यूहन्ना के सुसमाचार के चौथे अध्याय में सामरी स्त्री का परिचित कथा है। हमारे पहले देखने में धर्मशास्त्र के अन्य भागों के जैसा बहुत तथ्य इस कथा में भी मिलता है। इसके सतह के नीचे रहे हुये आत्मिक सत्यता और प्रकाश के खदान से खोदकर निकालने बाँकी है। सत्यता के बहुमूल्य रत्नों इसके भीतर छिपा हुआ है। जिसको हम लोग सयौं बार पढ़ने से भी छपा हुआ शब्द से बढ़कर और कुछ नहीं देख सकते है। इसमें मैंने धर्मशास्त्र के इस खण्ड के भीतर में छिपकर बैठे हुये उन रत्नों को पाने की आशा रखता हूँ।
हम यूहन्ना ४ अध्याय के पहले तीन पदों के द्वारा शुरुवात करें। “जब बपतिस्मा देने यूहन्ना से ज्यादा यीशु मसीह ने बहुत से चेला बना रहे थे और उनको बपतिस्मा दे रहे थे इस बात को फरीसियों ने सुना प्रभु ने पता पाया (फिर भी यीशु मसीह अपने आप नहीं परन्तु वहाँ के चेलों ने बपतिस्मा देते थे) तब वे यहूदिया छोड़कर फिर गालील की तरफ चला गया।”
फरीसी लोग यीशु मसीह ने बपतिस्मा देने मनुष्यों की संख्या में ज्यादा ख्याल रखते थे, क्योंकि संख्या उन लोगों के लिये महत्वपूर्ण था। सांसारिक लोग सेवकाई को बाहरी रूप से प्रभाव पड़ने वाली बातों में ख्याल रखते है। और वे तथ्याँक में प्रसन्न होते है, जैसे कितने मनुष्यों ने प्रभु को ग्रहण किया?, कितने लोग मण्डली में आये?, लोगों को प्रभावित करने वाली चंगाई का गवाही बनने के लिये देख सकने वाला कुछ प्रमाण है तो?, कितना प्रतिष्ठित स्थानीय मनुष्य लोग ने मण्डली की तरफ ख्याल किया?, कितने लोगों ने बपतिस्मा लिया? इत्यादि।
१ इतिहास २१:१ में हम पढ़ते है कि शैतान ने इस्राएलीयों के बिरुद्ध में उठकर दाऊद को अपने प्रजा की संख्या लेने के लिये सुनाया और दाऊद उसके परीक्षा में पड़ गया जब कि इस्राएलियों को परमेश्वर में विश्वास नहीं करने वाला योआब नाम के सेनाध्यक्ष ने ऐसा करना उचित नहीं चाहता था। दाऊद अपने सैन्य दल के शक्ति में सुरक्षित होने के लिये कितना जवान लोग जमा कर सकते हैं यह जानना चाहता था। उस समय वह अपने मित्र जोनाथन के बातों को भूल गया। उसने ऐसा कहा था, “संख्या ज्यादा हो या कम हो वह प्रभु के काम करने से रोक नहीं सकता।” तब वे लोग अपने साथ हथियार ढोने वालो को साथ में लेकर पलिश्तियों को पराजित करने के लिये निकले (१ शमूएल १४:६)। दाऊद अकेले ने पलिश्ति बीर गोल्यत को मारे हुये अनुभव को भूल गया था। परिणाम स्वरूप परमेश्वर का इन्साफ इस्राएल के ऊपर आने लगा और दाऊद ने अपने पापों को स्वीकार करते हुये ऐसा कहा, “मैंने यह काम करके बहुत बड़ा पाप किया हूँ।”
फरीसियों यीशु मसीह और बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा हुये मनुष्यों की तुलना संख्या में कर रहे थे। उस अवस्था के प्रति यीशु मसीह की प्रतिक्रिया कैसा था? जबाब सरल होने से भी फिर भी आश्चर्य चकित रूप से था - वहाँ उस जगह से निकल कर दूसरे जगह पर चले गये। बहुत से आधुनिक प्रचारक लोग ऐसा नहीं करते हैं। क्यों वे लोग शहर में हो रहे सफल सेवकाई त्यागकर नयी जगह में प्रतिस्पर्धा करना चाहते है तो? हो सकता है, यीशु मसीह और उनके चेलों ने बपतिस्मा देना तुरुन्त बन्द किया होगा, परन्तु सुसमाचार के पुस्तक में उसके बाद ऐसा करने का कोई बिवरण नहीं मिलता है।
