेकिन मैं आत्मिक बेबीलोन से अनजान था, प्रकाशितवाक्य की वह बड़ी वैश्या, जो सदियों से परमेश्वर के सच्चे मण्डली को कैद कर रखी है । मैं स्वयं भी पराये देश में हूँ, इसका ज्ञान भी मुझे नहीं था ।

बेबीलोन बाइबल के रहस्यों में से एक है ( प्रकाश १७: ५,७) । सांसारिक मन से इसका अर्थ छुपा हुआ है । यदि आप इसे ठीक से समझना चाहते है तो आपको परमेश्वर से इसके लिये प्रकाश मांगनी चाहिये । पवित्र आत्मा के प्रकाश के बिना धर्मशास्त्र का कोई भी सत्यता वास्तव में हमें लाभ नहीं दे सकती है, और जिन्हें परमेश्वर ने रहस्य ठहराया है उनके लिये तो यह और भी सही है ।

बहुत से व्यक्तियों का विचार है कि उनके अपने सम्प्रदाय को छोड़कर बाकी सभी सम्प्रदाय बाबुल की श्रेणी में आते हैं । उन्हें कुछ प्रकाश मिले थे जो उनके विचार में उनको दूसरों से अलग करता है । अन्य मंडलियों में बाबुल के लक्षण वे आसानी से पहचान लेते हैं पर अपनी मण्डली में यही लक्षण देख नहीं पाते । उन्होंने कभी भी परमेश्वर की आवाज नहीं सुनी । निश्चय ही वे गलत हैं, पर तब भी हमें बाबुल के रहस्य का सही अर्थ पता करना आवश्यक है ।

बेबीलोन से सम्बन्धित प्रश्न विशेष महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसका प्रभाव सम्पूर्ण संसार पर पड़ता है । “बाबुल यहोवा के हाथ में सोने का कटोरा था, जिस से सारी पृथ्वी के लोग मतवाले होते थे; जाति जाति के लोगों ने उसके दाखमधु में से पिया, इस कारण वे भी बावले हो गए” (यिर्मयाह ५१:७)। प्राचीन बाबेल वा बेबीलोन सभी अन्य जाति धर्मों का जड़ था । जब लोगों ने परमेश्वर की इच्छा जाने बिना अपना धार्मिक मीनार निर्माण करने का प्रयत्न किया, तब उन्हें पूजने के लिये दूसरे देवी देवता मिल गये, और इन धर्मों का दुष्प्रभाव पड़ोसी देशों में भी फैल गया । अन्त में प्राचीन इस्राएल देश के चारों ओर के ये देवी देवता ही उसके पतन और बंधक बनने का कारण बने।

प्रकाशितवाक्य १८:३ में हम पढ़ते हैं, “क्योंकि उसके व्यभिचार के भयानक मदिरा के कारण सब जातियां गिर गई हैं, और पृथ्वी के राजाओं ने उसके साथ व्यभिचार किया है; और पृथ्वी के व्यापारी उसके सुख-विलास की बहुतायत के कारण धनवान हुए हैं”। आत्मिक बेबीलोन का प्रभाव भी विश्वव्यापी होता है । इसने सम्पूर्ण ईसाई जगत को भ्रष्ट और दूषित कर दिया है । दूसरे शब्दों में सांसारिक बेबीलोन ने विगत में सांसारिक इस्राएल को दासता में पहुंचा दिया था। आत्मिक बाबुल ने वर्तमान में आत्मिक इस्राएल को दासता में पहुंचा दिया है ।

रोमन कैथोलिकवाद

धर्मशास्त्र के बहुतेरे विद्यार्थियों का विश्वास है कि महान् बेबीलोन आज का रोमन कैथोलिक मण्डली है । हम इस के पीछे रहे कुछ कारणों पर विचार करेंगे । सात पहाड़ियों पर बैठी एक वैश्या के रूप में बाबुल का वर्णन किया गया है (प्रकाश १७:९) । रोम नगर सात पहाड़ियों पर बसी है । वह स्त्री पृथ्वी के राजाओं पर शासन करती है (प्रकाश १७:१८)। अनेक शताब्दियों तक पोप ने यूरोप के एक बड़े भाग पर शासन किया । बेबीलोन में अकूत सम्पत्ति है (प्रकाश १८:१२) । भेटीकन की सम्पत्ति, जो पोप की राजधानी है, किसी से छुपी नहीं है । वह स्त्री संतों के लहू और यीशु के नाम की साक्षी बने लोगों के लहू पीकर मतवाला हो गयी थी (प्रकाश १७:६) । शताब्दियों तक यीशु के सच्चे चेले और वे लोग जिन्होंने रोम के शासन को नहीं माना, उनको दण्ड दिया गया, कैद किया गया, शारीरिक कष्ट दिया गया और जीवित जला दिया गया । इन भयंकर बातों से भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रोम आज भी अपने लाखों अनुयायियों को आत्मिक मृत्यु में ढकेल देता है ।

प्रकाश १७ में उस स्त्री को महान् वैश्या (पद १) और वेश्याओं की तथा पृथ्वी की घृणित वस्तुओं की जननी के रूप में वर्णन किया गया है (पद ५) । वैश्या वह स्त्री है जो अपने शरीर को पैसे के लिये बेचती है । परमेश्वर ने यौन को इसलिये स्थापित किया कि स्त्री और पुरुष इसके द्वारा एक दूसरे के साथ संगति करें, लेकिन वेश्यावृत्ति आर्थिक लाभ के लिये किया गया यौन का दुरुपयोग है । समष्टिगत रूप में रोम की मण्डली ने मनुष्य की परमेश्वर से संगति करने की इच्छा का और यीशु के सुसमाचार का अपने को धनी, शक्तिशाली और उच्च बनाने के लिये दुरुपयोग किया । यह महान् वैश्या बाबेल की मीनार के समय बोये गये दुष्ट बीजों का अन्तिम फल है । हम एक बहुत बड़े मीनार को धरती के ऊपर उठते हुए देखते हैं, जो पूर्ण रूप से मनुष्य के पहल पर आधारित है । इसके केन्द्र में एक मनुष्य है जिसके आगे और सब माथा टेकते और आराधना करते हैं ।

जब मैं ऐसी बातें करता हूं, मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक रोमन कैथोलिक पादरी या मण्डली सदस्य भ्रष्ट या दुष्ट है । मैं तो मण्डली संस्था और जिन बातों की ये दाबी करते है, मैं उनकी बात करता हूं ।हो सकता है व्यक्तिगत रूप से उन्हें परमेश्वर का सच्चा अनुभव मिला हो और वे धर्मी जीवन जी रहे हों, लेकिन यह सब उनकी मण्डली के कारण नहीं है । कैथोलिक मण्डली ने हमेशा कुछ हद तक सत्य की शिक्षा दी है, और कुछ लोगों ने इस सत्य को स्वीकार कर अपने शिक्षकों से ऊपर उठे हैं । 'पर हां, सरदीस में तेरे यहां कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्होंने ने अपने अपने वस्त्र अशुद्ध नहीं किए, वे श्वेत वस्त्र पहिने हुए मेरे साथ घूमेंगे क्योंकि वे इस योग्य हैं' (प्रकाश ३:४)

