हमारे साथ हुए बाइबल दो भागों में विभाजन किया हुआ है, इसे पूराने करार और नया करार से नाम दिया गया है। ये दोनों नामें यहोवा ने यिर्मयाह नवी के साथ बात करने के बाद आये हुए सत्य तथ्य साफ है। यहोवा कहते हें, “मैं इस्राएल की घराने और याकूब के घराने के साथ नया करार बांधता हूं।” हिन्दी बाइबल में नियम एवं करार एक ही मुख्य शब्द से अलग रूप में अनुवाद होकर आया हुआ है।
मेरे विचार में प्राय: इसाईयों पूराने करार के मुताबिक ही जी रहे हैं। निश्चय ही वे लोग नया करार पढते हैं और उन लोगों का शिक्षा इसके विषय सूची में आधारित होता है, किन्तु उन लोगों का जीवन और अनुभव का बहुत सारी पक्षों नया करार से ज्यादा पूराना करार अनुसार होता है। दोनों करार बीच की अलग बातों का सही ज्ञान होना वास्तविक रूप में आत्मिक वृद्धिको जिवन्त कराना है।
मैं विश्वस्त हूं कि बाइबल के तत्कालिन समय में वो बात सत्य थी। उन दिनों में कोई कोई विश्वासीओं यीशु मसीह ने अपने लहू से शुरु किया हुआ नया करार ग्रहण करना और अनुभव का पूर्णता में आना असफल हुए थे। दुसरी अर्थ में कहना होता तो, पूराना करार का यहोवा के बहुत सारे भक्तजनों ने उन लोगों के समय में मिले हुए मौकें से भी ज्यादा गहरी बातों को अनुभव किया। वास्तव में वे लोग नया करार के मार्ग मे चलते थे।
नया करार की शर्त के सम्बन्ध में यिर्मयाह ३१:३१-३४ पदों में दिया हुआ है। वहां पर इस प्रकार से लिखा हुआ है, “वह समय आ रहा है जब मैं इस्राएल के परिवार तथा यहूदा के परिवार के साथ नयी वाचा (करार) करुंगा। यह उस वाचा की तरह नहीं होगी जिसे मैनें उनके पूर्वजों के साथ की थी। मैंने वह वाचा तब की जब मैं ने उनके हाथ पकडे और उन्हें मिश्र से बाहर लाया। मैं उनका स्वामी था और उन्हों ने वाचा तोडी। ” यह सन्देश यहोवा का है। “भविष्य में यह वाचा मैं इस्राएल के लोगों के साथ करुंगा।” यह सन्देश यहोवा का है। “मैं अपनी शिक्षाओं को उनके मस्तिष्क में रखूंगा तथा उनके हृदयों पर लिखूंगा। मैं उनका परमेश्वंर ठहरुंगा और वे मेरे लोग होंगे। लोगों को यहोवा को जानने के लिए अपने पडोसियों और रिश्तेदारों को शिक्षा देना नहीं पडेगी। क्योंकि सब से बडे से लेकर सब से छोटे तक सभी मुझे जानेंगे।” यह सन्देश यहोवा का है। “जो बुरा काम उन्हों ने कर दिया उसे मैं क्षमा कर दूंगा। मैं उनके पापों को याद नहीं रखूंगा।”
ये खण्ड इब्रानियों ८:८-१२ पदों में भी उल्लेख किया हुआ है। इब्रानिओं को लिखा हुआ पत्र के बहुत सी भागें नया करार के विषयवस्तु से सम्बन्धित है और इस से भी ज्यादा अध्ययन के लिए लाभदायक है।
परमेश्वरको नया करार की प्रतिज्ञा करना क्यों जरुरी था ?
परमेश्वर ने इस्राएलीयों को मिश्र देश से निकाल कर लाते समय में उन्हों ने पहला करार दिया था। वह पहला करार व्यवस्था में आधारित था। वही व्यवस्था दस आज्ञाओं में छोटी किया गया है और निर्गमन, लैव्य व्यवस्था, गिन्ती एवं व्यवस्था के पुस्तकों में विस्तार किया हुआ है। ये पुस्तकें – उत्पति के साथ पूराना करार के मुख्य पुस्तकें है और इनकों “तोराह” (व्यवस्था) कहते हैं।
परमेश्वर ने मूसा के द्वारा दिया हुआ व्यवस्था वो न्यायोचित और अच्छे माहौल में जीते हुए आदमियों से बहुत अच्छा था। वे लोग आधुनिक विचार मुताविक के कट्टर आदमियों थे। डायन, व्याभिचारी, बलत्कारी, हत्यारा, मां-बाप को मारने वाला और दूसरा अपराध करने वालों को मृत्यु दण्ड देने के लिए व्यवस्था में उल्लेख किया गया है। निर्दोष व्यक्तियों खुली एवं स्वतन्त्र के साथ चलते हुए देखकर दोषी आदमियों में डर लगा हुआ होता, अगर आज तक भी व्यवस्था को मानना होता तो इस से सुखी समाज को नेतृत्व करने के वारे में मुझे शक है।
वह व्यवस्था सब से अच्छा होते हुए भी धर्मी लोगों को कुछ भी प्रभाव नहीं कर पाया। व्यवस्था को दिया हुआ लगभग एक हजार बरस के बाद परमेश्वरके इन्साफ पहले इस्राएल और इस के बाद यहूदा के ऊपर आया। वे लोगों नें सभी आज्ञाओं भङ्ग किया और पुराने करार के अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में असफल हुए। सब से पहले वे लोगों ने परमेश्वरके पहला आज्ञा ही भङ्ग किया और परमेश्वरसे भागते हुए अलग देवी–देवताओं को पूजा करने लगे। इस लिए अश्शूरों और बेबिलोनीयों आकर वे लोगों के देश को खतम कर डाला। उन लोगों ने यरूशलेमको नष्ट कर के इस्राएलीयों को कैदी बनाके ले गया।
इस्राएल का इतिहास देखने से उसी समय यिर्मयाह ने परमेश्वरका नया करार के विषय में घोषणा किया था।
खास समस्या परमेश्वर ने दिया हुआ व्यवस्था में न होकर मनुष्य स्वभाव में ही आधारित था। यिर्मयाह कहते है, “हृदय सभी चिजों से धोखेवाज होता है, वो वहुत भ्रष्ट होता है” (यिर्मयहा १७:९)। “मैं अपनी शिक्षाओं को उनके मस्तिष्क में रखूंगा तथा उनके हृदयों पर लिखूंगा।” जब तक मानव हृदय घमण्डी, अभिलाषी और व्यभिचारी होता है, तब तक व्यवस्था को मानना प्राय: असम्भव है। हमारा अनुशासन, मेहनत और काम के दक्षता ने उस में कोई महत्व नहीं रखता। इसलिए लोगों के कार्यशैली परमेश्वर का इच्छा, योजना तथा माग के विरुद्घ में होता है।