२ पद में हम पढ़ते है कि “अपने आप तो नहीं परन्तु वहाँ के चेलों ने बपतिस्मा देते थे।” पौलुस ने भी यह उदाहरण को पीछा किया था (१ कुरिन्थियों १:१४-१७)। न वे लोग, न यीशु अपने आप को उचालना चाहते थे, ना ही उचालने की आवश्यक ही थी। वे लोग प्रमुख स्थान दूसरे लोग पाने में प्रसन्न थे। प्रशंसा करने वाली भीड़ के सामने अपने आप को प्रदर्शन करने से बढ़कर अपने सेवकाई को परिणामों को गुप्त मे रखना अत्याधिक असल होता है।
यीशु यहूदिया में हो रहे आत्मिक जागृति और वहाँ पर हो रहे बड़ी भीड़ को छोड़कर सामरिया के रास्ते से होकर गालील के तरफ चले गये। वहाँ की अवस्था अच्छा नहीं दिखायी दे रही थी। उनके चेला लोग शहर के तरफ भोजन खरीदने जाते समय वे थकित हुये थे और याकूब के कूआँ के जगत पर बैठे हुये थे। एक सामरी स्त्री पानी भरने के लिये वहाँ पर आयी। सामरी लोग निम्न-स्तर (छोटी जाति) के मनुष्य थे, उन लोगों का पिता पुर्खा यहूदी होने से भी अपने यहाँ ठहरने आने वाले अन्यजाति के साथ विवाह किया था। इसी कारण यहूदी लोग उन लोगों को तिरस्कार करने और सभी सम्बन्धो के द्वारा छुटने का कोशिश किया।
यीशु मसीह ने उसको ‘पानी पीने के लिये दो’ कहने समय वे दो यहूदी परम्पराओं को भंग कर रहे थे, पहला - वे अपरिचित स्त्री के साथ अनजान जगह पर बातचीत करना और दूसरा - पराई स्त्री के हाथ से पानी पीने के लिए माँगना। इस विषय में सन्त पौलुस गलातियों के पुस्तक में ऐसा लिखता है: “अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी, न कोई दास, न स्वतन्त्र, न कोई नर, न नारी, कयोंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो” (गलातियों ३:२८)। यह दोनों भेदभाव पुराने करार में ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते थे और आज भी भारत में कहीं-कहीं ऐसा खराब चलन है। यीशु मसीह वह अन्य जातियों के स्त्री के साथ आत्मिक विषयों में बातचीत करते हुये वे दोनो भेदभावों के प्रति असहमत हुये।
उस वक्त हुये आश्चर्यपूर्ण बातचीत इस प्रकार का है।
उस सामरी स्त्री ने यीशु से कहा, "तू यहूदी होकर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों माँगता है?" (क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते थे)। यीशु ने उत्तर दिया, "यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जनती कि वह कौन है जो तुझसे कहता है, 'मुझे पानी पिला' तो तू उससे माँगती, और वह तूझे जीवन का जल देता।" स्त्री ने उससे कहा, "हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं और कूआँ गहरा है, तो फिर जीवन का जल तेरे पास कहाँ से आया? और क्या तू हमारे पिता, याकूब से बड़ा है?" उस समय वह यीशु मसीह के कह रहे बातों को समझने में असमर्थ थी। वे 'आत्मिक जीवन के पानी' के बारे में बातें कर रहा था परन्तु वह स्त्री 'स्वाभाविक पानी' के बारे में मात्र विचार कर रही थी।