प्रोटेस्टेंट संप्रदाय

जैसा मैंने कहा है, वे लोग जो बाइबल अध्ययन करते हैं, खासकर प्रकाश की पुस्तक, उनके लिये यह जानना कठिन नहीं है कि रोम की मण्डली ही महान् बेबीलोन, वेश्याओं की जननी है । बाइबल की अज्ञानता के वर्तमान युग में इन बातों को दुहराना आवश्यक है । लेकिन यदि रोम वेश्याओं की जननी है तो बेटियां कहाँ हैं? क्या प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय वास्तव में भिन्न हैं ? जब हम उन्हें देखते हैं तो वही मानवीय मीनार ऊपर उठते हुए देखते हैं, सांसारिक ईंटें अलकतरा द्वारा एक दूसरे से बंधी हुई । इन्हें अपने नाम से भी प्रेम है, और यीशु का नाम भूल चुके हैं । इनके बहुत से सदस्य आत्मिक गरीबी, रोग और मृत्यु में जीते हैं ।

यीशु के बहुत से सच्चे अनुयायी ऐसे सम्प्रदाय में हैं जिनके अगुआ यीशु को परमेश्वर का पुत्र नहीं मानते, धर्मशास्त्र को इनकार करते हैं और अपना स्वतन्त्र धर्म संचालन करते हैं । परमेश्वर के लोग अविश्वासियों के साथ कैसे असमान जुए में जुत सकते हैं (२कोरि ६:१४)? फिर भी सभी प्रमुख प्रोटेस्टेंट संप्रदाय में ऐसा ही होता है । अन्धे सिर्फ अंधों की अगुआई नहीं बल्कि जिनकी आंखें है उन्हें भी अगुआई करने का प्रयत्न करते हैं ।

बहुत से प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय दिन प्रति दिन रोम के करीब जा रहे हैं । उनकी ईश्वरीय शिक्षा कुछ बूंदों पर भिन्न हो सकते हैं, पर उनकी आत्मा समान है, और यह बाबुल की आत्मा है । इब्राहिम के तरह पवित्र आत्मा द्वारा उनकी अगुवाई नहीं होती है, पर शारीरिक इच्छा के बल पर आगे बढ़ते हैं । पवित्र आत्मा को पृथ्वी से हटा लेने पर भी अधिकांश मण्डली यह जाने बिना कि क्या हुआ है, अपने कार्यक्रम चलाते रहेंगे।

क्या यह वास्तव में सत्य हो सकता है कि लाखों लोगों ने जिन मंडलियों को शताब्दियों से आदर करते आये हैं, वे परमेश्वर की दृष्टि में बाबुल हों? क्या यह वास्तव में सत्य हो सकता है कि हेजेकिया के समय में सभी ऊंचे स्थान परमेश्वर की दृष्टि में घृणास्पद थे? शताब्दियों से इसरायली लोग इन स्थानों पर धूप जलाते और बलिदान करते आए थे। हेजेकिया के दादा जोथाम एक धर्मी राजा थे और उन्होंने इन ऊंचे स्थानों को नष्ट नहीं किया था। जोथाम के पिता उजिया भी धर्मी राजा थे और उन्होंने भी इन्हें नष्ट नहीं किया था । उनके पिता अमाजिया भी धर्मी थे और उन्होंने भी इन्हें नष्ट नहीं किया था, और न ही इनके पहले जेहोआस ने । क्या चार पुस्तों तक ईश्वर भक्त राजाओं द्वारा ठीक समझी गई कोई चीज वास्तव में गलत हो सकती है ? क्या शमुएल ने भी ऊंचे स्थान पर बलि नहीं चढ़ाए थे? हेजेकिया रीति थिति से ऊपर उठा - धर्मी व्यक्तियों द्वारा स्वीकार किये गए रीतियों से ऊपर । वह मनुष्यों के पीछे नहीं लगा, पर परमेश्वर के पीछे लगा। यदि ऊंचे स्थान परमेश्वर के लिये घृणास्पद थे तो उन्हें तोड़ देना चाहिए । हमारे पूर्वजों ने क्या किया, क्या हमें उसी में सीमित रहना चाहिए? उनके लिये जो ठीक था, क्या हमारे लिये भी वही ठीक है? अथवा क्या हम परमेश्वर की आज्ञा पालन कर और आगे जाना चाहते हैं?

हृदय के अन्दर का बेबीलोन

यदि अधिकांश प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय भी बेबीलोन हैं तो क्या जो धर्मशास्त्र पर विश्वास करते हैं वे सब ठीक हैं?

वह विशेष समूह जिसे यीशु ने सबसे अधिक इंकार किया वे फरिसी थे। ये वे लोग थे जो मूसा के स्थान पर बैठते थे और धर्मशास्त्र पर विश्वास करने और ठीक शिक्षा देने की दलील देते थे । सदुकियों के विपरीत वे अलौकिकता - स्वर्ग दूत और आत्मा में विश्वास करते थे । लेकिन बाबुल के निवासियों के तरह ही इनका धर्म परमेश्वर से प्रेरित नहीं था वरन् मनुष्यों से प्रेरित था। इन्हें भोज में आदर पूर्ण स्थान और सभाघर में मुख्य स्थान पसन्द थे। उनके नाम के साथ अच्छे पद का जुड़ना बहुत ही अच्छा लगता था। एक व्यक्ति को धर्म परिवर्तन कराने के लिये ये जमीन और आसमान एक कर देते थे। बाहरी रूप से मनुष्यों की नजर में वे धर्मी दिखते थे, पर अन्दर से कपट और पाप से भरे हुए थे। (विस्तृत विवरण के लिये मत्ती २३ अध्याय पढ़ें)। कोई भी व्यक्ति बाइबल पर विश्वास करने के बावजूद भी बाबुल के आत्मा से ग्रस्त हो सकता है । परमेश्वर पवित्र आत्मा उनको नहीं देते जिनकी शिक्षा ठीक है, पर उनको देते हैं जो आज्ञाकारी हैं (प्रेरित ५:३२)। पवित्र आत्मा और आज्ञाकारिता के बिना धर्मशास्त्र का सम्पूर्ण ज्ञान हमें सिर्फ दूसरा बाबुल निर्माण करने में सहायक होगा।