बहुत से लोग ने ये बात को मालूम नहीं कर पाता। हो सकता है, वे लोगों ने सच्चे परिवर्तन का अनुभव तो किये होंगे, दुष्ट चालों को छोड़ दिया होगा, और उन लोगों के जीवन में बहुत बडे परिवर्तन भी आया हो सकता है किन्तु वे सब कुछ होते हुए भी अपने अन्दर के दुष्टता तो पहले से कुछ ज्यादा ही हो सकता है।
पावल बहुत ही आश्चबर्य रूप में दमश्कस के रास्ते पर परिवर्तन हुआ था। उसका जीवन पूर्णरूप से बदल गया था। पहले जिस उत्साह और जोश से इसाईयों को सताने के लिए चले थे बाद में उसी उत्साह और जोश में सुसमाचार प्रचार करने लगा। उस समय पर उसका समस्याओं का अन्त न होकर शुरु हो रहा था। रोमी ७ अध्याय में वो बताते है कि कैसे उसने व्यवस्था मानने में जोड़दार कोशिस की फिर भी पूर्ण रूप से पालन नहीं कर सका।
उस खण्ड में उसने अपनी जीवन परिवर्तन होने से पहले का दिनों के बारे में बताते हुए जैसे नहीं लगता। मुझे लगता है दमश्कस के रास्ते पर यीशु मसीह के साथ अचानक मिलने के बाद का उसके जीवन में वे संघर्षपूर्ण समस्या आया हुआ होगा। आखिर में उसने विजय प्राप्त करके इस तरह घोषणा की, "क्योंकि जीवन की आत्मा को व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतन्त्र कर दिया। क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उस को परमेश्वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।" रोमियों ८ अध्याय में उन्हों नें पता किया हुआ विजय की नया तरीके को वर्णन किया हुआ है।
परमेश्वर के व्यवस्था हृदय में लिखने का अर्थ क्या होता है ? ये बात मनुष्य स्वभाव के पूर्ण परिवर्तन हुए बगैरह और कोई बात नहीं है। ये तो एक ईश्वमरीय आश्चंर्यपूर्ण काम है। आप कुत्तें को सिखाकर मांगना, खडा होना और बहुत सारी खेलों को खेलना सिखा सकतें हैं। धीरजी होकर और इनाम देकर कुत्ते को उसकी स्वभाव के विपरित काम भी करा सकतें हैं। ये सभी थोक करके भी कुत्ता, कुत्ता ही रहता है एवं इसकी अपनी प्राकृतिक स्वभाव में कभी भी परिवर्तन नहीं कर सकतें है। हमारा कहना भी यही है कि “गधे को धोकर गाय नहीं बनाया जा सकता” औंर “बारह वरस तक कुत्तेका पूंछ को किसी खोखले में रखने से भी वैसा-वैसा ही रहता है।”
परमेश्वर ने मनुष्य के स्वभाव को फिर निर्माण करते हैं जिस के कारण उसकी व्यवस्थाओं मुताबिक काम करने का स्वभाव खूद ही हमारे अन्दर आ जाते हैं। पत्रुस ने इसी सत्यता की सम्बन्ध में इस प्रकार सें बताते हैं, “क्योंकि यदि ये गुण तुम में हैं और उनका विकास हो रहा है तो वे तुम्हें कर्मशील और सफल बना देंगे तथा उनसे तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा” (२ पतरस १:८)। जानवर कभी भी मनुष्य बन नहीं सकता, किन्तु मनुष्य तो परमेश्वर के अनुग्रह से ईश्वनरीय स्वभाव में परिवर्तन हो सकता है।
स्वभाव से ही मनुष्य हृदय पापी है। बहुत सी तत्वओं ने मुख्य तथ्य को ही धूमिल कर सकता है। लोगों की भलाई के लिए दिया हुआ दवाबें, अच्छे देख–भाल तथा पालन-पोषण, अच्छे दोस्तों ओर असरदार बातें, ठीक और उचित धार्मिक कामों के कारण से बाहरी सुधार तो होते होंगें पर ये कोई भी बातें हृदय को पूर्ण रूप से नहीं बदल सकता। आत्मा में हुए नये जन्म ही ऊपर उल्लेख किये गये बातों के लिए नया करार के सार है।
व्यवस्था के सम्बन्ध में बताने के बाद यिर्मयाह ने शिक्षा के बारे में इस तरह से बताते हें, “किसी को भी अपने पडोंसियों को तथा भाइयों को फिर से इस तरह सिखानी नहीं पडेगी, परमप्रभु को पहचानों, क्योंकि छोटे से लेकर बडों तक सब लोगों ने मुझें पहचानेंगे।” यिर्मयाह का इस कहावत को यूहन्ना ने और भी जोड़ देते हुए साफ तरीके से इस तरह बताते है “तुम्हें तो आवश्यकता ही नहीं हैं कि कोई तुम्हें उपदेश दें” (१ यूहन्ना २:२७)।
आधारभूत रूप में सभी मानवीय शिक्षाएं पुराने करार के स्वभव मुताबिक ही मिलते हैं। मनुष्य द्वारा दिया गया शिक्षा बाहरी तौर पर ही लाभदायक होता है। नये करार के शिक्षाएं पवित्र आत्मा के द्वारा दिया गया है और इस लिए ये अन्दरुनी है। यीशु ने अपने चेलों को कहा, “इसमें तुम्हारा भला है कि मैं जा रहा हूं। क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो सहायक तुम्हारे पास नहीं आयेगा.... मुझे अभी तुम से बहुत सी बातें कहनी हैं किन्तु तुम अभी उन्हें सह नहीं सकते। किन्तु जब सत्य का आत्मा आयेगा तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य की राह दिखायेगा...” (यूहन्ना १६:७, १२, १३)। यीशु मसीह ने इस प्रकार से ये बता रहा था कि उसकी अपनी ही शिक्षा से उन लोगों में बैठने वाला पवित्र आत्मा के शिक्षा ही शिष्यों के लिए बेहतर है। फलस्वरूप, सभी मनुष्यों वाली बाहरी शिक्षा में भी उसकी अच्छे असर होने लगे। इशा मसीह संसार के ही सब से ऊचें शिक्षक होते हुए भी पवित्र आत्मा ही और भी उत्तम शिक्षक होने वाला था। उन्हों नें साफ तरीके से किए हुये कामों के बाबजूद भी अब वो चीजों बाहर की चीजों से अन्दरुनी चीजों में परिवर्तन होने के लिए तैयार थे।
हम यीशु मसीह के और मूसा के वचन को तुलना करके देखतें हैं, “मेरी मृत्यु के बाद तुम लोग कुकर्म करोगे।” (व्यवस्था ३१:२९)। ये पूरानी वास्तविक तस्वीर थी और आज भी बहुत सी इसाईयों पूरानी अवस्था में ही है। शिक्षक और अगुवाजन के विना हर चीज टुट कर नाश होता है।