सम्भवत: धर्मशास्त्र के अन्य भागों से यूहन्ना का सुसमाचार पढ़ने से हम स्वाभाविक विचार से इसको कभी भी समझ नहीं सकते। "क्योंकि यहोवा कहता है मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है। न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में आकाश और पृथ्वी का अन्तर है" (यशैया ५५:८,९)। यूहन्ना ३ अध्याय के अन्त में उससे मिलता जुलता शब्द दिखायी देता है और लगातार हम लोग विचार कर रहे अनुच्छेद के तरफ बढ़ते है: "ऊपर से आने वाला सबसे ऊपर का है। पृथ्वी से आने वाला पृथ्वी का है, और पृथ्वी का ही बात बोलता है। स्वर्ग से आने वाला सबसे ऊपर का है उनका गवाही कोई ग्रहण नहीं करता है। क्योंकि जिसको परमेश्वर ने भेजा वह परमेश्वर का वचन बोलता है" (यूहन्ना ३:३१-३४)।
यीशु मसीह ऊपर के थे, उनका विचार और वचन परमेश्वर का विचार और वचन परमेश्वर का था। जब हमारा विचार उनके आत्मा के द्वारा नवीकरण किया हुआ और परिवर्तन किया हुआ हम लोगों वहाँ के कहने और करने वाली बातों को समझ सकते हैं। वे क्या कह रहे थे वे लोग समझ नहीं सके। यदि हमारा विचार नया नहीं करता है तो हमारे लिये लिखा हुआ उपयूक्त नहीं, लिखा हुआ सुसमाचार का शब्द भी ऐसा ही होगा।
पुराना नियम का मध्यस्थकर्ता मूसा हुये जैसा नया नियम का मध्यस्थकर्ता यीशु थे। नया नियम स्वर्गीय और आत्मिक नियम है। पुराना नियम ने मुख्यत: सांसारिक और स्वाभाविक प्रचलन को अंकमाल किया था। पुरानी बात स्वाभाविक मनुष्य के समझने की तरह था परन्तु नया जो आत्मिक समझ हुये मनुष्य के द्वारा मात्र से समझ सकते है। पुराना स्वाभाविक स्पष्टता का स्थान नया आत्मिक स्पष्टता ने लिया है। स्वाभाविक जन्म द्वारा अब्राहाम का सन्तान होने से बढ़कर आत्मा में नया जन्म पाने वाले ही सच्चा यहूदी लोग है।
यीशु ने उसको उत्तर दिया, "जो कोई यह जल पीएगा, वह फिर प्यासा होगा। परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्त काल तक प्यासा न होगा, वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उसमें एक सोता बन जायेगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।"
हमें यीशु मसीह और उस सामरी स्त्री के शब्दो के बीच कितना ज्यादा अन्तर मिलता है? वह दूर से चलकर थकित अवस्था में पानी निकालने वाले बर्तन लेकर आने वालों के लिये मात्र प्राप्त होने वाले गहरे कूओं को पुराने नियम के दुर्लभ पानी के बारे में बताती है। परन्तु वहाँ पर हर हमेशा रहने वाले नया और अनन्त तक निरन्तर स्थिर रहने मूल आत्मिक श्रोत के विषय में यीशु बोल रहे थे। मध्यान्ह के प्रचण्ड गर्मी में दूर तक चलकर एक दिन मात्र पानी लेने जाना हमको कितना समय और परिश्रम लगता है?