उस स्त्री के माथे पर महान् बेबीलोन लिखा था । आप सभी बाबुल सदृश झुण्ड को छोड़ दे लेकिन यदि बाबुल का नाम आपके माथे पर - आपके मन और आपके सोच में - लिखा है तो आपको कोई लाभ नहीं होगा । आप जल्द ही दूसरा बाबुल निर्माण कर लेंगे और आप पहले जैसी अवस्था में ही रहेंगे। यह समस्या मण्डली के सदस्यता से भी बहुत बड़ी है। अपने शहर में बेबीलोन विचार धारा के विपरीत विचार वाले मण्डली ढूंढ़ना छोड़कर अपने अन्दर स्थित बाबुल की आत्मा को निकालिए।

बेबीलोन का जड़ मनुष्य का घमण्ड है। “मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है” यिर्मयाह ने लिखा, (१७:९)। इसी जगह पर सारे समस्याओं का जड़ है । हम कुछ ऐसा निर्माण करना पसन्द करते है जिसके द्वारा हम महिमीत हो सकें। हम जोर देकर कहते है कि परमेश्वर को महिमा देना चाहते है, पर गुप चुप यह महिमा उनसे चुरा लेते हैं । हम दृढता के साथ घोषणा करते है कि लोगो को खुश करने का हमारा कोई इरादा नहीं है, पर हम लोगों की तालियां सुनने के लिये बेचैन रहते है। हम यीशु की बेइज्जती में सहभागी होने के लिए शहर के बाहर नहीं निकलना चाहते।

यदि आपने सिर्फ बेबीलोन का बाहरी स्वरूप ही देखा है तो, जीवन भर आप इसके सड़कों पर घूमते रह जायेंगे और नये यरुशलेम जाने के लिये इसे कभी नहीं छोड़ पाएंगे।

वेश्यावृत्ति

आत्मिक वेश्यावृत्ति के विचार की ओर हमें लौटना चाहिए। परमेश्वर की इच्छा यही है कि शारीरिक सम्बन्ध सिर्फ वैवाहिक बन्धन के अन्दर हो ताकि पति पत्नी प्रेम में एक हों और इसके फलस्वरूप सन्तान उत्पन्न हो सकें। वेश्या सहवास को पैसा कमाने के लिए दुरुपयोग करती है । कोई भी मण्डली यदि अपने सदस्यों से पैसा लेने के लिए धर्म का उपयोग करती है तो यह आत्मिक वेश्यावृत्ति करती है। यदि कोई प्रचारक अपने आत्मिक वरदान को अपने आपको धनी बनाने के लिए उपयोग करता है तो भी वही करता है । कोई भी व्यक्ति यदि पारिश्रमिक के लोभ में पास्टर बनना चाहता है तो वह भी आत्मिक वेश्या है ।

लेकिन रुपया पैसा ही एकमात्र समस्या नहीं है । हम सबको अपनी आंख के अन्दर का लट्ठा न देखकर अपने भाई की आंख का तिनका देखने में सावधान होना होगा। यदि हम सुसमाचार और अपने आत्मिक वरदान या सेवकाई का उपयोग मसीह के शरीर को पवित्र करने के बदले अपनी स्थिति मजबूत करने के किये करते है तो हम भी आत्मिक वेश्याओं से भिन्न नहीं हैं । प्रभु के लिये हमारी सेवा क्या उनके लिये और भाइयों के लिये प्रेम से प्रेरित है या पद, प्रतिष्ठा और पैसा से? उनकी नजर में हम विश्वास योग्य दास हैं या वेश्याएं?

बेबीलोन के पाप

बेबीलोन को नष्ट किया जाना है। प्रकाशितवाक्य का १८ अध्याय इस विनाश का विस्तृत वर्णन करता है। हमने देखा है बेबीलोन वास्तव में सांसारिक धर्म है। इसके प्रति परमेश्वर के क्रोध का कारण क्या हो सकता है? इस अध्याय मे दिए गये दो कारण, पाप और दुष्टात्मा हैं । पांचवें पद में हम पढ़ते है, “उसके पाप जमा होकर स्वर्ग जितना उँचा हो गये हैं ।” परमेश्वर पाप से घृणा करते हैं । पुराने नियम के समय उन्होंने अपने लोगों को पाप के लिये बलि चढ़ाने और भेंट लाने की आज्ञा देकर इस सत्यता को सिखाया। बहुत से नबियो ने भी पाप के प्रति परमेश्वर के क्रोध के विषय में उन्हें चेतावनी दी थी। यीशु का नाम ऐसा इसलिए रखा गया था कि वे अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेंगे ९(यहो-शुआ = यहवे बचाते है) (मत्ती १:२१)। यह इतना महत्त्वपूर्ण था कि इसके लिये उन्होंने अपना प्राण अर्पण कर दिया। उन्होंने सिर्फ अपना प्राण ही नहीं दिया परन्तु क्रूस पर लटकते समय अपने पिता से अलग होने का जो गहरी वेदना थी, उसे भी सहा। और यह सब मनुष्य के पाप के कारण हुआ।

मानव -स्थापित धर्म न शक्तिशाली है और न चाहती है कि लोगों को पाप से उद्धार दे सके। अच्छे मनोभाव दुष्ट हृदय को परिवर्तन नहीं कर सकते। सांसारिक धर्म सभी प्रकार की दुष्टता को जन्म देते हैं । बहुत से मण्डली में ऐसे सदस्य है जो सभी दस आज्ञा तोड़ते रहते हैं । कुछ लोग दूसरे देवी देवताओं को पूजते हैं, कुछ लोग मूर्तियों के आगे शिर झुकाते हैं, कुछ लोग प्रभू का नाम व्यर्थ लेते रहते है और इसमें उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती । कुछ लोग परमेश्वर के नाम से अपने माता पिता का अनादर करते है, घृणा के द्वारा और लोग अपने हृदय में हत्या करते है, कुछ मंडलियों ने तो अपने शत्रुओं की हत्या करने तक का प्रयास किया है। कुछ मण्डली सभी प्रकार के अनैतिक पाप में लिप्त लोगों को स्वीकार करते हैं, अपने भेड़ों से चोरी कर बहुत से धनी हो गये हैं, झूठी साक्षी की भरमार है और लोभ इस कदर व्याप्त है कि कोई भी इसे बुरा नहीं मानता।

बहुत से लोग ऐसा जीवन व्यतीत करते है जो कम से कम बाहरी रूप से तो आदरणीय लगता है और जिन बातों का जिक्र अभी मैं ने किया है, उनमें वे व्यक्तिगत रूप से दोषी न हों, लेकिन अपने आप को मसीही कहने वाले सभी मंडलियों में ये सारी बातें व्याप्त हैं । क्या कोई कभी कल्पना करता है कि परमेश्वर इन मंडलियों को इस पृथ्वी पर आपने प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं?