हम वही बातें योएल की भविष्यवाणी में भी पाते हैं, जिसको पत्रुस के द्वारा पेन्तिकोस के दिन में बोल दिया गया था, “अंतिम दिनों में ऐसा होगा की मैं सभी मनुष्यों पर अपनी आत्मा उँडेल दूंगा फिर तुम्हारे पुत्र और पुत्रियां ... युवा लोग ... बूढे लोग ... सेवकों ... सेविकाओं” (प्रेरित २:१७-१८)। सभी लोगों ने अर्थात् बहुत ही निचें वाली दर्जा के अनपढ और महान् अनुभव खूद परमेश्वर से ही सीधे ले सकते हैं। उसी समय से महान् शिक्षकें और अगुवाजनों में आश्रित हो रहने की अवस्थाका अन्त हुआ।
यीशु मसीह की “मेरे जाना ही तुमहारें लिए भला है” वचन से “मेरे मरने के बाद भ्रष्ट होकर जाओगे” जैसी मूसा के वचन में ज्यादा तौर पर धार्मिक अगुवाजनों आत्मा के नजदीक रहने की धारणा मिलता है। वे लोग ज्यादा ही महत्वपूर्ण अनुभव को चाहते हैं। उन लोगों के झूण्ड का फाइदे के लिए जितना हो सके उतना स्वतन्त्र हो सकता है पर नये करार के खास अर्थ समझाने की कमी में ही होता है। पवित्र आत्मा के हिफाजत करके रखने की शक्ति में विश्वातस भी नहीं करतें। इस से भी खराब बात तो यह है कि कोई भी उन लोगों मे आश्रित न होकर, अपनी पद-इमान, आयस्रोत और सुरक्षा ही बन्द होने की डर से इस को सम्भाल कर रखने में व्यस्त होता है।
तो नये करार में शिक्षक के स्थान क्या हो सकता है ? हम इस प्रश्न् के जवाफ एफिसी ४:११-१६ में पा सकते हैं। यहां पर शिक्षक को पांच सेवाकाइयों में से एक बोलकर बता दिया गया है। जो ख्रीष्ट की स्वर्गारोहण के बाद उसकी मण्डली को दिया गया हैं – प्रेरितों, नवीओं, गडेरिओं, शिक्षकों औंर प्रचार को। पावल बताते है, ये सेवाकाईयों की उद्देश्य नये विश्वाकसीओं को धोखा में आने से सुरक्षा देना और ख्रीष्ट की शरीर को परिपक्वनता में लाना है।
प्रायः नये विश्वासीओं नये करार में सिधे कदम रखने मे असमर्थ होते हैं। सर्वप्रथम के लोगों ने पूराने करार के अनुभव किया होना चाहिए। आज के जैसे ही नये नियम के समय में भी नये विश्वासीओं मूर्तिको पूजा करने वाले परिवार से आया हुआ होता था जिन्हों ने पूरानी करार को कुछ भी नहीं जानते थे। पर वे लोगों भी व्यवस्था के नीचे ही होना चाहिए। इसी को पावल इस तरह से उल्लेख करते हैं, “हमें ख्रीष्ट में लाने के लिए व्यवस्था ने हमारे जिम्मे ले रखे है।” इस को पावल और भी साफ करते हैं “उत्तराधिकारी जब तक बालक है तो चाहे सब कुछ का स्वामी वही होता है, फिर भी वह दास से अधिक कुछ नहीं रहता। वह अभिभावक को और घर के सेवकों के तब तक अधीन रहता है, जब तक उसके पिता द्वारा निश्चिकत समय नहीं आ जाता ” (गलाती ४:१-२)।
नये विश्वासियों आसानी में धोखे का शिकार हो सकता है। यीशु मसीह ने बताया था कि हम लोग ऐसी समय में जी रहें हैं, जब बहुत सारी झूटे अगमवक्तायें होगें। नये विश्वानसीयों और दूसरे लोगों जिनके पास पहचान कर सकने का ज्ञान होना चाहिए किन्तु प्रायः भेंड़ के भेष में आनेवाला भेंडियाको पहचान पाना बहुत कठीन है। क्योंकि उन लोगों ने आत्माओं को पहचानने की तालिम पाया नहीं होते है। अगर हमारे साथ हुए धर्मशास्त्रा के पांच सेवाकाइयों को हमारी ही बीच में अच्छे तरीके से सञ्चालन किया तो धोखा देने के लिए आनेवालों को अवश्य ही मुश्किल होगी। ऐसी शुद्ध सेवाकाइयों की अभाव के कारण बहुत से ईसाइयों आत्मिक रूप में बच्चे की अवस्था में ही है, जहां वे लोग आसानी से झूटी और गलत शिक्षा के शिकार बन सकते है।
बहुत इसाई परिवारों में जन्मे हुये बच्चों इसी अवस्था में होता है। वे लोग खुद ही नया करार के मार्ग में चल नहीं पा रहे है। उन लोगों को सिखाना, अनुशासित करना और व्यवस्था को उनकी जीवन में लागू करने का काम भी हम लोगों ने किये हुए होना चाहिए। यद्यपि वे लोगों ने ईशा को पक्के रूप से पीछा करने को इच्छा कीया होता तो हम उन लोगों को व्यवस्था से स्वतन्त्र करके उन्हें जो करने की इच्छा होती है वही करने नहीं दे सकतें। वे लोग इसके लिए अभी भी तयार नहीं हैं। पहले उन लोगों ने आज्ञाकारी होकर बाहरी व्यवस्था के शिक्षा हासिल करना होता है।
आत्मिक परिपक्वता में न आए हुए तक नये विश्वा सीओं को पूरानी करार के अनुभव से बाहर लाने के लिए पास्टरों और शिक्षकों की आवश्यकता होती हैं। उसके बाद ही वे लोग नया करार के पूर्णता में चल सकते है। इसके बाद ही पास्टरों और शिक्षकों का काम भी समाप्त हो जायेगा। और वे विश्वा सीओं अन्य सन्तों साथ संगति में लगातार आनन्द पा सकते हैं। पहले से भी और बेहतर तथा गहरा संगति में एवं और लोगों ने वे लोगों को सिखाने के बदले में वे लोगों ही और नये विश्वाासीओं को सिखाने एवं पास्टर के काम करते है किन्तु उन्हें खुद को शिक्षक की आवश्यकता नहीं पड़ सकता है।
पत्थर में लिखा हुआ व्यवस्था बाद में जाकर कागज में उतार दिया गया। वो ही पूराना करार की आधार है। अब हमारे हृदय में लिखा हुआ व्यवस्था ही नया करार के आधार है। पूराने करार में धर्मशास्त्रे ने निश्चिरत व्यवस्थओं और दैनिक गुजरा के लिए नियम दिया हुआ था। हमें नया करार की अनुभव में भी धर्मशास्त्रर की आवश्यकता होती है ? अगर आवश्यकता पड़ता है तो, इसका स्थान क्या हो सकता है ?