१५ पद में सामरी स्त्री ने उससे कहा, "हे प्रभु, वह जल मुझे दे ताकी मैं प्यासी न होऊँ और न जल भरने को इतनी दूर न आऊँ।" अब भी उसने यीशु मसीह के बातों को समझ नहीं सकी। सम्भवत: वह उसका सीधा जवाव था। यीशु मसीह ने प्रसंग बदलकर कहा, "जा अपने पति को यहाँ बुला ला।" स्त्री ने उत्तर दिया, "मैं बिना पति की हूँ।" यीशु ने उससे कहा, "तू ठीक कहती है, मैं बिना पति की हूं क्योंकि तू पाँच पति कर चुकी है, और जिसके पास तू अब है वह भी तेरा पति नहीं, यह भी तूने सच ही कहा है।"
स्त्री ने उस बात को समझ सकी क्योंकि वचन के द्वारा उनका अनैतिक जीवन को प्रकट किया था और यह सब यीशु परमेश्वर के शक्ति का प्रदर्शन था। यीशु मसीह को वह न पहचानते हुये भी वे उनको पहचान चुकी जैसा वह पता पाया। वह साधारण मनुष्य जैसा नहीं परन्तु वह परमेश्वर से बातचीत कर रही थी और परमेश्वर उसके साथ बोल रहा था। उसका विवेक तुरुन्त ही चेतनशील हो गया और धर्म के विषय में बाते करने लगी।
स्त्री ने उससे कहा, "हे प्रभु लगता है कि तू भविष्यवक्ता है। हमारे बाप दादों ने इसी पहाड़ (गेराजिम) पर आराधना की, और तूम (यहूदियों) कहते हो कि वह जगह जहाँ आराधना करनी चाहिए यरूशलेम में है।" ऐसी बात हम लोग कितनी बार सुना है? आप जिस मण्डली में जाते है या संगति में जाते है ऐसी बातों में लम्बी लम्बी बातचीत होती होंगी। उन दिनो में भी यह कोई नयी बात नहीं मानते होंगे। बहुत समय पहले यहोशू ने इस्राएल के लिये आशीष का कामना किया। इस गेराजिम पहाड़ में सामरी लोग शताब्दियों से पहले पूजा करते आ रहे थे। दाऊद ने राजधानी बनायी हुयी जगह में सुलैमान ने मंदिर बनाये हुये दिन से लेकर यहूदी लोग यरूशलेम में परमेश्वर को पुजते आ रहे है। यह दोनों स्थान के मध्य में यीशु मसीह ने किसको ठीक कहा अथवा उनके विचार में कौन सा जगह पवित्र था?
आज भी ठीक वही अवस्था है। आप क्याथोलिक हैं अथवा प्रोटेस्टेन्ट? आप परम्परागत सम्प्रदाय में जाते है कि घरेलु संगति में? आप कहाँ आराधना करने जाते है? सो हमको जानना बहुत जरुरी है। आप हमारे झुण्ड के है कि दूसरे के झुण्ड के? आप के साथ हमारी संगति सुरक्षित हो सकती है कि नहीं? इत्यादि प्रश्न इसाई लोग के बीच में है।
यीशु ने उससे कहा, "हे नारी, मेरी बात का विश्वास कर कि वह समय आता है कि तुम न तो गेराजिम पहाड़ पर पिता की आराधना करोगे, न यरूशलेम में पिता को पुजोगे।" परमेश्वर के साथ गेराजिम और यरूशलेम से बढ़कर इससे भी ऊँची बात है। बिगत के समय में यह दोनों स्थानों परमेश्वर द्वारा आशिषित हुये है परन्तु यह दोनों स्थान बितकर चले जाना था क्योंकि वह बात पुराने नियम का एक भाग मात्र था।