अधिकांश धार्मिक संसार पाप के विरुद्ध लड़ने के लिये किसी भी तरह तैयार नहीं है। क्योंकि यह स्वयं धर्मी नहीं है, यह पाप को घृणा नहीं करता, और जिसे आप घृणा नहीं करते उसके विरुद्ध युद्ध नहीं करेंगे। धार्मिक संसार सम्मेलनों, राजनीति, मानव अधिकार, संवाद के नये उपाय, आधुनिक विधि से साक्षी देने जैसे विषय में अधिक व्यस्त है, परमेश्वर की धार्मिकता में नहीं।

बेबीलोन के दुष्टात्मा

प्रकाशित वाक्य के १८ अध्याय और उसके ५वे पद में आकाश की उचाई तक पहुंच चुके बेबीलोन के पाप हम देखते हैं, दूसरे पद में हम पढ़ते हैं, “गिर गया बड़ा बेबीलोन गिर गया है: और दुष्टात्माओं का निवास, और हर एक अशुद्ध आत्मा का अड्डा, और एक अशुद्ध और घृणित पक्षी का अड्डा हो गया”। बीज बोने वाले के दृष्टान्त में यीशु ने कहा कि बीज को उठा ले जाने वाली चिडिया दुष्टात्मा का प्रतिनिधित्व करती है। इसी लिये दुष्टात्मा, अशुद्ध आत्मा और चिडिया, सब का एक ही अर्थ है। बेबीलोन इन दुष्ट चीजों से भरपूर है।

विगत वर्षों में दुष्टात्मा निकालने नयी अभिरुचि उत्पन्न हुई है। बहुत से व्यक्ति वास्तव में दुष्टात्मा से छुटकारा पाने में सफल हुए है, लेकिन और लोग वास्तविक समस्या नहीं समझ पाये है। जहां पाप है, वहां दुष्टात्मा आराम से रहती है। दुष्टात्मा के अधीन होना और दुष्टात्मा के प्रभाव में जीना, पाप जैसा नहीं है पर दोनों का पाप से गहरा सम्बन्ध है । अन्य जाति अनुष्ठानों के द्वारा, मन्त्रोच्चारण के द्वारा और जादू भरे शब्दों के द्वारा दुष्टात्माओं से व्यवहार करते है। नैतिक मूल्यों का महत्त्व नहीं है। पाप अर्थहीन है । यह तो दुष्टात्माओं को दुरुपयोग करना या उन्हें खुश करने वाली बात है।

बहुत कुछ जो दुष्टात्मा निकालना या छुटकारा दिलाने वाली सेवकाई जैसा दिखती है वह भी इससे अधिक भिन्न नहीं है। कुछ लोग पादरी को बुलाते हैं और वह प्रार्थना की पुस्तक लेकर आते हैं, कुछ पढ़ते हैं या प्रभु भोज की सेवा करते हैं। दूसरे लोग धर्मशास्त्र में उपलब्ध दुष्टात्माओं को निकालने के लिये उपयोग किया गया शब्द उपयोग करके सफलता की आशा करते हैं। एफिसी ६:१०-१८ में पौलुस आत्मिक युद्ध की बात करते हैं। पहले दो हथियार जो उन्होंने गिनाये हैं वे हैं सत्यता और धार्मिकता। वे विश्वास, परमेश्वर का वचन और प्रार्थना की बात भी करते हैं। वास्तविक छुटकारे की सेवकाई कि नींव धर्मी जीवन, विश्वास और पवित्र आत्मा का काम है। जो लोग दुष्टात्मा से छुटकारा चाहते हैं उन्हें पश्चाताप करके अपने पापों से जितना सम्भव हो सके उतना मन फिराना चाहिए। दुष्ट शक्तियां वही जाती है जहां पाप है और वहां और अधिक पाप उत्पन्न करती है। बाबुल के अन्दर पाप और दुष्टात्माओं दोनों की बहुतायत है।

अभी तक मैं बेबीलोन के धार्मिक पक्ष पर बात कर रहा था। मेरा विश्वास है कि यह इससे भी व्यापक है। मेरा मानना है कि संसार की राज्य व्यवस्था और अर्थ व्यवस्था का भी प्रतिनिधित्व करता है। परमेश्वर से अलग होकर मनुष्य ने जो कुछ किया है, यह सब कुछ है। बेबीलोन के राजा नबुकदनज्जर ने एक विशाल मूर्ति का दर्शन देखा था जो विश्व के सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व करता था। तब उन्होंने एक पत्थर को देखा जिसने इस मूर्ति के पैर पर चोट किया और इसे नष्ट कर दिया। वह पत्थर, दानियेल ने उनसे कहा था, परमेश्वर का राज्य था। यह छोटा पत्थर विशाल पर्वत बनकर सारे विश्व में छा गया। सभी सांसारिक व्यवस्था का नष्ट होना आवश्यक है ताकि हमारे प्रभु यीशु मसीह का राज्य स्थापित हो सके। हल्लेलुयाह! आमीन।

बेबीलोन से वापसी

दानियेल नबी अपने छत की कोठरी में, जिसकी खिड़की यरुशलेम के तरफ खुलती थी, दिन में तीन बार घुटने टेककर प्रार्थना करता और परमेश्वर को धन्यवाद देता था। सिंहों की मांद में डाले जाने का डर भी उसे रोक नहीं पायी। क्या यह आवश्यक था कि सबों को दिखने के लिये उसकी खिड़की खुली रहे? वह एक विशाल साम्राज्य का मन्त्री था और अपना बड़ा प्रभाव अच्छे काम के लिये उपयोग कर सकता था। उसे धर्मशास्त्र का अच्छा ज्ञान था। उसने युसुफ का तरीका क्यों नहीं अपनाया, कि “अपने पिता के घर को भूल जाय’ और ‘अपने कष्ट की भूमि में फलवन्त होकर’ सन्तुष्ट रहे? (उत्पत्ति ४१:५१,५२)। यह व्यक्ति अपना जीवन जोखिम में क्यों डालना चाहता था, जबकि अपने पद पर रहते हुए, जीवित रहकर वह बहुत से अच्छे काम कर सकता था? परमेश्वर ने युसुफ की ही तरह इसे भी परदेश में आश्चर्यजनक रूप से ऊंचे ओहदे पर पहुंचाया था। क्या यह काफी नहीं था? क्या वह बाबुल में परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहा था? क्या वह अपने पद का उपयोग कर दासता में जी रहे अपने लोगों की सहायता करके सन्तुष्ट नहीं हो सकता था? अपने जीवन को जोखिम में डालना क्या बुद्धिमानी थी? ऐसे सारे प्रश्न उसे डिगा नहीं सके। बाबुल में परमेश्वर ने उसे अत्यधिक समृद्ध करने के बावजूद भी उसका हृदय परमेश्वर के नगर यरुशलेम में लगा हुआ था।