यीशु मसीह के बारे में भी कुछ प्रश्नों को रखते हुए शुरु करते हैं – यीशु मसीह को धर्मशास्त्र् की आवश्यकता थी ? उनके जीवन में इसका स्थान क्या था ? ये प्रश्नछ कें उत्तर है – मैं विश्वा स करता हूं कि उन्हें धर्मशास्त्रे की जरुरत नहीं थी। परमेश्वर के व्यवस्था उनके हदय में पूर्ण रूप से लिखा हुआ था। उनके सिद्ध सम्बन्ध पिता (परमेश्वर) के संग थे और उसे साथ देने में कोई भी बाहरी बातें की आवश्यकता नहीं थी। इस तरह से पिता के साथ का अखण्ड संगति उनके जीवन में शुरु से अन्त तक था। उन्हों ने वीराने में सैतान संग के वाद–विवाद में धर्मशास्त्रर से ही बोले थे। उन्हों ने उस चीज की आवश्यकतायें थी या नहीं मुझे मालुम नहीं है। फरिसीओं के संग सामना करने के समय में उन्हों ने धर्मशास्त्र् को ही प्रयोग की। उन्हों ने इम्माउस के रास्ते पर धर्मशास्त्रञ से अपने शिष्यों को व्याख्या कर दिया। जैसे ही धर्मशास्त्रा में अपने मन की छाया को देखा, वह खुश हो गये होने की विषय में मैं निसन्देह हूं। उन्हो नें धर्मशास्त्र् को, “सिखाना, अर्ती देना, ठीक कराना एवं उचित जीवन गुजारने के लिए लाभदायक" पाया। किन्तु अपने लियें तो धर्मशास्त्रम की आवश्यकता भी आ जायेगी जैसे बातों मे मैं विश्वाजस नहीं करता हूं।
ईशा हमारे प्रभु और मुक्तिदाता हैं, साथ ही हमारे लिए एक उत्तम मिसाल भी हैं। हमारे पिता परमेश्वर, हमें ईशा जैसे ही होने की इच्छाएं करते हैं। हम लोग नये करार के पूर्णता में होगें और धर्मशास्त्रे की पढाई से ये प्राप्त होगें जैसा विचार गलत है। न तो यीशु ने लगातार धर्मशास्त्रा को अध्ययन करके पूर्णता पा सका न तो हम ही पा सकते हैं। उन्हों नें अपना गुणों को अपने पिता के द्वारा प्राप्त किया था और हम भी वैसी तरीके से ही प्राप्त करेंगें।
केवल धर्मशास्त्र की पढाई से हमारे हृदय में उसकी बातें लिख नहीं सकता। अगर हम में यादगार अच्छे है तो ये हमारे दिमाग में रहना सम्भव है, किन्तु वे बात पैसा नहीं है। ये तो दुसरा काम करता है। जब परमेश्वर ने अपने व्यवस्था हमारे हृदय में लिखेंगे तब ही हम धर्मशास्त्र् को समझते हैं और हम में जो बातें पहले से ही थी वह मालूम कर सकते है। यीशु ने जैसी ही, इसको समझ कर हम भी खुस होतें हैं। हम भी धर्मशास्त्रा को, “सिखाना, अर्ती देना, ठीक कराना और उचित जीवन गुजारने के लिए लाभदायक” होते हुए पा सकतें हैं। हम धर्मशास्त्रा को सिखाना, तालिम देना, अर्ती देना। अन्धकारों के काम को दिखा देना और अपने तथा और लोगों को ठीक कराना प्रयोग कर सकते हैं। अगर हमें हवालत में बन्द कर दिया गया और बाइबल को छिन लिया गया तो भी निसन्देह धर्मशास्त्रम को खो देने का महसुस करतें हैं। किन्तु हमारा आत्मिक जीवन बाइबल में आश्रित नहीं होते।
बाइबल को केवल ‘परमेश्वर का वचन’ अथवा ‘वचन’ से उल्लेख करना ही बहुत से गलत अर्थ दिया हुआ कारण बनें हैं। बाइबल खुद ने भी कभी भी इस प्रकार से नहीं बताया है। इसने तो खुदको धर्मशास्त्रध के नाम से उल्लेख किया हुआ है और जब इसे परमेश्वर का वचन के अर्थ में लेतें हैं तब तो पूर्ण रूप में अर्थ अलग होता है। अगर आप इस में कुछ शक करेंगें तो बाइबल शब्दकोश को ढूड़कर देखिए। प्रेरितों १७:११ मे इस तरह से लिखा है: “इन लोगों ने पूरा मन लगा कर वचन को सुना और शास्त्रों को उलटते–पलटते यह जांचते रहे ........,” यहां वचन साफ तरिके से शास्त्रों से अलग है। इसी तरह हम पाते है “शब्द देह धारण कर हमारे बीच निवास किया” और ये साफ है कि देह धारण करने के लिए आए शब्द बाइबल नहीं थी।
अन्य तीन पदों बाइबल में उल्लेख किये हुये मिलते हैं। “मनुष्य केवल रोटी पर नहीं पर परमेश्वर के मुह से आए हुए हर शब्द से जीते है।” “आत्मा की तरबार जो परमेश्वेर के वचन है।” इफिसियों ६ अध्याय में हथियार खण्ड “परमेश्वेर के वचन जीवित और प्रबल तथा कोई दो धार बाली तरवार सें ज्यादा तेज है।” ये उल्लेख किया गया पदों को धर्मशास्त्रड को अर्थ मे लेनी होती तो इसे की पूरानी करार की व्यवस्था में ज्यादा जोड़ देते हुए जैसी होती है। बाइबल की पूरानी करार के धारणा मुताविक केवल विश्वाआस करना और शिक्षा देने से भी पूरानी करार के अनुभव में नहीं चलाता। नहीं तो हम भी वे लोगों की तरह ही होतें हैं, जिसको यीशु ने कहा, “हे न्याय शास्त्रियों, तुम्हें धिक्कार है, क्योंकि तुमने ज्ञानकी कूंजी ले तो ली है। पर उस में ना तो तुम ने खुद प्रवेश किया और जो प्रवेश करने का जतन कर रहे थे उनको भी तुझे बाधा पहूंचाई” (लूका ११:५२)।