यीशु मसीह ने यहाँ एक मूलभूत बातें कहा। क्योंकि शताब्दियों से लेकर यरूशलेम यहूदी धर्म, राष्ट्रीय चाहना और मसीह के आशा का केन्द्र था और आज तक यथावत ही है। उक्त बात परमेश्वर के आज्ञा के कारण हुआ था। वह जगह परमेश्वर ने अपना नाम रखने के लिये चुना हुआ था वह जगह और यहूदी धर्मावलम्बीयों का तीर्थ स्थान था। जैसे हिन्दू धर्म वाले लोग तीर्थधाम के लिये मुक्तिनाथ, बनारस (काशी) और चार धाम जाते है और मुसलमान लोग मक्का-मदीना जाते है और बुद्धिस लोग लुम्बिनी जाते है। इसी प्रकार प्रत्येक धार्मिक यहूदी जो जा सकते थे परमेश्वर का महान पर्व मनाने के लिये वर्ष में तीन वार यरूशलेम जाते थे। वह मानवीय परम्परा मात्र नहीं था परन्तु पुराने नियम में परमेश्वर ने दिया हुआ आज्ञा भी था। यीशु मसीह अन्तिम आज्ञा घोषणा करते हुये शताब्दीयों से चल रहे परम्पराओं को मिटा रहे थे। यहूदी धर्मशास्त्र (पुराने नियम बाइबल) ने कहता है, "ऐ यरूशलेम यदि मैंने तुझे भुला दिया मेरा दाहिना हाथ से तेरी धूर्तता को कभी नहीं भूलूंगा।"
क्या यीशु मसीह को धर्मशास्त्र का ज्ञान नहीं था? निश्चय ही वहाँ को यह जानकारी था और वहाँ उसको आत्मिक अर्थ को प्रकट किया। वहाँ ऊपर के थे और परमेश्वर का वचन बोलते थे और उनको पता था कि वह देखने वाला यरूशलेम वास्तविक स्वर्गीय यरूशलेम को सांसारिक प्रतिविम्ब से बढ़कर कुछ नहीं था।
क्या यीशु मसीह ने सामरिया और यरूशलेम दोनों समान होने के लिये खोज रहे थे तो? अवश्य नहीं उन्हों ने खुलस्त रूप में कहा, "तुम लोग जो नहीं जानते वह पुज रहे हो, हम जो जान रहे हैं सो पुज रहे हैं, क्योंकि मुक्ति तो यहूदियों में से है" (यूहन्ना ४:२२)। उसी प्रकार आज कल का मनुष्य लोग सोचे हुये जैसा सब सम्प्रदाय समान है हम कह नहीं सकते। मनुष्य लोग ने धर्मशास्त्र में सच्चाई की खोज किया, और पवित्र आत्मा के अगुवाई में प्रोटेस्टेन्टवाद का जन्म हुआ था। उसी प्रकार पतन हुये का मण्डली के द्वारा परमेश्वर के अगुवाई में मेथोडिस्टवाद का सुरुवात हो गया। सत्य और अनुभवी लोगों के आश्चर्यजनक पुनस् र्थापना के लिये असल विश्वासी लोग एल-शद्दाई और पेन्टिकोस्टल अभियान जो प्राचीन काल का समय से ही समूल लोप हुये थे।
फिर भी यीशु नया नियम के प्रतीक्षा में थे। "परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिस में सच्चे भक्त पिता की आराधना आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही आराधकों को ढूँढ़ता है। परमेश्वर आत्मा है, और आवश्यक है कि उसकी आराधना करने वाले आत्मा और सच्चई से आराधना करें" (यूहन्ना ४:२३,२४)। क्या यह नियम आ पहुँचा है तो? यीशु मसीह ने कहा, "परन्तु समय आ रहा है और अभी ही है, ..." सच में कहा जाये तो नहीं आया है। परन्तु पुराने नियम में सन्तों जैसा विश्वास द्वारा जीने वाले अपने समय से पहले आगे बढ़ सकते है। बहु संख्यकों के लिये यह नियम भविष्य ही था परन्तु इस नया क्षेत्र के अन्दर प्रवेश करने वालों के लिये सुन्दर वर्तमान है। इस कारण अब मैं विश्वास करता हूँ, कि नया नियम आ रहा है और वह अभी भी है।
'आत्मा में' यीशु मसीह इसका क्या अर्थ लगाता है?