इस्राएल के समृद्धि के उत्कर्ष पर, करीब पांच शताब्दी पहले, अपने द्वारा निर्मित मंदिर को समर्पण करने के राजा सुलेमान ने प्रार्थना में अपने हाथ ऊपर उठाये। भविष्यदर्शी के रूप मे उसने इनकी भविष्य की दासता देखी और प्रार्थना किया,“निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है: यदि ये भी तेरे विरुद्ध पाप करें, और तू उन पर कोप कर के उन्हें शत्रुओं के हाथ कर दे, और वे उन को बन्धुआ कर के अपने देश को चाहे वह दूर हो, चाहे निकट ले जाएं, तो यदि वे बन्धुआई के देश में सोच विचार करें, और फिर कर अपने बन्धुआ करने वालों के देश में तुझ से गिड़गिड़ाकर कहें कि हम ने पाप किया, और कुटिलता ओर दुष्टता की है; और यदि वे अपने उन शत्रुओं के देश में जो उन्हें बन्धुआ कर के ले गए हों, अपने सम्पूर्ण मन और सम्पूर्ण प्राण से तेरी ओर फिरें और अपने इस देश की ओर जो तू ने उनके पुरखाओं को दिया था, और इस नगर की ओर जिसे तू ने चुना है, और इस भवन की ओर जिसे मैं ने तेरे नाम का बनाया है, तुझ से प्रार्थना करें, तो तू अपने स्वर्गीय निवासस्थान में से उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनना; और उनका न्याय करना, और जो पाप तेरी प्रजा के लोग तेरे विरुद्ध करेंगे, और जितने अपराध वे तेरे विरुद्ध करेंगे, सब को क्षमा कर के, उनके बन्धुआ करने वालों के मन में ऐसी दया उपजाना कि वे उन पर दया करें। ” (१ राजा ८:४६-५०)।

ये सारी बातें पूरी हुई थी। मन्दिर नष्ट कर दिया गया था, यरुशलेम उजाड़ हो गया था, फिर भी दानियेल उस देश और उस नगर के अवशेष की दिशा में जहां परमेश्वर ने अपना नाम स्थापित किया था, अपना मुख कर प्रार्थना कर सकता था। बाबुल की सम्पत्ति, परमेश्वर द्वारा दी गयी समृद्धि भी उसे सन्तुष्ट नहीं कर सकी, क्योंकि इस्राएल वह देश था जिसे परमेश्वर ने उसके पुरखों को दिया था, और इस्राएल में ही परमेश्वर के सारे उद्देश्य पूर्ण होते थे। इसीलिये दानियेल ने प्रार्थना की, उसके शत्रुओं ने इसकी सूचना दे दी और मृत्यु दण्ड की घोषणा हुई, और उसे सिंह के मांद में फेंक दिया गया। लेकिन राजा और सिंहों ने वह रात उपवास में बितायी और दानियेल प्रार्थना करता रहा।

दानियेल की पुस्तक समय-क्रम से लिखी गयी नहीं लगती। ९ अध्याय में उल्लिखित दानियेल की प्रार्थना और उसे मिला प्रकाश और ६ अध्याय में सिंह के मांद में बितायी रात, दोनों घटनाएं मेदी के राजा दारा के शासन के आरम्भ में घटित हुई थी। इन दोनों अध्यायों को एक साथ पढ़कर हम बहुत कुछ सिख सकते हैं। छठे अध्याय में सिंह के मांद की कथा है। नौवीं अध्याय में दानियेल के हृदय में उस समय क्या चल रहा था, यह दिखाता है। बाबुल का साम्राज्य अभी अभी मेदी (पारसी) लोगों के हाथ में आया था, और दानियेल परमेश्वर की इच्छा ढुढने का प्रयास कर रहा था। कुछ ही समय पहले राज्य के सर्वोच्च तीन मंत्रियों में से एक के पद पर पदोन्नति होने के बावजूद भी (६:३), दानियेल ने धर्मशास्त्र अध्ययन को प्राथमिकता दी थी (९:२)। इसके बाद जब उसने इनका अर्थ जाना, वह उपवास और प्रार्थना करने लगा (९:३)। (दुख की बात है कि वर्तमान राजनीतिज्ञों में ऐसा व्यवहार नहीं पाया जाता)। उसने पाया कि दो बार ये बातें लिखी गयी थी कि ७० वर्षों तक यरुशलेम उजाड़ रहेगा और इसके लोग बंधुआई में जायेंगे (यिर्मया २५:११ और २९:१०)। उसने मूसा और नबियो की पुस्तकों में पढ़ा कि उसके लोग अपने ही पापों के कारण बंधुआई में गये थे। तब उसने उपवास के साथ प्रार्थना की और अपने लोगों के पापों का प्रायश्चित किया। परमेश्वर के इस दास के जीवन में राजनीति का स्थान पांचवां था। वचन अध्ययन, प्रार्थना, उपवास और परमेश्वर के प्रति विश्वास योग्यता, ये सब अधिक महत्त्व पूर्ण थे।

मैं ने अभी तक जो कहा है उनका सारांश बता दूं। सर्व प्रथम दानियेल के मन में गहरा एहसास था कि वह और उसके देशवासी गलत जगह पर थे। बहुत बड़ा बाहरी समृद्धि भी इसके लिये पर्याप्त नहीं था। विदेशी साम्राज्य के सिंहासन पर बैठने की तुलना में यरुशलेम की सड़कों पर झाडू लगाना अच्छा था। दूसरी बात हम देखते हैं कि वह धर्मशास्त्र में यह ढुढ रहा था कि उनकी बंधुआई का कारण क्या था और इस इनसाफ का कब अन्त होने वाला था। तीसरी बात, हम उसे प्रार्थना, उपवास और पापों के लिये पश्चाताप के साथ क्षमा और बन्धक बनाने वालों से छुटकारा पाने के लिये परमेश्वर की ओर फिरते हुए देखते हैं। परमेश्वर हम सब को वही आत्मा और वही विश्वास दें।

प्रस्थान का समय

उसकी प्रार्थनाएं अनसुनी नहीं रहीं। गब्रीएल स्वर्ग दूत उसके पास आकर न सिर्फ उसके देशवासियों के पुनर्स्थापन के विषय में कहा वरन् भविष्य में आने वाले मसीह से सम्बन्धित परमेश्वर की महान योजना के विषय में भी कहा। गब्रीएल का सन्देश दानियेल की आशा और उसके समझ से बाहर था। गब्रीएल के शब्द यही थेः “तेरे लोगों और तेरे पवित्र नगर के लिये सत्तर सप्ताह ठहराए गए हैं कि उनके अन्त तक अपराध का होना बन्द हो, और पापों को अन्त और अधर्म का प्रायश्चित्त किया जाए, और युग युग की धार्मिकता प्रगट होए; और दर्शन की बात पर और भविष्यवाणी पर छाप दी जाए, और परम पवित्र का अभिषेक किया जाए। सो यह जान और समझ ले, कि यरूशलेम के फिर बसाने की आज्ञा के निकलने से ले कर अभिषिक्त प्रधान के समय तक सात सप्ताह बीतेंगे। फिर बासठ सप्ताहों के बीतने पर चौक और खाई समेत वह नगर कष्ट के समय में फिर बसाया जाएगा” (दानियेल ९:२४,२५)।