अगर परमेश्वर के वचन का अर्थ बाइबल नहीं है तो इसका अर्थ क्या है ? जब हम पहले का धारणाओं को छोंड़ देतें हैं, तब ही हमे इस प्रश्ना के जवाफ पाना शुरु करतें हैं। ग्रीक भाषा में ‘लोगोस’ शब्द के फैला हुआ अर्थ है। किन्तु ये शब्द वचन और विचार में केन्द्रित है। परमेश्वेर जो कहता है और सोचता है वही उसकी वचन अथवा ‘लोगोस’ है। ये उसकी अपने ही विचार एवं शब्दकोष की सृष्टि है। परमेश्वर ने वचन से ही सम्पूर्ण सृष्टि को कर दिया। वह प्राचीन नवीओं के साथ और वे नवीओं मार्फत् लोगों से बात करते हैं। उसने अपना पुत्र यीशु ख्रीष्ट में एवं यीशु ख्रीष्ट के द्वारा बात किया। जब उसके वचन हम में आ जाते हैं वह हमारे लिए जीवन की रोटी होती है और वह बहुत ही शक्तिशाली तथा हमारे हृदय में बैठते है। ये आत्मा की तलवार है। ये कभी भी व्यर्थ होकर नहीं लौटते, किन्तु जिस उद्देश्य के लिए इसको भेजा गया है, उसको पूरी करता है।
कृपया गलत मत मानिए- मैं ने धर्मशास्त्रे के अधिकार अथवा प्रेरणा को इन्कार नहीं कर रहा हूं। मेरे कोशिस तो नये करार में इसका स्थान को स्पष्ट करने को लिए ढूंड़ना ही हैं। यीशु ने इसको जो स्थान दिया साथ ही बाइबल खुद ने दिया वही स्थान मैं भी देना चाहता हूं।
नया करार के साथ में और कौन सी परिवर्तनें आए ? जैसे ही हम अध्ययन करतें हैं, परमेश्वर के मार्ग और उनकी तरिकाओं सम्बन्धी नयी बातें को पता लगाकर संगति करना शुरु करतें हैं। कभी कभी तो इतना साधारण सी होते है, कि जिसके बारे में हम नें लम्बी समय तक याद नहीं किये भी हो सकता है और हम चौंक भी सकतें हैं।
इस तरह हम ने देखा है, कि दिखने वाली और बाहरी व्यवस्था से जो अन्दर तथा अदृश्य अवस्था में हम सरक गए हैं। इसी तरह से बाहरी मनुष्यो बाली शिक्षकों के बदले में अन्दर ओर सदा निवास करने वाला परमेश्वर के आत्मा ने वह स्थान लेता है।
अब हम देखतें हैं कि नये करार ने और भी बहुत सारी एक जैसी एवं सम्बन्धित परिवर्तनें लाया है। हम परमेश्वर के नये जाति हो गए होने की बारे में मध्यनजर रखकर विचार करना शुरु करतें हैं।
पूराना करार की युग में परमेश्वर ने पृथ्वी के बहुत सी जातियों से एक खास जाति को चुन लिया। वे लोग इस्राएली मनुष्य थी। वह विशेष जाति से इसहाक और याकूब होते हुए अब्राहम का खानदानों के बाद ‘यहुदी’ नाम से पहचाना गया। आज के दिन तक भी स्वभाव से ही वे लोग परमेश्वर के द्वारा चुन लिया गया जाति है। यद्यपि कोई आदमी यहूदी के विचार में परिवर्तन होकर यहूदी बन सकता है किन्तु इस जाति के सदस्य बनना आसन तरिके यहूदी मां की कोख से शारीरिक जन्म लेना है।
जब मसीह (ख्रीष्ट) इस्राएल में आ गये, उस देश की अगुवाजनों और बहु संख्या में रहे यहूदीयों ने उन्हें इन्कार किया। इस से भी ज्यादा तो यहूदियों ने शुरु के मण्डली का शक्तिशाली और शुद्ध गवाही को भी इन्कार किया। इस लिए, परमेश्वेर का इन्साफ यहूदियों में आ गया और ई.सं. ७० में रोमीयों नें यरुशलेम में आक्रमण करके लुटपात मचायी। इसके बाद वे लोग पृथ्वी के अन्य विभिन्न भागों में तितर-बितर होकर भाग जानें मे बाध्य हो गये। वे लोगों ने शारीरिक यातना और आत्मिक अन्धकार में लगभग १९०० वर्षों तक एक राष्ट्र से दुसरी राष्ट्र में फिरते हुए चले, किन्तु वे लागों ने कभी भी पूर्ण विश्राम नहीं पाया।
इस सदियो ने भी यहूदियों के जीवन में हुए असमान बहुत सी नाटकीय घटनाएं दिखाया। जब उन लोगों का लम्बी प्रवास का अन्त हुआ, तब से ही इन लोगों के आत्मिक अन्धापन धीरे से हटने लगे। हिटलर को नर-संहार ने विश्व् को ही स्तब्ध बना दिया और उसके तुरन्त ही आधुनिक इस्राएल का जन्म हुआ और आश्चतर्य रूप में वे लोग जीते रहे।
यहूदि जाति के उपलब्धियां उनके कूल जनसंख्या के औसत से ज्यादा ही है। वे लोगों ने विश्वे को धर्मशास्त्रध, साम्यवाद और आणविक हथियारों को दिए। वे लोगों के शैक्षिक, वैज्ञानिक और कलाकृति सम्बन्धी उत्कृष्ट उपलब्धीयां बहुत ही आश्चदर्यपूर्ण है। वे लोगों ही परमेश्वरको जनों और उस में विशेष लक्ष्य हुए जाति बताकर ये बातों ने प्रमाणित करते है।
उन लोगों में अद्भूत ढंग से परमेश्वरके शक्ति का प्रदर्शन हुआ था फिर भी इस्राएलीओं पूराने करार के स्वभाविक लोगों से अच्छे नहीं हुए। वह दिन एक महान दिन था जब यहोवा परमेश्वर ने अपनी शक्ति के द्वारा इस्रालियों को मिश्र की भूमि से निकाल के लाया था। वह दिन महान दिन था जब यीशु ने अपने नये करार के आदमिओं को हात फैलाकर अपनी शरीर के सभी लहू बहाकर पाप से स्वतन्त्र कर दिया।
स्वभाविक जन्म के द्वारा ही पूराने करार में आदमियों के स्तर में प्रवेश मिलता था किन्तु केवल आत्मिक जन्म ने ही हमें नये करार में प्रवेश कराता है। जितनी परमेश्वेर के आत्मा के द्वारा जन्म लेतें हैं केवल वही लोग परमेश्वर का सन्तान हो पाने वाली नयी जाति है। इस तरह से केवल नये जन्म से ही हमें परमेश्वर का बेटा–बेटियां बना सकता है।
यहां पर हम इस बात को कुछ जोड़ देतें हैं- बप्तिसष्मा ने, कोई भी झूण्ड ने, अथवा सम्प्रदाय की सदस्यता ने, हमारे अच्छे काम ने, राष्ट्रियता ने, रंग ने, धर्म ने अथवा कोई भी मानवीय बातों नें भी परमेश्वर के नये करार का विशेष जाति के सदस्य नहीं बना सकता। नयीं मानवीय बातों नें भी परमेश्वर के नये करार के विशेष जाति के सदस्य नहीं बना सकता। नये करार में आने के लिए एक ही रास्ता है- नये जन्म।