आत्मा का विरोधाभास शरीर के साथ है। पुराने नियम शारीरिक करार था। वह स्वाभाविक आँख से प्रत्येक चीज को देख सकने और स्वाभाविक विचार से समझ सकने स्वाभाविक नियम था। यहूदी लोग दूसरों के द्वारा स्पष्ट रूप से छुटाने सकने वाला स्वाभाविक मनुष्य लोग थे। यहूदी परिवार ने स्वाभाविक जन्म के द्वारा पुराने नियम का अधिकार को स्वत: प्राप्त करते थे। नया नियम आत्मिक नियम है। आत्मिक जन्म के द्वारा इस में प्रवेश मिलता है। "आप पानी और आत्मा से जन्म नहीं लिये तब तक आप स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते है।" आत्मिक जन्म स्वाभाविक आँख से नहीं देख सकते है। यह हवा जैसा ही है क्योंकि "हवा जिधर चाहती है उधर चलती है और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती है और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है" (यूहन्ना ३:८)।
पुराने नियम के पुजाहारीयों ने अपने पुर्खो के द्वारा पाये हुये स्वभाविक वंशावली अनुसार ही सेवा संचालन करते थे। वे लोग कौन है सभी को पता होता था। नया नियम का पुजाहारीयों लोग मनुष्यों के द्वारा नहीं परन्तु परमेश्वर के द्वारा अभिषेक पाया हुआ आत्मिक पुजाहारी लोग है। उन लोगों को विशेष पहनावे वा उपाधि द्वारा परिचय देना नहीं पड़ता था परन्तु आत्मिक मनुष्य ने आत्मा में मात्र जान सकते है और पहचान सकते है।
पुराने नियम का मन्दिर प्राकृतिक पत्थरों के द्वारा निर्मित स्वाभाविक भवन था। नया करार का मन्दिर स्वाभाविक सामाग्रीयों के द्वारा नहीं परन्तु परमेश्वर ने दिया हुआ अचम्भ का आत्मिक एकता के द्वारा एक आपस में मिलकर आत्मिक जीवित पत्थरों के द्वारा निर्माण किया गया है।
पुराने नियम के विशेष दिनों में मनाने वाला स्वाभाविक पर्वो जिस में सब लोग आसानी से हर साल सहभागी होते थे। परमेश्वर ने आत्मा के द्वारा अर्थ खोल देते हुये हम पर्वो का अर्थ पता पाने और आनन्द मनाने सकने आत्मिक वरदान ही नया पर्व ही है।
नया नियम का यह कोई भी महान आत्मिक वास्तविकताओं स्वाभाविक और साधारण मन से ठीक ढंग से पहचान नहीं सकते। "स्वाभाविक मनुष्य ने परमेश्वर के आत्मा की बातों को ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह आत्मिक रीति से जाँच किया हुआ होता है" (कुरिन्थियों २:१४)।
'सत्यता में' यीशु मसीह ने इसका क्या अर्थ लगाते है?