यह आश्चर्यजनक भविष्यवाणी दो बार पूरी हुई। इनसाफ के ७० वर्ष पूरे होने में सिर्फ ७० सप्ताह या ४९० दिन बाकी थे लेकिन यरुशलेम के पुनर्निर्माण और मसीह के आगमन और पाप मोचन के लिये बलिदान करने तक ४९० वर्ष बाकी थे। (अगम वाणी में एक दिन का अर्थ एक वर्ष होता है)।

गब्रीएल की भविष्यवाणी २ इतिहास के आखिरी पद और पूरी तरह एज्रा की पुस्तक के पहले अध्याय के २-४ पद में राजा कुस्रू के आज्ञा देने से पूरी हुई थी। कुस्रू ने यहूदियों से कहा कि यहूदा देश को लौट जाये और परम प्रभू, इसराइल के परमेश्वर, का भवन निर्माण करे। यहां तक कि कुस्रू ने आज्ञा दी कि अन्य जाति पड़ोसी लोग भी स्वेच्छा से सोने, चांदी, विभिन्न सामान तथा पशु द्वारा सहयोग करें।

बंधुआई के आरम्भ में दानियेल किशोरावस्था में था और ७० वर्षों बाद जब बंधुआई का अन्त हुआ तो वह बृद्ध हो चुका था। बाबुल से यरुशलेम तक की लम्बी यात्रा के लिये वह असमर्थ था। अधिकांश यहूदी बाबुल में ही बड़े हुए थे और यहां की सुरक्षित जीवन छोड़कर एक अनजान देश के लिये खतरों से भरे यात्रा पर जाने को तैयार नहीं थे। बहुसंख्यक यहूदियों के लिये यह बहुत ही महंगा सौदा था। वे परदेश में भी आराम देह अनुभव कर रहे थे। शायद उन्होंने कहा हो, “अपने अव्यावहारिक सिद्धांतों से हमें तंग मत करो। कुस्रू अच्छा राजा है और हम लोग इसी देश में अच्छा और धर्मी जीवन बिता सकते हैँ।“ऐसा सम्भव था, परन्तु परमेश्वर के उद्देश्य यरुशलेम से जुड़े थे, बाबुल से नहीं। यरुशलेम मे मन्दिर का पुनर्निर्माण होना था, और इस्राएल ही वह देश था जहां मसीह का आगमन होना था। बहुतों ने कुस्रू की आज्ञा मानकर अपने पूर्वजों के देश में लौटने का निश्चय किया। एज्रा के दूसरे अध्याय में लौटने वाले परिवार के नाम और सदस्यों की संख्या लिखी है। एक बार फिर वे अपने पूर्वज इब्राहिम के पद चिह्नों पर चल रहे थे, जिन पर कलदियों के ऊर को छोड़कर वह प्रतिज्ञा के देश को जाने के लिये चला था। वही विश्वास उन्हें एक बार फिर उसी राह पर ले चला था।

पुनर्स्थापित वेदी

बधुआई से लौटकर पहला काम उन्होंने यह किया कि परमेश्वर की वेदी निर्माण कर उस पर बलि अर्पण की (एज्रा ३:२)। परमेश्वर के सभी उद्देश्यों के लिये बलिदान अति महत्त्वपूर्ण है। आज तक किये गये सभी बलिदानों में परमेश्वर के पुत्र यीशु का बलिदान सर्वोत्तम है। इसके बिना हमारे पापों की क्षमा के लिये कुछ भी उपलब्ध नहीं है और परमेश्वर के बिना हमारे लिये सिर्फ अन्धकार और मृत्यु रह जाते हैं। इस्राएलियो का मिश्र देश से प्रस्थान भी बलिदान के द्वारा आरम्भ हुआ था जो आज तक फसह के पर्व के रूप में याद किया जाता है। कलवरी में परमेश्वर के मेमने का बलिदान स्वीकार करना हमारे उद्धार के लिये आवश्यक है और आत्मिक जीवन की सच्ची नींव भी यही है।

दूसरी बलि हमारी अपनी बलि है। परमेश्वर की वेदी पर अपना जीवन अर्पण करने के लिये यीशु हमें बुलाते हैं। कुछ लोग युद्ध में अपने देश के लिये अपना जीवन अर्पण करना चाहते हैं। कुछ लोग दूसरों की सेवा में अपना जीवन लगाते हैं। दूसरे कुछ लोग मिशनरी के रूप में विदेश जाते हैं और विश्वास करते हैं कि उन्होंने अपना जीवन परमेश्वर के लिये अर्पण कर दिया है। और लोग अपने को संसार से अलग कर लेते हैं और संन्यासी या संन्यासिनी बन जाते हैं और उनका विश्वास है कि पूरी पवित्रता में जी रहे हैं। कुछ ऐसे काम अच्छे हो सकते हैं और इनमें से कुछ के लिये परमेश्वर हमें आज्ञा दे सकते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी परमेश्वर की वेदी नहीं है। इन सारे कामों को करना पाप स्वभाव को बलि किये बिना भी सम्भव है। परमेश्वर की वेदी ही वह जगह है जहां पाप स्वभाव की मृत्यु होती है। जैसे जैसे मानव निर्मित मीनार की ऊंचाई बढ़ती जाती है, अहं और घमण्ड भी बढ़ते जाते हैं। गर्व पूर्ण बातों की आवाज बढ़ती जाती है। बाबुल में देवी देवताओं की वेदियां बहुत हैं, लेकिन यह वह जगह नहीं है जहां परमेश्वर की वेदी का निर्माण किया जाय।

पुनर्स्थापित पर्व

वेदी का पुनर्निर्माण करने और दैनिक बलिदानों को पुनः स्थापित करने के बाद लौटकर आने वाले लोगों ने झोपड़ी का पर्व मनाया। तीन बड़े पर्वों में यह पर्व आखिरी था जो परमेश्वर ने अपने लोगों के लिये ठहराया था। पहला फसह का पर्व और दूसरा पेन्तीकोस का पर्व था। लेवी के पुस्तक, २३ अध्याय में इनका विस्तृत वर्णन मिलता है। मिश्र से प्रस्थान का आरम्भ फसह के पर्व के साथ हुआ था। परमेश्वर ने अपने लोगों के लिये विभिन्न पर्व निर्धारण किये थे, लेकिन ये पर्व बाबुल या मिश्र में नहीं मनाये जा सकते थे।