ये आत्मिक जाति के कुछ सदस्यों में प्रत्यक्ष स्वभाविक वरदानें है। खास तौर पर परमेश्वेर ने इस संसार के गरीब और कमजोरों को उनके काम के लिए चुन लिया है। पावल हमें इस तरह से याद दिलाता है, “शरीर के अनुसार बहुतेरे न तो संसारिक दृष्टि में बुद्धिमान थे, और नहीं शक्तिशाली। तुम में से अनेक का सामाजिक स्तर भी कोइ ऊंचा नहीं था। बल्कि परमेश्वेर ने तो संसार में जो मूर्खतापूर्ण था, उसे चुना ताकि बुद्धिमान लोग लज्जित हों। परमेश्वर ने संसार में दूर्बलों को चुना ताकि जो शक्तिशाली है, वे लज्जित हों” (१ कोरिन्थी १:२६–२७)।
अब परमेश्वर के नया जाति के संग आत्मिक वरदानें और शक्तियां है। इस में बहुत सी शारीरिक आँख के लिए अदृश्य और स्वभाविक विचार से छिपकर रहा होता है तथापि उन लोगों से प्राप्त कर पाने वाला सत्य फाइदायें ज्यादा ही बढे होते हैं। जब तक स्वर्ग के पुस्तकें नहीं खुलता और उसकी गुप्त बातों में प्रकाश नहीं डालते, तब तक आत्मिक भेदें और परमेश्वर में असंख्या नम्र स्त्री–पुरुषों का विजय उन लोगों का मित्र- और सहयोगीयों से छिपा हुए अवस्था मे होंगे। केवल अनन्तता ने ही मनुष्य जाति के लिए लम्बी भलाई और मुक्ति, लाये हुये दिखाते है।
परमेश्वर ने पुराने करार में चुन लिया गया जाति के सदस्य के रूप में जन्म होना खुस नसीब की बात थी। इसी तरह आत्मिक जन्म के द्वारा नयीं करार में परमेश्वर के सन्तान के रूप में जन्म लेना पहले से भी और अच्छी अवसर है। परमेश्वर के प्रशंसा हों, स्वभाविक जन्म के बाद, आत्मिक जन्म के द्वारा उनके लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बड़ रहा है।
नये करार में केवल नये जाति ही नहीं हैं वल्कि नये याजक भी है। पूराने करार की याजकों लेवी की घराने से और हारुन की खानदान से लाया जाता था। वे लोगों के पवित्र स्थान और मन्दिर के काम के सम्बन्ध में साफ तरिके से उल्लेख किया गया था जैसे वे लोगों ने परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थता के सेवा करते थे। इब्रानियों ७ अध्याय ने इस बात को इस तरह से स्पष्ट करते है, कि नये करार में नयी याजक के पद है, जो पूरानी से अति उत्तम है। यह नयी स्तरों को मेल्कीसेदेक का स्तर कहते हैं। नया पद के मुताविक प्रधान याजक यीशु ही है।
लेवी याजक पद के सदस्यता जाति के अनुसार पिता से पुत्र में आते थे। इस संस्कार के परिणाम सदा के लिए अच्छे नहीं हुए। ऐसा नहीं कह सकते कि ‘याजक के बेटे को पूजा करना ही पड़ता है’ औंर “जैसे बाप वैसी ही बेटा।” पुस्तैनी मुताविक के स्वभाविक अधिकार उतना भरोसामन्द नहीं होता है। जैसे भी हो लेवी याजक के सिद्घान्त कामचलाउ और याजक कैसा होना चाहिए जैसी धारणा के लिए दृष्टान्त देना ही पर्याप्त था। परमेश्वर ने मिलिकिसिदक याजक पदके नया दर्जा स्थापित न हुए तक उस का प्रयोग किया।
इब्रानियों ७:३ में मेल्कीसेदक के बारे में उल्लेख किया गया है, “उसके विना पिता अथवा उसकी विना मां अथवा उसके पूर्वजों का कोइ इतिहास नहीं मिलता है। उसके जन्म अथवा मृत्युका भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है। परमेश्वर के पुत्र के समान ही वह सदा-सदा के लिए याजक बना रहता है।” यीशु ने इसी नयी याजक के पद में प्रवेश किया इसलिए कि “अपनी वंशावली के नियम के आधार पर नहीं, बल्कि एक अमर जीवन की शक्ति के आधार पर याजक बना है” (इब्रानियों ७:१६)। उनकी देख-भाल करनेवाला पिता यूसुफ याजक हुए कारण से नहीं, न तो मण्डली के समिति ने स्वीकार किये हुए कारण से, पर परमेश्वर के ही नियुक्ति द्वारा उल्लेखित याजक के पद में प्रवेश किया। साधारण तौर पर साफ तरिके से बताना हो तो वह याजक पद के काम के लिए एकदम लायक का था। उनके नियुक्ति धार्मिक विधि ही नहीं था वल्कि उनकी वप्तिस्मा में परमेश्वेर के इस तरह की उद्घोषण हुआ था, “यह मेरा प्रिय पुत्र है। जिस से मैं अति प्रसन्न हूं।” इसके वाद उस में पवित्र आत्मा कबूतर के रूप में नीचे उतर आया।
लेबी याजकों ने विशेष उद्देश्य मुताविक सेवा की थी। वे लोगों के पद में बहुत सी इमान्दार धर्मी लोग होते हुए भी पूरानी एकलेसिया का याजकों तो होनी चाहिए याजकों के एक मिसाल ही थे। मेल्कीसेदक याजक के ही स्तर में परमेश्वर ने नये करार के याजक विधि पूर्वक नियुक्त कर दिये है। उन्हो नें उसको महान् प्रधान याजक बना दिया था। उसके काम के लिए चुन लिये गये और नियुक्त किये गए लोगों को उन्हों ने पवित्र आत्मा से अभिषेक करते हैं।
नये करार में नये जाति, नये याजकें और नये भवन भी है। इस्राएल राज्य को इतिहास के चरम सीमा में सुलेमान राजा ने पहला महान मन्दिर का निर्माण किया। दाऊद राजा के सैनिकों ने जहां गए थे वहीं पर विजय पा लिया था। परिणाम स्वरूप, सुलेमान के समय में शान्ति औंर समृद्धि आया था। उन्हों ने अपना शक्ति परमेश्वर के भवन बनाने के लिए लगाया। किन्तु वो मन्दिर को बनाने की आज्ञा परमेश्वर ने नहीं दिया था। उन्हों ने तो मूसा को पवित्र स्थान बनाने के लिए आवश्यक ढांचा के निर्देशन दिया था। दाऊद के अच्छे विचार थे और इसको सुलेमान की जीवन काल में पूरा करने की अनुमति परमेश्वर ने दिया।