सत्यता के लिये प्रयोग किया हुआ ग्रीक शब्द 'अलेथेया' में भी वास्तविकता को सार्थकता छिपा हुआ है। पुराने नियम के बलिदानों और धार्मिक बिधियों आने वाली बात का छाया मात्र था (इब्रानियों ८:५ और १०:१ पढ़िये)। नया नियम वास्तविक बात है। कोई छाया मौलिकता की अच्छी नकल मात्र है परन्तु मूलतत्व नहीं है। एक चित्र को ही देखिए, यह अपने आप में कोई मूल्य नहीं हो सकता परन्तु यह भी कोई बात को दिखा रहा होता है। घर से दूर रहते समय कुछ नहीं होने से परिवार के एक फोटो होने से एक प्रकार से ठीक है परन्तु पूर्ण रूप से सन्तुष्टि नहीं दे सकता है, क्योंकि वह जीवन रहित का यादगार मात्र है। अपरिचित व्यक्ति का एक फोटो आप को बाहरी पहचान दे सकता परन्तु प्रत्यक्ष मूलाकात नहीं किये जाने तक आप उस व्यक्ति का वास्तविकता पता नहीं कर सकते हैं। उसी प्रकार पुराने नियम आत्मिक वास्तविकता को उत्कृष्ट नमूना रूपी चित्र और फोटो मात्र था परन्तु अपने आप में कोई मूल्य का नहीं था "क्योंकि बैलों और बकरों का लहू पापों को दूर करे यह पाप हरण करना असम्भव हैं" (इब्रानियों १०:४)। परमेश्वर का निष्कलंक सच्चा मेमना यीशु मसीह का लहू ही वास्तविक यथार्थ है।
आँख से देखने और कान से सुनने और हाथ से छू नहीं सकने वाली बातों को कोई भी व्यक्ति को स्वाभाविक मन के लिये वास्तविक और मौलिक बातें है। आत्मिक क्षेत्र छायादार और अनिश्चित है। परमेश्वर के लिये यह ज्यादा विपरीत है क्योंकि परमेश्वर अपने आप आत्मा है। आत्मा की बातें ठोस, चिरस्थायी और वास्तविक होता है। सम्पूर्ण भौतिक क्षेत्र परिवर्तनशील और अस्थायी होता है। और इसके उद्देश्य के अनुरूप काम पूरा हो जाने के बाद वह समाप्त हो जायेगा। सत्यता और वास्तविक बातें पुराने नियम को बलिदान और औपचारिकता में भर नहीं पड़ता परन्तु इसाई जगत के कुछ मात्रा में उक्त बातें विद्यमान हो सकती है परन्तु आत्मिक क्षेत्र में वह दूर ही रहता है।
हम लोग यूहन्ना का सुसमाचार पूरा ही अध्ययन करके सत्य और सत्यता का वचनों का रहस्य और भी ज्यादा सिख सकते हैं। "क्योंकि मेरा शरीर वास्तव में खाने की वस्तु है, और मेरा लहू वास्तव में पीने की वस्तु है" (यूहन्ना ७:५५)। "तुम सत्य जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतन्त्र करेगा" (यूहन्ना ८:३२)। "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ" (यूहन्ना १४:६)। "सच्ची दाखलता मैं हूँ और मेरा पिता किसान हैं" (यूहन्ना १५:१)। पिलातुस ने यीशु से कहा, "तो क्या तू राजा है?" यीशु ने उत्तर दिया, "तू कहता है कि मैं राजा हूँ।" "मैंने इसलिये जन्म लिया और इसलिये संसार में आया हूँ कि सत्य की गवाही दूँ जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है?" (यूहन्ना ८:३७)। और पिलातुस ने प्रश्न करते हुये कहा, "सत्य क्या है?"