यहूदी लोग जैसे ही क्या मसीहियों को भी ये पर्व मनाने चाहिये? या परमेश्वर ने नयी वाचा के अन्तर्गत इन पर्वों के बदले बड़ा दिन और ईस्टर स्थापित किया है? नये नियम में ये पर्व बदले नहीं गये हैं, बल्कि ये पूरे हुए हैं। ये आत्मिक परिपूर्णता देते हैं जिसे हम सबको उपभोग करना चाहिये। सर्वप्रथम वे यीशु की ओर इंगित करते हैं, जैसा सम्पूर्ण धर्मशास्त्र करते हैं। झोपड़ी के पर्व के पहले दिन उनका जन्म हुआ था और फसह के दिन मृत्यु। सारे पर्वों की परिपूर्णता उन्हीं में होती है, ठीक उसी तरह जैसे सारे पुराने नियम का।

ये पर्व हमारे आत्मिक जीवन को दर्शाते हैं। हमारे आत्मिक जीवन का आरम्भ फसह से होना चाहिये जब हम परमेश्वर के मेमने के साथ भोजन करते हैं और उनके लहू के द्वारा शुद्ध किये जाते हैं। हमें परमेश्वर के शुद्ध सत्यता रूपी अखमिरी रोटी खाना सिखना चाहिये। ऊपरी कोठरी में प्रथम चेलों ने जैसा अनुभव किया था, हमें भी अपना व्यक्तिगत पेन्तिकोस अनुभव करना चाहिये। यहां से आगे बढ़कर हमें झोपड़ी का पर्व अनुभव करना चाहिये जिसमें नरसिघों का पर्व और मिलाप का दिन सम्मिलित हैं। ये सारे पर्व उन आत्मिक आशीषों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पिता ने हमारे लिये तैयार किये हैं। इस विषय पर और अधिक जानकारी के किये Festivals of Israel (इस्राएल के पर्व) नामक पुस्तिका पढें।

बड़ा दिन और ईस्टर, दोनों ही अन्य जाति के पर्व है, अन्य जाति के बीच इनका आरम्भ हुआ और अन्य जाति जैसे ही इनको मनाया जाता है। इन पर्वों को ऐसे लोगों द्वारा मण्डली में लाया गया जिन्हें आत्मिक पर्वों का कोई ज्ञान नहीं था। ऐसे मूर्ति पूजक जो सम्राट कन्टेस्टाईन (ई सन् ४००) के समय मण्डली भरने लगे थे, इन्हें खुश रखने के लिये ऐसे पर्व आवश्यक थे। ये सब बाबुल के पर्व है और धर्मशास्त्र या परमेश्वर के राज्य में इनकी कोई जगह नहीं है। जेरोबाम, उतरी इस्राएल का प्रथम राजा, एक ऐसे पर्व को आरम्भ करने का दोषी पाया गया था जिसे उसने अपने मन में पता लगाया था (१ राजा १२:३२,३३)। मण्डली ने अपने नये नये पर्व पता लगाने में जेरोबाम से भी सौ गुणा अधिक परिश्रम किया है। और अधिक जानकारी के लिये Church Festvials (मण्डली के पर्व) नामक पुस्तिका पढ़ें।

पुनर्निर्मित मन्दिर

लौटने वाले लोगों के लिये परमेश्वर के पुनर्निर्माण योजना में वेदी पहली प्राथमिकता में था। मन्दिर भवन दूसरे स्थान पर था। मूसा के समय में भी ऐसा ही था। निर्गमन के तुरत बाद, परमेश्वर ने मूसा को निर्देश दिये थे कि इस्राएलियो के भटकने समय में उनके साथ वास करने के लिये एक तम्बू निर्माण करे। परमेश्वर के लिये एक वास स्थान आवश्यक है। लेकिन अभी वह कहाँ रहना चाहते हैं? पत्थरवाह किये जाने के कुछ ही क्षण पहले स्तिफनुस ने यह घोषणा की थी, “परन्तु परम प्रधान हाथ के बनाए घरों में नहीं रहता, जैसा कि भविष्यद्वक्ता ने कहा” (प्रेरित ७:४८)। यह अविश्वसनीय है कि अपने अनजान अवस्था में बहुसंख्यक आज भी ईंट और पत्थर से निर्मित भवन समर्पण करते है और बड़े आदर के साथ प्रवेश करते हुए इसे 'परमेश्वर का घर' सम्बोधन करते हैं। यदि आप भौतिक संरचना को आदर देते है तो यह आपके मन में परमेश्वर के सच्चे भवन के दर्शन को धुंधला कर देगा। नये नियम मे स्पष्ट लिखा है, “क्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है”।

यदि लोगों को पवित्र आत्मा का अनुभव नहीं है तो वे पेन्तिकोस के दिन उनके आगमन से पहले के समय की नकल करने लगेंगे। यदि उन्हें वास्तविकता पता नहीं है तो छाया से ही चिपक जायेंगे। लेकिन जिन लोगों को पवित्र आत्मा की भरपूरी का अनुभव है, उन्हें तो अच्छा ज्ञान होना चाहिये। परमेश्वर ने रोम की सेना को भेजकर यह अंतिम घोषणा कर दी कि मानव निर्मित भवनों समय समाप्त हो गया है। उन्होंने मन्दिर की एक एक ईंट तहस नहस कर दी। विगत शताब्दियों में मण्डली इन्हें फिर से निर्माण करने का प्रयास करता रहा है।

यरुशलेम में निर्माण कर्ताओं ने काम आरम्भ किया और दूसरे मन्दिर की नींव रखी। परमेश्वर की स्तुति करने के लिये भीड़ जमा हुई। आनन्द के कारण वे जोर से चिल्लाने और रोने लगे। दूर दूर तक शोर सुनाई पडा (एज्रा ३:१०-१३)। यह उडन्ता पुत्र के लौट आने जैसा ही था। बेबीलोन में वर्षों तक नहीं बजने वाले नरसिंघे एकाएक संगीत से गुंज उठे।

विरोध

अफसोस, उनका आनन्द सिर्फ थोड़े समय में खत्म हो गया। उन्हें रोकने के लिये उनके शत्रु जल्द ही आगे आ गये। पहले उन्होंने सहायता करने की पेश कस की।पर यहूदी अगुआ यरुबाबेल और यहोशू ने कहा, “हमारे परमेश्वर का भवन निर्माण करने के इस कार्य में हमारे साथ तुम्हारी कोई साझेदारी नहीं है” (एज्रा ४:३)। उन्होंने स्पष्ट देखा कि सिर्फ परमेश्वर के लोग ही परमेश्वर का मन्दिर निर्माण कर सकते हैं। जो दरवाजे से अन्दर नहीं आते वे सब चोर और डांकू हैं (यूहन्ना १०:१)। अच्छे विचार वाले विदेशियों के लिये परमेश्वर के राज्य में कोई स्थान नहीं है। इसमें सहभागी होने के लिये आपको ऊपर से जन्म लेना और इसका सच्चा नागरिक होना आवश्यक है।