परमेश्वर ने इस मन्दिर को अति उच्च आदर नहीं दिया और उज्जियाह राजा के शासन काल में भूकम्प से इसे नष्ट होने दिया। इस्रालियों बन्दी अवस्था में हुए समय पर नबूकनदेसर राजा ने उसे जलाकर राख कर दिया। फिर बाबेल प्रवास से लौटकर आए हुए लोगों ने उसे फिर से निर्माण किया। अन्तिओकस् एपिफनेस ने इसी स्थान में जुपिटर देवता के स्तम्भ राख दिया और पवित्र वेदी मंय सुअर के बलि देकर उसे अपवित्र कर दिया। इसके बाद दुष्ट राजा हेरोदेस द्वारा भव्य रूप में मन्दिर को फिर से निर्माण किया। वही मन्दिर यीशु के समय तक भी था।
यहूदियों ने उस समय में मन्दिर को ज्यादा ही श्रद्धा और आदर देते थे। यीशु, स्तिफनस और पावल को उस मन्दिर को आदर नहीं किये होने की वजह ईश्वदर निन्दा का अभियोग लगा दिया था। जब यीशु के शिष्यों नें कानों में फुसर-फुसर कर रहे थे, उन्हों नें कहा, “तुम लोग ये बडे भवनें देख रहे हो ? एक पत्थर भी छोडा नहीं जाता, ये सभी गिरा दिया जायेगा। ”
परमेश्वर के विचार तो दुसरी नयीं करार के मन्दिर बनाने की तरफ थी। स्थिफनस ने बताया था “हात से बना हुआ भवनों में सर्वोच्च परमेश्वर निवास नहीं करेगें” और वही भाषण के कारण वह यीशु के लिए पहला शहीद बन गया। ईश्व्रीय योजना बहुत ही उचीं थी। उसके वास्तविक मन्दिर मनुष्य–जाति ही होना चाहिए था। वह ईंट औट पत्थर से बना हुआ भवन में नहीं बल्कि लहू और मांस से बना हुआ मन्दिर में रहना चाहते हैं। नये नियम ऐसे ही सन्देशों से भरा हुआ है, “तुम लोग परमेश्वर का मन्दिर हो।” परमेश्वर नें आराधना करने वाला विशेष भवन को चाहते हैं जैसी विचार सदा के लिए खतम हो चुका है। उसी संसारिक मन्दिर के बारे में यीशु ने अन्तिम भविष्यवाणी दिये थे। रोमी सैनिकों ने ई.सं. ७० में मन्दिर के नींव में छिपाया हुआ सोने की तलास करते समय पर एक भी पत्थरको नहीं छोड़कर सभी तोड़ डाला। इस तरह यीशु ने किया हुआ अगमवाणी एक एक कर के पुरी हुई।
हिन्दु धर्मालम्बी और बौद्ध धर्मालम्बीयों देवता मन्दिर में ही रहते हैं। मुस्लिमों के भी मस्जिद होता है जिसे पवित्र माना जाता है। हमारे मण्डली भवनका अर्थ क्या है ? क्या ये भी दुसरी मन्दिर जैसे ही पवित्र स्थान है ? अवश्य ही नहीं है। हम विश्वा सी लोग अपने-अपने घरों में इकट्ठा होकर, पेड के नीचे इकट्ठा होकर, नदी किनारे में इकट्ठा होकर अथवा मण्डली घर में ही रहकर यीशु मसिह के नाम में इकट्ठा होकर संगति करतें हैं तो वह हमारे बीच में आतें हैं। मण्डली का अर्थ घर (भवन) नहीं है। हम लोग खुद ही परमेश्वर के पवित्र मन्दिर हैं। मण्डली-भवन (घर) तो दूसरी ईंट और पत्थर से बना हुआ घर से अलग नहीं है।
बेलायत में हुए अधिकतम चर्चें तो पहले दूसरी देवी देवताओं की पूजा करने का स्थान जैसे ही बनाया गया है। पूरानी करार के समय में भी वैसे ही चाल थी। इस्राएल के इतिहास के लम्बी अवधितक यहोवा के उचें स्थानों में ही आराधना कर लिया गया जहां पहले अन्य जातियों ने बलिदान चढ़ाते थे। शमूएल नबीं ने भी ऐसे ही किये हुए दिखाई देता है। निसन्देह परमेश्वर ने उन की हृदय को देख लिया था। इस लिए उन बलिदा नें ग्रहण कर दिया। इसी तरीके से यहूदा के बहुत सी धर्मी राजाओं ने वह धर्मका पालन किये थे। पर हिजकियाह राजा दुसरी राजाओं की तुलना में अलग थे जिसने वे स्थानें नष्ट किया। परमेश्वर ने उसके बारे में इस तरह से घोषण किया, “यहूदा के राजाओं में से उसके पहले या उसके बाद हिजकियाह के समान कोई व्यक्ति नहीं था। उसने यहोवा का अनुसार करना नहीं छोडा ... यहोवा हिजकियाह के साथ रहा ...” (२ राजा १८:५-७)।
पर्वों का विषय में देखने से हम पहले का जैसी ही नियमें फिर प्राप्त करते हैं। परमेश्वर ने पूरानी करार में पर्वओं का स्थापना की थी। वे पर्वो में विना खमीर वाली फसह, पेन्तिकोश और खेमोंका पर्वएं मुख्य थे। उन्हों नें मूसा के द्वारा इस्राएलीयों को साल में तीन बार यरूशलेम जाकर वे पर्वएं पालन करने का आदेश दिया। वे पर्वएं को मनाते समय, परिश्रम और बडे खर्च का आवश्यकता पड़ते थे। बहुत सी सदिंयों से उन में से बहुत लोगों ने पर्वओं का पालन करना भूला दिया गया था। बाद में जाकर राजा हिजकियाह, राजा योसियाह और शिक्षक एज्रा ने ये पर्वओं का फिर ध्यान दिला कर इसकी पालन करना लोगों को निर्देशन दिये।
यीशु के संग मनुष्य को देने के लिए और भी उत्तम चीज था। उन्हों नें पूरानी पर्वओं को नये करार के पूर्णता में ले लिया। पावल इस तरह से वर्णन करतें है, “हमें पवित्र करने के लिये मसीह की फसह के मेमने के रूप में बलि चडा दिया गया। इस लिए आओ हम अपना फसह पर्व बुराई और दुष्टता से युक्त पूराने खमीर की रोटी से नहीं बल्कि निष्ठा और सत्य से युक्त बिना खमीर की रोटी से मनायें” (१ कोरिन्थी ५:७-८)। और भी उत्तम मन के अन्दर के पर्वओं का अर्थ पत्ता लगाने के बाद क्रमिक रूप में यीशु के पहले शिष्यों वही पूरानी करार के पर्वओं से दूर होते गए।