यूहन्ना ४:२५ में सामरी स्त्री ने भविष्य के तरफ लक्षित होते हुये ऐसे कहा, "मैं जानती हूँ कि मसीह जो ख्रीष्ट कहलाता है, आने वाला है, जब वह आयेगा, तो हमें सब बातें बता देगा" और मनुष्य लोग जैसा वे भी भविष्य के प्रति आशावादी होकर अतीत की बातों में ही अथवा याकूब का कूआँ प्रति अभिरूची रखते है।
कुछ हद तक अतीत और भविष्य दोनों को एक समान रूप से देखना उचित होता है। परमेश्वर ने योजना किया हुआ कुछ कामों को हम लोग जानते और वे बिगड़ते होने को निर्माण करते और विरोध में वे निर्माण करते रहते होने के कारण आसानी से बिगड़ने की कोशिश नहीं करने वाले होते। "दर्शन बिना का मनुष्य नष्ट होते है।" वर्तमान परमेश्वर के साथ असल मार्ग में चलना है तो हम लोगों को भविष्य के लिये परमेश्वर के द्वारा पाया हुआ आन्तरिम अगमवाणी का आवश्यक्ता पड़ता है। और यह हम लोगों को भविष्य के बारे में सिखाने वालों बातों मे प्रश्न ही न करके भर पड़ने जैसी बात नहीं है। आज कल का मनुष्य लोग जैसा उस स्त्री ने भी मसीह आने वाली बातों को दृढ़ विश्वास किया परन्तु वह उनका जीवन परिवर्तन करने या वहाँ उनके आगे खड़े होते उनको पहचानने का सहयोग करने विश्वास नहीं था। उनके समय में और थोड़े ही मनुष्य लोग मसीह आने वाला है विश्वास करते थे, वे आते समय कुछ लोग उस मध्य में से कुछ लोगों का क्रूस में लटकाया गया। आज भी वही अवस्था है तो आज भी इस बात में कुछ शंका लगता है।
"तुम्हारे साथ बोलने वाला मैं वही हूँ" वाली बात यीशु मसीह का यह तीखी शब्द से उस स्त्री को भविष्य की बातों को वर्तमान में लाया। यीशु मसीह 'मैं हूँ' कहता है। 'मैं होंगे' भी नहीं, 'मैं था' भी नहीं परन्तु 'मैं हूँ' वाली बात ही है। उनके लिये जो प्रकाश का समय अभी अथवा वर्तमान था।
यीशु मसीह ने स्वयं अपना ही प्रकाश दिया था। और प्रतिक्रिया को देखने से उसने सहर्ष स्वीकार किया कह सकते हैं। उसने अपने प्रयोग करने के लिये चला रही पुरानी गगरी को वहीं पर छोड़ दिया और शहर में वापस जाकर अपने को तुरुन्त ही पाये हुये मसीह को और दूसरों को भेंट कराने के लिये लेकर आयी। यीशु मसीह ने भीड़ को छोड़कर एक पापी और दलित स्त्री को अपना अमूल्य समय देने के लिये तैयार हो गये। परिणाम केवल उसने न होकर भी और दूसरे लोग ने ज्यादा भी उनको स्वीकार कर सके।
इस प्रकार उस स्त्री ने वर्तमान प्रकाश के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिये मिला। परमेश्वर को पहचानेगें वाली बात कोई पुरुष या स्त्री के लिये यह एक प्रकार का जाँच है। क्या वे आज भी परमेश्वर है? क्या वे आज कल की भाषा बोल सकते है? क्या वे आज की समस्या और आवश्यक्ता पूरा कर सकते है? कुछ मनुष्य लोग बिते हुये कल के लड़ाई लड़ने के प्रयास में अपना सारा जीवन व्यतित करते है। वे लोग पहले के युग का इसाई जीवन का दिन वापस लाना चाहते है। परमेश्वर मरने वाला का परमेश्वर नहीं परन्तु जीवित लोगों का परमेश्वर है, भूत और भविष्य का नहीं परन्तु वर्तमान का भी वे परमेश्वर है।
अपने पुस्ता को जीवन पर्यन्त सेवा करते हुये सदा के लिये सुते हुये दाऊद जैसा प्रत्येक सन्तो के प्रति हम परमेश्वर में धन्यवाद चढ़ाते हैं। हमारे पुस्ता का सेवा करने का समय यही है परन्तु उन लोगों के पुस्ता का नहीं है। यीशु मसीह ने उस स्त्री के साथ कहा था, "तुम्हारे साथ बोलने वाला मैं वहीं हूँ।" यदि यह वचन हम लोग अपने लिये सुने तो हम भी यह काम अवश्य कर सकते है।
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