जब उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ तो ये शत्रु अपने असली स्वभाव पर आ गये। वे मजदूरों को तब तक धमकाकर और निराश करते रहे जब तक काम बन्द नहीं हो गया (एज्रा ४)। अगले १६ वर्षों तक कोई काम नहीं हुआ, इस बीच फारस के दो राजा आये और गये। समस्याएं और विरोध परमेश्वर की अप्रसन्नता के प्रमाण नहीं हैं।

स्पष्ट पराजय में वर्ष बीतते रहे, लेकिन परमेश्वर अपना समाधान तैयार कर रहे थे। समय आने पर हाग्गै और जकर्याह नबी खड़े हुए और लोगों के बीच पश्चाताप का प्रचार किया और मन्दिर निर्माण को आगे बढ़ाने के लिये उत्साहित किया। “न तो बल से, और न शक्ति से, परन्तु मेरे आत्मा के द्वारा होगा, मुझ सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (जकर्याह ४:६)। जकर्याह इन प्रसिद्ध शब्दों को उस समय अगुआ जेरुबाबेल से कहा जब वह अधूरे काम का निरीक्षण कर रहा था। यह एक महत्त्वपूर्ण बात थी। यह परमेश्वर के आत्मा का काम था जो उन्होंने अपनी शक्ति में पूरा किया था। “हियाव बान्ध … मेरा आत्मा तुम्हारे बीच में बना है ... इस भवन की पिछली महिमा इसकी पहिली महिमा से बड़ी होगी” हाग्गै ने अगमवाणी की थी (२:४,५,९)। सुलेमान के द्वारा निर्माण की गयी मन्दिर मे परमेश्वर की महिमा उतर आयी थी। क्या उससे कमजोर प्रयास वाला यह काम उससे अधिक महिमीत हो सकता था? राजा सुलेमान के शासन काल में जब इस्राएल देश अपनी शक्ति के उत्कर्ष पर था, उस समय प्रथम मन्दिर का निर्माण हुआ था। यह दूसरा मन्दिर तब बन रहा था जब वे कमजोर थे। महिमा क्या है? यीशु ने प्रार्थना की, “हे पिता, वह समय आ गया है, अपने पुत्र को महिमीत करें” (यूहन्ना १७:१), और इसके बाद उन्हे क्रूस पर चढाने के लिये ले जाया गया। परमेश्वर की बुद्धि और उनके उपाय हमारी तुलना मे महान् है। शरीर की कमजोरी और नश्वरता परमेश्वर के आत्मा की महिमा और शक्ति बन जाते हैं।

पुनर्निर्मित शहर पनाह

अन्त में मन्दिर का निर्माण पूर्ण हुआ और अब हम दशकों बाद नहेम्याह के समय में आयेंगे। वह एक युवा था जो फारस के राज दरबार में ऊंचे पद पर पहुंच गया था। वह राजा का पियाऊ था। वह अपनी समृद्धि से सन्तुष्ट था कि तभी उसके देश से एक भाई आकर वहा की स्थिति बतायी। “जो बचे हुए लोग बन्धुआई से छूटकर उस प्रान्त में रहते हैं, वे बड़ी दुर्दशा में पड़े हैं, और उनकी निन्दा होती है; क्योंकि यरूशलेम की शहरपनाह टूटी हुई, और उसके फाटक जले हुए हैं” (नहेम्याह १:३)। उसका मन जाग उठा और दानियेल सदृश इसने भी सोचा। वह कहता है, “ये बातें सुनते ही मैं बैठकर रोने लगा और कितने दिन तक विलाप करता; और स्वर्ग के परमेश्वर के सम्मुख उपवास करता और यह कह कर प्रार्थना करता रहा” (१:४)। दानियेल के समान इसने भी अपने पाप और लोगों के पाप स्वीकार किए (१:६,७)। दानियेल की तरह इसने भी धर्मशास्त्र में ढूंढ़ा और बंधुआई और इससे छुटकारे से सम्बन्धित भविष्यवाणियां पायी। इसने भी अपना जीवन जोखिम में डाला जब वह राजा अर्तक्षत्र के आगे खड़ा था (२:१,२)। एक बार फिर परमेश्वर ने इसकी प्रार्थना सुनी और राजा ने इस बात की आज्ञा दे दी जिसके विषय में गब्रिएल स्वर्ग दूत ने दानियेल से कहा था। नहेम्याह को यरुशलेम जाकर इसके शहर पनाह का पुनर्निर्माण करने की स्वीकृति मिल गयी थी।

मेरे पास इन बातों को बताने के लिये स्थान नहीं है कि कैसे नहेम्याह ने अपने मजदूरों के साथ उस विषम परिस्थिति का सामना किया जब वे एक हाथ में काम के औजार और दूसरे हाथ में तलवार लेकर काम करते थे। परमेश्वर का यह महान् निर्माण कार्य तब तक बन्द नहीं हो सकता था जब तक यरुशलेम में वेदी, मन्दिर और शहर पनाह पूर्ण नहीं हो जाते।

ये सब कुछ उनके लिये आज भी वैसी ही है जिनके पास आत्मा में देखने के लिये आंखें और सुनने के लिये कान हैं।

सारांश

इस प्रकार हम बाबेल और बेबीलोन के अपने अध्ययन के अन्त में आ चुके है। धर्मशास्त्र में हमने स्पष्ट रूप से दो मार्गों का चित्रण देखा है। एक स्वाभाविक मनुष्य का मार्ग है, दूसरा परमेश्वर का मार्ग है। एक मार्ग पर हम दृष्टि के आधार पर चल सकते है, दूसरे पर विश्वास के आधार पर। पहला मार्ग चौडा है, जिसपर बहुत लोग चलते है, दूसरा मार्ग सकरा है जो जीवन को जाता है।

मूसा के अन्तिम शब्दों के साथ जो उसने प्रतिज्ञा के देश को देख रहे इस्राएलियो से कही थी, मैं अपनी बात पूरी करना चाहता हूं, “मैं आज आकाश और पृय्वी दोनोंको तुम्हारे साम्हने इस बात की साझी बनाता हूं, कि मैं ने जीवन और मरण, आशीष और शाप को तुम्हारे आगे रखा है; इसलिथे तू जीवन ही को अपना ले, कि तू और तेरा वंश दोनोंजीवित रहें; इसलिथे अपके परमेश्वर यहोवा से प्रेम करो, और उसकी बात मानों, और उस से लिपके रहो; क्योंकि तेरा जीवन और दीर्घ जीवन यही है, और ऐसा करने से जिस देश को यहोवा ने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब, तेरे पूर्वजोंको देने की शपय खाई यी उस देश में तू बसा रहेगा।” (व्यवस्था ३०:१९,२०)।

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