पूराने मण्डलीयां, विशेष तौर पर रोमी सम्राट कन्स्टन्टिन के अधिन में स्थापित होने के बाद, मण्डली ने नया करार के वास्तविकता को खो दिये और फिर मूर्ति पूजा करना शुरु किया, जिस काम के लिए परमेश्वर ने आज्ञा नहीं दिये थे। ख्रीष्टमस, ईष्टर और मण्डली के साथ सम्बन्धित और पर्वएं सभी मूर्ति पूजने वाली धर्मों में आधारित है।
विश्राम के दिन भी अन्य पर्वओं जैसे ही है। विश्राम दिन के बारे में परमेश्वर और इस्राएली जाति के बीच पवित्र करार का स्थापित किया गया था। विश्राम दिन सप्ताह के सातवां दिन शनिबार था। इब्रानियों के लेखक स्पष्ट करते है कि विश्राम दिन कोही भी दिन में निर्भर होना आत्मिक आराम नहीं है। वह इस तरह बताते है, “क्योंकि जो कोई भी परमेश्वर के विश्रान्ति में प्रवेश करता है, अपने कर्मों से विश्राम पा जाता है। वैसे ही जैसे परमेश्वर ने अपने कर्मों से विश्राम पा लिया। सो आओ हम भी उस विश्रान्ति में प्रवेश पाने के लिए प्रत्येक प्रयत्नत करें ताकि उनकी अनाज्ञाकारीता के उदाहरण का अनुसरण करते हुए किसी का भी पतन न हो” (इब्रानियों ४:१०-११)।
ऐसी बातें को न समझकर मण्डली ने यहूदियों जैसे शनिबार को पालन न कर के अन्य जातियों जैसे रविवार को विश्राम दिन के रूप में मनाना शुरु किया। वो नियम लोगों की तरफ से तो स्वीकार किया गया पर परमेश्वर के निगाह को खो दिया और याद करने के लिए सप्तारह के पहले दिन रविवार को मुख्य दिन समझकर मानने लगे। इस प्रकार मण्डली धीरे से बहकने लगे।
हम लोगों ने व्यवस्था, शिक्षकें, धर्मशास्त्रे, जाति, याजकों, भवनें, पर्वएं और विश्राम दिन के बारे में देख चुके हैं। उपोरोक्त प्रत्येक विषयवस्तु में तीन एक जैसे ही विशेषताएं मिलते है, और वो है –
पूरानी करार में असली शिक्षकें थे। और हम में निवास करने वाला गौरवमय पवित्र आत्मा शिक्षक हैं। मण्डली में पवित्र आत्मा को स्थान लेकर अलग-अलग प्रदर्शन और आश्चेर्य कर्म करते हुए झूटे शिक्षकों का प्रवेश हुआ है। परमेश्वर ने अपने जातियों को उचित और अच्छे व्यवस्था को दिया। बाद में और अच्छे व्यवस्था मनुष्यों की हृदय में लिखा हुआ अन्दरुपी व्यवस्था दे दिया। सदियों से मनुष्यों अपनी ही मानवीय व्यवस्था, धार्मिक अनुष्ठान और प्रार्थना-पुस्तकों की तरफ फिरे हुए देखकर दुःख होता है। परमेश्वर ने वैसा करने के लिए मनुष्य को प्रेरणा नहीं दिया था। अब्राहम से इसाहक और याकूब होते हुए जन्म लिये सन्तान ही पूरानी करार के यहूदी जाति है। नये करार के जाति तो परमेश्वर के आत्मा से जन्म हुआ और उन्हें अनुशरण करने वाला लोग है और उसका आधार बप्ति स्मा और मण्डली का सदस्यता हुए हम देखतें हे। ज्यादा तौर पर हम लोगों नें लेवी याजकें जैसे, मेल्कीसेदक याजक जैसे मण्डली में नक्कली याजकें देखा करते हैं। पूरानी करार के मन्दिर और पवित्र स्थान को नयीं करार में अनोखे मानवीय मन्दिर बनाया हुआ और बाद में जाकर मूर्तिपूजा करने का भवनों को ही परमेश्वर के घर के रूप में घोषणा किये हुए भी मालुम किये गये। परमप्रभु ने पहले विना खमीर की पर्व, पेन्तिकोश और खेमों के पर्व नाम के पर्वएं दिया था किन्तु नयीं करार में तो आत्मिक पर्वएं थे। ख्रीष्टमस और ईष्टर उन्हों ने दिया हुआ पर्वएं नहीं हैं। अन्त में कहना हो तो पूराने करार के विश्राम दिन, नये करार के आत्मिक विश्राम और मूर्तिपूजा के रूप में मण्डली ने मानते हुए आये अलग-अलग सी पर्वएं और रविबार के बारे में भी हम लोगों ने साफ तरीके से देख सका।
येशू ने अपने लहू के द्वारा नयीं करार के उद्घाटन की। उसके पहला शिष्यों ने इस विशेष अवसर में जीने के क्रम में अपनें जीवन को ही बलिदान दिया। हिब्रूओं को भेजा हुआ पत्र में विवादास्पद बातों को स्पष्ट रूप में मजबूत बनाने के लिए विस्तृत रूप में लिखा गया है। इसने पूराने ही जीवन की ओर फिरने की इच्छा रखने बातों को चेतावनी देता है। हिब्रू के पत्र के हरेक पृष्ठ ही इस प्रसंग और शीर्षक के संग भा गया है। अन्त में इब्रानियों १२:१८-२४ के खण्डों को उल्लेख करते हुए मेरा लेख समाप्त करता हूं।
“क्योंकि छुआ जा सकता जलते हुए अग्निु, अन्धकार ......... न निकट आए हो। किन्तु तुम तो सिओन पर्वत, स्वर्गदूतों, परमेश्वर की पहली संतानों, जिन के नाम स्वर्ग में लिखे हैं और साधारण समाज और मण्डली के यहां, सब के न्यायकर्ता परमेश्वर के यहां उन धर्मात्मा, सिद्ध पुरुषों की आत्माओं, नये करार के मध्यस्थ यीशु के यहां और हाबिल की लहू से भी उत्तम वचन बोलने वाला लहू के छिटें में आए हैं। ध्यान रहें ! कि तुम उस बोलने वाले को मत नकारो।”
इस पुस्तक मुद्रण के लिए रंगिन [Colour] फ़ाइल
इस पुस्तक मुद्रण के लिए श्याम-स्वेत [Black & White] फ़ाइल
-->